बहू की समझदारी – रंजना गुप्ता

यह कहानी है एक ऐसे परिवार की, जहाँ संपत्ति और संपन्नता तो थी, लेकिन आपसी तालमेल और समझदारी की कमी थी। इस कहानी के केंद्र में है एक बहू, जिसने अपनी सूझबूझ, धैर्य और बुद्धिमत्ता से न केवल बिखरते हुए परिवार को संभाला, बल्कि सबको यह सिखाया कि असली समझदारी क्या होती है।

​सुंदरपुर गाँव के सबसे प्रतिष्ठित और धनी जमींदार रामनाथ जी के बड़े बेटे राघव का विवाह पास के शहर की एक सुशिक्षित और शालीन लड़की, अंजलि से हुआ था। अंजलि केवल दिखने में ही सुंदर नहीं थी, बल्कि उसके विचार और संस्कार भी उतने ही ऊंचे थे। उसने अर्थशास्त्र में स्नातक किया था, लेकिन वह बड़ों का सम्मान करना और रिश्तों को निभाना बखूबी जानती थी।

​जब अंजलि पहली बार बहू बनकर रामनाथ जी की हवेली  में आई, तो उसका स्वागत तो बहुत धूमधाम से हुआ, लेकिन घर का माहौल वैसा नहीं था जैसा बाहर से दिखता था।

​रामनाथ जी के तीन बेटे थे राघव  माधव और गौरव रामनाथ जी की पत्नी, कौशल्या देवी, एक सख्त स्वभाव की महिला थीं, जो घर के हर .फैसले पर अपना कड़ा नियंत्रण रखती थीं। मझले बेटे माधव का विवाह हो चुका था और उसकी पत्नी रागिनी थोड़े तेज और ईर्ष्यालु स्वभाव की थी। छोटा बेटा गौरव अभी कॉलेज में पढ़ रहा था।

​घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन शांति गायब थी। हर कोई अपने स्वार्थ में लगा था। रागिनी को लगता था कि बड़ी बहू के आने से उसका हक कम हो जाएगा, इसलिए वह अंजलि को देखते ही मन ही मन उससे मुकाबला करने की तैयारी में जुट गई।

​अंजलि ने घर में कदम रखते ही समझ लिया था कि यहाँ केवल पैसों की चकाचौंध है लेकिन रिश्तों की गरमाहट नहीं है। कौशल्या देवी हर बात पर हुक्म चलाती थीं, रागिनी बात-बात पर ताने कसती थी, और पुरुष वर्ग सिर्फ अपने काम से काम रखता था।

​एक दिन सुबह की चाय के समय, रागिनी ने जानबूझकर अंजलि से कहा, भाभी, हमारे घर के तौर-तरीके थोड़े अलग हैं। यहाँ रसोई का काम नौकर करते हैं, लेकिन मालकिनों को हर चीज पर नजर रखनी होती है। वैसे, शहर की लड़कियों को तो देर से सोकर उठने की आदत होती है, आप कैसे संभालेंगी ये सब?

​अंजलि ने रागिनी की कड़वाहट को भांप लिया, लेकिन उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, रागिनी, शहर हो या गाँव, सुबह की ताजी हवा और अपनों के साथ चाय का स्वाद हर जगह एक जैसा ही सुकून देता है। तुम फिक्र मत करो, मुझे सुबह जल्दी उठना पसंद है। और हाँ, अब जब मैं आ गई हूँ, तो हम दोनों मिलकर माँ जी का हाथ बंटाएंगे।

​अंजलि के इस शांत और गरिमापूर्ण जवाब से रागिनी का तीर खाली चला गया। कौशल्या देवी ने भी अंजलि की इस परिपक्वता को देखा और चुप रहीं।

​शादी के कुछ दिनों बाद, कौशल्या देवी ने अंजलि को रसोई की चाबी सौंपते हुए कहा, बहू, आज से एक हफ्ते तक घर की रसोई और राशन का हिसाब-किताब तुम्हारे हाथ में है। हमारे घर में रोज दर्जनों मेहमान आते हैं। खर्च में कोई कमी नहीं होनी चाहिए, लेकिन फिजूलखर्ची भी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। देखना चाहती हूँ कि तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई इस घर को चलाने में कितनी काम आती है।”

​यह अंजलि के लिए एक परीक्षा थी। रागिनी ने चुपके से रसोई के मुख्य रसोइए, रामू को अपने पक्ष में कर लिया था। उसने रामू से कहा कि वह अंजलि को सही से सहयोग न करे, ताकि अंजलि सास की नजरों में गिर जाए।

​पहले ही दिन, दोपहर के भोजन के समय अचानक रामनाथ जी के कुछ व्यापारिक मित्र घर आ गए। मेहमानों की संख्या करीब पंद्रह थी। रामू ने अंजलि से आकर कहा, बड़ी बहू जी, सामान तो कम पड़ गया है। और बाजार से सामान आने में दो घंटे लगेंगे। अब इतनी जल्दी खाना कैसे बनेगा?

​रागिनी मन ही मन खुश हो रही थी कि अब अंजलि की बेइज्जती तय है। कौशल्या देवी भी चिंतित हो गईं।

​लेकिन अंजलि घबराई नहीं। उसने तुरंत रसोई का मुआयना किया। उसने देखा कि घर में सब्जियां कम थीं, लेकिन दालें, चावल, पोहा और सूजी भरपूर मात्रा में थे।

​उसने अपनी सूझबूझ का परिचय दिया। ​उसने रामू को डांटने के बजाय प्यार से समझाया और खुद काम में जुट गई।​उसने  शाही पुलाव बनाया,

​बची हुई सब्जियों और बेसन से स्वादिष्ट कोफ्ते तैयार किए।

​सूजी का हलवा और दही के शोले जैसी झटपट बनने वाली चीजें बनाईं।

​ठीक एक घंटे में, अंजलि ने ऐसा शाही और स्वादिष्ट भोजन तैयार कर दिया कि मेहमान उंगलियां चाटते रह गए। रामनाथ जी के मित्रों ने खाने की जमकर तारीफ की और कहा, रामनाथ जी, आपकी बड़ी बहू के हाथ में तो अन्नपूर्णा का वास है!

​कौशल्या देवी का सिर गर्व से ऊंचा हो गया। जब उन्हें पता चला कि अंजलि ने यह सब सीमित सामान में और इतनी जल्दी किया है, तो उनका दिल पिघल गया। रागिनी का प्लान फ्लॉप हो चुका था।

बहु की समझदारी से घर की बेइज्जती होने से बच गई ।

रंजना गुप्ता

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