प्रतिष्ठा का मुखौटा

दीनदयाल जी अपनी बात पूरी कर पाते, उससे पहले ही शेखर सेठ ने उनकी बात काटते हुए तल्ख लहज़े में कहा, “दीनदयाल जी! बात पाँच-सात लाख रुपये के खर्च की नहीं है, बात हमारी ‘हैसियत’ की है। बुआ जी के ससुराल वालों, हमारे पूरे खानदान और शहर के रसूखदार लोगों को पता तो चलना चाहिए … Read more

जश्न के पीछे का सन्नाटा

 लेकिन तभी हॉल के मुख्य दरवाज़े पर एक अजीब सा शोर हुआ। दरबान किसी को अंदर आने से रोक रहे थे, और वह व्यक्ति ज़ोर-ज़ोर से गालियां बक रहा था। “अरे हटो… मेरा बेटा है वो… मुझे रोकोगे तुम? मैं बाप हूँ उसका, आईएएस का बाप!” आवाज़ सुनकर सुमेधा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। … Read more

अस्तित्व की धूप

छत पर पहुँचते ही शालिनी ने मीरा का हाथ पकड़ लिया और एक गहरी साँस लेते हुए बोली, “मीरा, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि तू साबित क्या करना चाहती है? कल ही तो वकीलों से बात हुई थी। तूने खुद कहा था कि अब तू विकास के साथ एक पल भी नहीं … Read more

उम्र का वनवास

 नेहा स्वभाव से बुरी नहीं थी, लेकिन वह बहुत ‘प्रोफेशनल’ थी। घर की हर चीज़ अपनी जगह पर होनी चाहिए, यह उसका सख्त नियम था। दीनानाथ जी अगर गलती से सोफे पर चाय का एक कतरा भी गिरा देते, तो नेहा के माथे पर सिलवटें पड़ जाती थीं। “पापा जी, आप डाइनिंग टेबल पर ही … Read more

खोई हुई पहचान: एक अनकही दास्तान

शिखा ने मीरा का हाथ पकड़कर कहा, “मीरा, एक बात हमेशा याद रखना। अगर इंजन में ही खराबी आ जाए, तो गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती। तुम इस घर का इंजन हो। तुम दिन-रात सेवा कर रही हो, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन अगर तुम अंदर से खुश नहीं हो, तो तुम दूसरों को … Read more

एक ही आँगन की दो उड़ानें

दीनानाथ जी ने आगे कहा, “एक बात हमेशा याद रखना सावित्री, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। रोहन आज अगर इतनी शांति से अपना काम कर पा रहा है, तो इसलिए क्योंकि पीछे से मीरा ने घर को एक मजबूत खंभे की तरह संभाल रखा है। अगर मीरा खुश नहीं रहेगी, तो तुम यह … Read more

परंपरा और आधुनिकता की पहेली

अनन्या अवाक रह गई। वह कुछ बोल ही नहीं पा रही थी। आधुनिकता की तमाम दलीलें देने वाली अनन्या को अचानक अपनी ही भारतीय जड़ों का एहसास होने लगा। उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ने लगा। ‘होने वाले सास-ससुर के सामने मैं एक ही कमरे में रोहन के साथ कैसे रहूँगी? मैं उनके सामने सुबह-सुबह बिना … Read more

भ्रम का टूटना: एक बेटी का फैसला

 समीर के शब्दों का चयन और लहजा संगीता  के लिए बिल्कुल नया था। उसने कहा, “नाटक नहीं है समीर, ये मेरी जिंदगी और मेरे परिवार की इज्जत का सवाल है। मैं अपने पिता को इस तरह धोखा नहीं दे सकती। अगर हम सच में प्यार करते हैं, तो हमें मेरे परिवार को मनाना चाहिए, भागना … Read more

दिखावे का पुण्य

 आरव ने अपनी मासूम लेकिन तेज आवाज में, जो उस शांत कमरे में गूंज उठी, पूछा, “मम्मी, आप इन आंटी लोगों को इतनी नरम-नरम रोटियां और खीर क्यों दे रही हो? जब दादी हमारे साथ रहती थीं, तब तो आप उन्हें हमेशा कहती थीं कि बुढ़ापे में ज्यादा नखरे नहीं करने चाहिए। जब दादी के … Read more

टूटती बेड़ियाँ: एक बेटी के आत्मसम्मान की कहानी

 सावित्री देवी पिछले कई दिनों से अपनी बेटी के इस बदलते हुए रूप को बहुत करीब से देख रही थीं। एक माँ की नज़र से भला बच्चे का दुःख कैसे छिप सकता है? कई बार उन्होंने डाइनिंग टेबल पर या सुबह की चाय के वक्त नेहा से कुरेद-कुरेद कर पूछने की कोशिश की थी, लेकिन … Read more

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