उमेश जी जब भी चाय की चुस्की लेते हुए अपनी धर्मपत्नी मनोरमा को समझाते कि घर में आई नई बहू को भी वही आदर और दुलार मिलना चाहिए जो उनकी अपनी संतान को मिलता है, मनोरमा जी का चेहरा तमतमा उठता था। उनके भीतर बरसों से जमी परंपराओं और संस्कारों की धूल इतनी गहरी थी कि उन्हें रिश्तों का कोई नया रंग दिखाई ही नहीं देता था। वे रसोई के दरवाजे पर खड़े होकर हाथ नचाते हुए कहतीं, “आप रहने ही दीजिए उमेश जी! दुनियादारी की समझ पुरुषों को कहाँ होती है? बहू चाहे सोने के कलश में भी सजकर आ जाए, वह कभी बेटी नहीं बन सकती। बेटी तो अपनी कोख से जन्म लेती है, उसका और हमारा खून का रिश्ता होता है। बहू तो दूसरे घर का पानी पीकर बड़ी हुई है, वह तो बस रस्मों की डोर से बंधी एक पराई लड़की है। सास कभी माँ नहीं बनती और बहू कभी बेटी नहीं बन सकती।”
घर का वातावरण अक्सर उनकी इस भेद-भाव भरी सोच के कारण तनावग्रस्त हो जाता था। उनके बेटे अनिकेत ने बड़े चाव से स्वाति के साथ विवाह किया था। स्वाति एक सुशिक्षित, समझदार और बेहद संवेदनशील युवती थी। जब वह ब्याह कर इस घर में आई थी, तो उसने मन ही मन यही ठाना था कि वह इस नए परिवार को अपने स्नेह से सींचेगी। लेकिन मनोरमा जी का कड़ा और संशयवादी रुख उसकी हर कोशिश के आगे एक मजबूत दीवार बनकर खड़ा हो जाता था। मनोरमा जी पुराने ख्यालातों में इस कदर जकड़ी थीं कि उन्हें स्वाति का उठना, बैठना, यहाँ तक कि उसका हँसना भी किसी कमी की तरह नजर आता था।
मनोरमा जी का एक तय नियम था। चाहे सर्दी हो या बरसात, वे सुबह ठीक साढ़े चार बजे उठकर अपने धार्मिक अनुष्ठानों में लग जाती थीं। माघ का पवित्र महीना चल रहा था और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। भोर की नीरवता में पूरा शहर कोहरे की घनी चादर ओढ़े सोया रहता था, पर मनोरमा जी के पूजा-पाठ और स्नान का क्रम कभी नहीं टूटता था। अनिकेत कई बार कहता, “माँ, इतनी सुबह कड़ाके की ठंड में ठंडे पानी से नहाना और अंधेरे में घूमना ठीक नहीं है, अब आपकी उम्र भी सत्तर के करीब पहुँच रही है।” लेकिन मनोरमा जी अपनी हठ के आगे किसी की नहीं सुनती थीं। वे हमेशा यही ताना मारतीं, “हमारी पीढ़ी ऐसी ही पक्की मिट्टी की बनी है, आजकल की लड़कियों की तरह थोड़ी हैं कि सूरज सिर पर चढ़ आए और रजाई में मुँह छुपाए पड़ी रहें।” स्वाति चुपचाप उनकी जली-कटी बातें सुन लेती और बिना कोई प्रतिवाद किए चाय की गर्म प्याली उनके सामने रख देती।
उस दिन भी सुबह के पाँच बज रहे थे। पौष-माघ की वह सुबह बेहद ठंडी और अंधियारी थी। अचानक इलाके की बिजली गुल हो गई। समूचा घर घने स्याह अंधेरे में डूब गया। इन्वर्टर भी किसी तकनीकी खराबी के चलते बंद पड़ा था। मनोरमा जी अपने पूजा घर की ओर बढ़ रही थीं ताकि गंगाजल और तांबे का लोटा ले सकें। अंधेरे में उनकी आँखें कुछ देख नहीं पाईं और सीढ़ियों के पास रखी पीतल की बड़ी परात से उनका पाँव उलझ गया। एक भयानक चीख सन्नाटे को चीरती हुई गूँज उठी। मनोरमा जी का संतुलन बिगड़ा और वे संगमरमर के फर्श पर सीधे कमर के बल गिर पड़ीं।
चीख सुनते ही अनिकेत, उमेश जी और स्वाति बदहवास होकर दौड़े। मोबाइल की रोशनी जलाई गई तो देखा कि मनोरमा जी फर्श पर बेसुध तड़प रही थीं। उनके मुँह से दर्द के मारे शब्द नहीं निकल रहे थे, सिर्फ कराहटें फूट रही थीं। अनिकेत और उमेश जी ने सहारा देकर उन्हें उठाने का प्रयास किया, लेकिन जैसे ही उनकी कमर हिली, मनोरमा जी चीख पड़ीं, “अरे मत छुओ! जान निकल रही है मेरी, रीढ़ में कुछ टूट गया!”
आनन-फानन में गाड़ी निकालकर उन्हें पास के एक बड़े निजी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने तुरंत एक्स-रे और स्कैन किए। करीब दो घंटे बाद जब हड्डी रोग विशेषज्ञ बाहर आए, तो उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। उन्होंने उमेश जी और अनिकेत को बुलाकर कहा, “चोट बहुत गंभीर है। कूल्हे की हड्डी में गहरा फ्रैक्चर आया है। उम्र अधिक होने के कारण सर्जरी में भी जोखिम है। फिलहाल इन्हें प्लास्टर और ट्रैक्शन पर रखना होगा। कम से कम तीन से चार महीने इन्हें पूरी तरह बेड रेस्ट करना होगा। यह करवट भी खुद नहीं बदल पाएंगी। इन्हें चौबीसों घंटे एक समर्पित तीमारदार की जरूरत होगी जो इनका खाना-पीना, दवाइयाँ और नित्यकर्म सब बिस्तर पर ही संभाले।”
घर लौटते समय कार में गहरा सन्नाटा था। मनोरमा जी को जब घर के निचले कमरे में लाकर लिटाया गया, तो वे दर्द से ज्यादा लाचारी के बोझ तले दबी हुई थीं। जिंदगी भर जिस औरत ने पूरे घर पर अपनी हुकूमत चलाई थी, जिसके इशारे पर पूरा परिवार चलता था, आज वह खुद एक लकड़ी के तख्ते की तरह बिस्तर पर सीधी पड़ी थी। हिलना-डुलना तो दूर, जरा सी करवट लेने पर भी उसकी आँखों से आँसू छलक पड़ते थे।
दोपहर होते-होते मनोरमा जी को अपनी विवाहिता बेटी रुचिका की याद सताने लगी। रुचिका उनकी आँखों का तारा थी। जब भी घर में कोई बात होती, मनोरमा जी हमेशा स्वाति को नीचा दिखाने के लिए रुचिका की तारीफों के पुल बांधती थीं। वे हमेशा कहती थीं, “मेरी रुचिका जैसी बेटी तो नसीब वालों को मिलती है। बेटी का दिल तो माँ के लिए हमेशा धड़कता है।”
मनोरमा जी ने कांपते हाथों से अपना मोबाइल फोन उठाया और रुचिका का नंबर मिलाया। घंटी बजती रही और आखिरकार तीसरी बार में रुचिका ने फोन उठाया। उसकी आवाज में एक अजीब सी हड़बड़ाहट और बेरुखी थी, “हाँ माँ, बोलो! इतनी सुबह-सुबह फोन क्यों कर रही हो? तुम्हें पता है न बच्चों का स्कूल का समय होता है और मुझे कितनी व्यस्तता रहती है?”
मनोरमा जी की आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने रोते हुए कहा, “बेटी, मुझ पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। आज सुबह अंधेरे में पैर फिसल गया और कूल्हा टूट गया। डॉक्टर ने कहा है कि महीनों तक बिस्तर से नहीं उठ पाऊंगी। पानी पीने के लिए भी दूसरों का सहारा चाहिए। तू कुछ दिनों के लिए आ जा न बेटी! मुझे तेरी बहुत जरूरत है। अपनी माँ की सेवा कर देगी तो मुझे थोड़ी तसल्ली मिल जाएगी।”
दूसरी तरफ से कुछ पलों की खामोशी के बाद रुचिका की ठंडी और सपाट आवाज आई, “माँ! तुम भी न बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देती हो। तुम्हें पता है कि साहिल की दसवीं की प्री-बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं। उनके पापा का टूर लगा हुआ है। मैं यहाँ घर, रसोई और बच्चों की पढ़ाई छोड़कर कैसे आ सकती हूँ? और फिर भैया और भाभी तो वहीं हैं न! भाभी दिन भर घर पर ही तो रहती हैं, उन्हें कहो तुम्हारी देखभाल करें। आखिरकार बहू का भी तो कोई फर्ज बनता है। जब परीक्षाएं खत्म होंगी, तब देखूंगी। अभी तो मेरा एक दिन के लिए भी आना नामुमकिन है। तुम अपना ख्याल रखो, मैं बाद में बात करती हूँ।”
खट से फोन कट गया। फोन की वह ‘बीप-बीप’ की आवाज मनोरमा जी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरी। जिस बेटी के लिए उन्होंने जिंदगी भर दिल के दरवाजे खुले रखे, जिस बेटी के नाम पर वे स्वाति को हर कदम पर पराया अहसास कराती रहीं, उसी बेटी ने अपनी माँ के सबसे लाचार वक्त में एक झटके में पल्ला झाड़ लिया। मनोरमा जी का सिर चकरा गया। उनका सीना किसी अनजाने दर्द से फटने लगा। यह शारीरिक चोट का दर्द नहीं था, यह उस ममता के अपमान का दर्द था जो उन्होंने अपनी स्वार्थी औलाद पर न्योछावर की थी।
उमेश जी का अपना कपड़ों का छोटा सा थोक व्यापार था, जिसे अगर वे कुछ दिन भी न देखते तो परिवार की आर्थिक गाड़ी डगमगा जाती। अनिकेत एक निजी कंपनी में अकाउंटेंट था, जहाँ साल के अंत का काम चल रहा था और उसे रोज बारह-बारह घंटे दफ्तर में खपना पड़ता था। दोनों पुरुष अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे थे, लेकिन एक बिस्तर पर लाचार पड़ी वृद्ध महिला की व्यक्तिगत सेवा और देखभाल करना उनके बस की बात नहीं थी।
ऐसे में आगे आई स्वाति। उसने बिना किसी शिकवे, बिना किसी तंज और बिना किसी बदले की भावना के अपनी सास की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। जिस दिन मनोरमा जी अस्पताल से लौटी थीं, स्वाति ने अपनी तमाम दिनचर्या उनके कमरे में ही समेट ली। उसने अपना बिस्तर सास के कमरे में ही जमीन पर लगा लिया ताकि रात में अगर माँ जी को जरा सी भी जरूरत पड़े, तो वह तुरंत उठ सके।
शुरुआती दिनों में मनोरमा जी बहुत असहज थीं। उन्हें लगता था कि जिस बहू को उन्होंने हमेशा ताने दिए, जिसकी छोटी-छोटी बातों में खोट निकाले, वह अब उनसे बदला लेगी या कम से कम उन्हें अपनी बेबसी का अहसास तो जरूर कराएगी। लेकिन स्वाति के चेहरे पर न तो कोई शिकन थी और न ही उसकी बातों में कोई कड़वाहट।
हर सुबह पाँच बजे स्वाति उठती। सबसे पहले वह गर्म पानी करती, मनोरमा जी के चेहरे और बदन को तौलिए से स्पंज करती। जिस गंदगी और मलमूत्र की सफाई के ख्याल से ही इंसान झिझक जाता है, स्वाति ने बिना नाक-भौं सिकोड़े, एक निस्वार्थ नर्स की तरह अपनी सास की हर गंदी चादर बदली, उनके कपड़े बदले और उन्हें साफ-सुथरा रखा। वह रोज समय पर दलिया, फलों का रस और हल्की खिचड़ी बनाकर अपने हाथों से उन्हें खिलाती। जब मनोरमा जी का दर्द असहनीय हो जाता, तो स्वाति घंटों बैठकर उनके पैरों और पीठ को हल्के हाथों से सहलाती।
एक दिन दोपहर को तेज बुखार के कारण मनोरमा जी काँप रही थीं। स्वाति ने ठंडे पानी की पट्टियाँ उनके माथे पर रखीं और लगातार तीन घंटे तक उनके सिरहाने बैठी रही। जब मनोरमा जी की आँख खुली, तो उन्होंने देखा कि स्वाति की आँखें थकान और रतजगे के कारण लाल हो चुकी थीं, उसके चेहरे पर गहरी चिंता थी और वह मन ही मन कोई प्रार्थना बुदबुदा रही थी।
मनोरमा जी के भीतर कुछ टूट गया। उनका बरसों पुराना अहंकार, उनकी वह संकीर्ण सोच कि “बहू कभी बेटी नहीं बन सकती”, स्वाति के इस असीम त्याग के आगे तिनके की तरह बिखर गई। उन्हें याद आने लगे वे तमाम दिन जब उन्होंने स्वाति को सिर्फ इसलिए ताना दिया था कि उसकी चाय में शक्कर ज्यादा थी, जब उन्होंने तीज-त्योहारों पर उसके मायके वालों को नीचा दिखाया था, और जब उन्होंने भरे समाज में कहा था कि बहू तो बस बाहर की होती है। आज वही ‘बाहर की’ लड़की उनके गंदे कपड़े धो रही थी, उनके घावों पर मरहम लगा रही थी, और उनकी अपनी ‘कोख की जाई’ बेटी सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठकर अपनी झूठी व्यस्तताओं का बहाना बना रही थी।
उस रात जब स्वाति मनोरमा जी के पैरों में दर्द निवारक तेल मल रही थी, तब मनोरमा जी के सब्र का बांध टूट गया। उनकी आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली। उनके कांपते हुए हाथ उठे और उन्होंने स्वाति के दोनों हाथों को थाम लिया।
स्वाति घबरा गई, “क्या हुआ माँ जी? क्या बहुत तेज दर्द हो रहा है? मैं डॉक्टर साहब को फोन लगाऊं?”
मनोरमा जी ने फफकते हुए अपना सिर हिलाया। उन्होंने स्वाति के हाथों को अपने सीने से लगा लिया और रोते हुए बोलीं, “नहीं बहू… दर्द जिस्म में नहीं, मेरी रूह में हो रहा है। मेरी आँखों पर जो अज्ञानता की पट्टी बंधी थी, वह आज तुमने अपने इस निस्वार्थ प्रेम से खोल दी है। मैं कितनी अंधी थी स्वाति! मैंने सारी जिंदगी तुम्हें पराया समझा, हर बात पर तुम्हें जलील किया, तुम्हारी ममता को ठुकराया। और जिस बेटी पर मुझे इतना गुमान था, उसने मुझे एक बार देखने तक से इनकार कर दिया। आज अगर तू न होती, तो यह बुढ़िया अपने ही मलमूत्र में सड़कर मर जाती।”
स्वाति की आँखों में भी आँसू आ गए। उसने आगे बढ़कर अपनी सास के आँसू पोंछे और उनका माथा चूमते हुए बोली, “माँ जी, आप यह क्या कह रही हैं? आपने मुझे बहू समझा होगा, लेकिन मैंने तो जिस दिन इस घर की दहलीज लांघी थी, उसी दिन आपको अपनी माँ मान लिया था। जब अपनी माँ बीमार होती है, तो क्या कोई बेटी उसकी सेवा करने से पीछे हटती है? अगर माँ अपनी बेटी को कभी डांट भी दे, तो क्या बेटी नाराज होकर रिश्ता तोड़ लेती है? आप मेरी माँ हैं, और माँ का ख्याल रखना मेरा कोई अहसान नहीं, मेरा सौभाग्य है।”
स्वाति के इन सहज और पवित्र शब्दों ने मनोरमा जी के मन के सारे संताप धो डाले। उस दिन के बाद से घर का पूरा माहौल ही बदल गया। मनोरमा जी के स्वभाव की कटुता हमेशा के लिए समाप्त हो चुकी थी। अब जब भी उमेश जी या अनिकेत कमरे में आते, मनोरमा जी अपनी बीमारी की नहीं, बल्कि अपनी बहू के त्याग और गुणों की गाथा गातीं।
लगभग चार महीने के अथक सेवा, उचित खान-पान और स्वाति की दिन-रात की तीमारदारी का ही असर था कि मनोरमा जी धीरे-धीरे वॉकर के सहारे अपने पैरों पर खड़ी होने लगीं। एक दिन शाम को, जब सूरज की सुनहरी किरणें आंगन में बिखर रही थीं, मनोरमा जी ने वॉकर को एक तरफ सरकाया और स्वाति का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे चलते हुए तुलसी के चौबारे तक पहुँचीं।
उन्होंने हाथ जोड़कर ईश्वर का धन्यवाद किया और फिर अपने गले से अपनी खानदानी सोने की भारी चेन उतारी, जिसे वे हमेशा अपनी बेटी रुचिका को देने की बात करती थीं। उन्होंने वह चेन बड़े प्यार और आदर के साथ स्वाति के गले में पहना दी। स्वाति ने संकोच से मना करना चाहा, लेकिन मनोरमा जी ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा, “नहीं बेटी, यह कोई गहना नहीं है, यह एक माँ का अपनी उस बेटी को दिया गया आशीर्वाद है जिसने अपनी ममता से एक पत्थर को भी पिघलाकर माँ बना दिया। आज मैं पूरे यकीन के साथ कह सकती हूँ कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि अहसासों और समर्पण से बड़े होते हैं। जो बुरे वक्त में साए की तरह साथ खड़ी रहे, वही असली औलाद होती है।”
उमेश जी और अनिकेत दरवाजे पर खड़े यह दृश्य देख रहे थे और उनकी आँखों में खुशी और संतोष के आँसू थे। घर का वह आंगन, जो कभी भेद-भाव और तानों की गूँज से बोझिल रहता था, आज प्रेम, सम्मान और सच्ची पारिवारिक मिठास से महक उठा था। बदलते समय ने सचमुच एक सास के दिल में माँ और एक बहू के दिल में सच्ची बेटी को जन्म दे दिया था।
आपकी राय हमारे लिए अनमोल है: अगर आपके सामने कभी ऐसी परिस्थिति आए, तो क्या खून के रिश्ते ही सब कुछ होते हैं या फिर वह रिश्ता बड़ा होता है जो बुरे वक्त में निस्वार्थ भाव से साथ निभाता है? आपकी नजर में एक सास को बहू का दिल जीतने के लिए अपनी सोच में क्या बदलाव करने चाहिए? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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लेखिका : गरिमा चौधरी