एक ही आँगन की दो उड़ानें

दीनानाथ जी ने आगे कहा, “एक बात हमेशा याद रखना सावित्री, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। रोहन आज अगर इतनी शांति से अपना काम कर पा रहा है, तो इसलिए क्योंकि पीछे से मीरा ने घर को एक मजबूत खंभे की तरह संभाल रखा है। अगर मीरा खुश नहीं रहेगी, तो तुम यह … Read more

परंपरा और आधुनिकता की पहेली

अनन्या अवाक रह गई। वह कुछ बोल ही नहीं पा रही थी। आधुनिकता की तमाम दलीलें देने वाली अनन्या को अचानक अपनी ही भारतीय जड़ों का एहसास होने लगा। उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ने लगा। ‘होने वाले सास-ससुर के सामने मैं एक ही कमरे में रोहन के साथ कैसे रहूँगी? मैं उनके सामने सुबह-सुबह बिना … Read more

भ्रम का टूटना: एक बेटी का फैसला

 समीर के शब्दों का चयन और लहजा संगीता  के लिए बिल्कुल नया था। उसने कहा, “नाटक नहीं है समीर, ये मेरी जिंदगी और मेरे परिवार की इज्जत का सवाल है। मैं अपने पिता को इस तरह धोखा नहीं दे सकती। अगर हम सच में प्यार करते हैं, तो हमें मेरे परिवार को मनाना चाहिए, भागना … Read more

दिखावे का पुण्य

 आरव ने अपनी मासूम लेकिन तेज आवाज में, जो उस शांत कमरे में गूंज उठी, पूछा, “मम्मी, आप इन आंटी लोगों को इतनी नरम-नरम रोटियां और खीर क्यों दे रही हो? जब दादी हमारे साथ रहती थीं, तब तो आप उन्हें हमेशा कहती थीं कि बुढ़ापे में ज्यादा नखरे नहीं करने चाहिए। जब दादी के … Read more

टूटती बेड़ियाँ: एक बेटी के आत्मसम्मान की कहानी

 सावित्री देवी पिछले कई दिनों से अपनी बेटी के इस बदलते हुए रूप को बहुत करीब से देख रही थीं। एक माँ की नज़र से भला बच्चे का दुःख कैसे छिप सकता है? कई बार उन्होंने डाइनिंग टेबल पर या सुबह की चाय के वक्त नेहा से कुरेद-कुरेद कर पूछने की कोशिश की थी, लेकिन … Read more

पसीने से लिखी तकदीर

बेटी की बातें सुनकर सावित्री का दिल छलनी हो गया। एक माँ के लिए अपने जीते-जी बच्चे के भविष्य पर ऐसा कुठाराघात सहना बहुत मुश्किल था। उसे लगा कि बाहर जाकर उन ढोंगी बाबा को खूब खरी-खोटी सुनाए, लेकिन घर की मर्यादा और सास के डर से वह खून का घूंट पीकर रह गई। उसने … Read more

त्याग के पन्ने

“बेटा, अगर मेरे रहने से इस घर की शांति भंग होती है, तो मैं आज ही यह घर छोड़ दूंगी। मुझे बुढ़ापे में किसी पर बोझ बनकर नहीं रहना।” कांपते हाथों से अपनी पुरानी सूती साड़ी का पल्लू सँभालते हुए, बासठ वर्षीय सावित्री देवी ने अपने भारी मन से ये शब्द कहे। उनके चेहरे की … Read more

अधूरी कोख, मुकम्मल ममता

नंदिनी की उम्र बत्तीस साल हो चुकी थी और उसने यह मान लिया था कि उसकी ज़िंदगी की किताब में ‘परिवार’ नाम का पन्ना कभी नहीं जुड़ेगा। पुणे शहर की एक पुरानी और शांत कॉलोनी में पली-बढ़ी नंदिनी हमेशा से एक भरा-पूरा परिवार चाहती थी। लेकिन ज़िंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम उसे ख्यालों … Read more

स्वाभिमान की उड़ान

शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी रघुनाथ जी की जिंदगी में सब कुछ बहुत ही सुचारू रूप से चल रहा था। उनका साड़ियों का थोक व्यापार था, जिसे उन्होंने अपनी बरसों की कड़ी मेहनत और ईमानदारी से सींचा था। उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा गुरूर और उनकी सबसे बड़ी खुशी उनकी इकलौती बेटी, काव्या थी। काव्या … Read more

अनदेखी बेड़ियाँ: ‘चार लोगों’ का खौफ

विदाई की रुलाई और सफर की थकान से राधिका का पोर-पोर दर्द कर रहा था। भारी लहंगे और गहनों के बोझ से उसका शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था। ससुराल की दहलीज पार करने के बाद उसने सोचा कि अब वह अपने कमरे में जाकर थोड़ी देर आँखें मूंद लेगी। लेकिन अभी वह बिस्तर के … Read more

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