समीर के शब्दों का चयन और लहजा संगीता के लिए बिल्कुल नया था। उसने कहा, “नाटक नहीं है समीर, ये मेरी जिंदगी और मेरे परिवार की इज्जत का सवाल है। मैं अपने पिता को इस तरह धोखा नहीं दे सकती। अगर हम सच में प्यार करते हैं, तो हमें मेरे परिवार को मनाना चाहिए, भागना कोई समाधान नहीं है।”
“तो क्या तुम चाहती हो कि मैं तुम्हारे उस खड़ूस बाप के पैरों में गिर जाऊं?” समीर की आवाज अब धमकी भरी हो चुकी थी, “मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि वो कभी नहीं मानेंगे। तुम मुझे धोखा दे रही हो संगीता । याद रखना, मैं वो इंसान नहीं हूँ जो चुपचाप हार मान ले।”
संगीता को यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही समीर है जो कल तक उसके लिए चांद-तारे तोड़ने की बातें करता था।
“तुम्हारे प्यार की सच्चाई बस इतनी ही थी समीर?” संगीता ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “जिस प्यार में मर्यादा और सम्मान ना हो, वो प्यार नहीं जिद है। तुम आज मुझे मेरे पिता से दूर कर रहे हो, कल तुम अपनी किसी जिद के लिए मुझे भी छोड़ दोगे। मैं तुम्हारे साथ कहीं नहीं जा रही हूँ।”
रात के ठीक बारह बज चुके थे। दिसंबर की सर्द हवा खिड़की के कांच से टकराकर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी, लेकिन संगीता के माथे पर पसीने की बूंदें झलक रही थीं। कमरे में घुप्प अंधेरा था, केवल सड़क पर जल रही स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रोशनी छनकर अंदर आ रही थी। सामने बिस्तर पर एक छोटा सा सूटकेस रखा था, जिसमें उसने अपने कुछ कपड़े और जरूरी सामान ठूंस लिए थे। उसकी उंगलियां लगातार कांप रही थीं। दिल की धड़कन इतनी तेज थी कि उसे लग रहा था जैसे सन्नाटे को चीरते हुए उसकी आवाज पूरे घर में गूंज जाएगी। आज की रात उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी और शायद सबसे खौफनाक रात थी। आज वह अपने घर की चौखट, अपने माता-पिता के सम्मान और अपनी पहचान को पीछे छोड़कर समीर के साथ भागने वाली थी।
समीर, जिससे वह पिछले तीन सालों से बेइंतहा प्यार करती थी। समीर की मीठी बातें, उसके कसमे-वादे और भविष्य के सुनहरे सपने संगीता की आंखों पर एक ऐसा पर्दा डाल चुके थे कि उसे अपने परिवार का प्यार भी उस पर्दे के पीछे धुंधला नजर आने लगा था। संगीता एक साधारण, मध्यवर्गीय और संस्कारों में रचे-बसे परिवार से ताल्लुक रखती थी। उसके पिता, पंडित दीनानाथ, शहर के एक सम्मानित स्कूल में हेडमास्टर थे। उनका जीवन उसूलों और मर्यादाओं की एक खुली किताब था। पूरा मोहल्ला उनकी इज्जत करता था। संगीता जानती थी कि उसके पिता समीर और उसके रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। समीर का ना तो कोई स्थायी काम था और ना ही उसके परिवार की कोई खास सामाजिक प्रतिष्ठा थी। जब भी संगीता ने अपने घर में बात करने का जिक्र किया, समीर ने हमेशा यही कहकर उसे डरा दिया कि “तुम्हारे पिता मुझे बेइज्जत करके घर से निकाल देंगे और फिर तुम्हारी शादी किसी और से कर देंगे। अगर तुम वाकई मुझसे प्यार करती हो, तो हमें भागना ही होगा।”
समीर की इसी भावनात्मक ब्लैकमेलिंग में आकर संगीता ने यह आत्मघाती कदम उठाने का फैसला कर लिया था। तय हुआ था कि रात के एक बजे समीर गली के नुक्कड़ पर अपनी कार लेकर आएगा और दोनों हमेशा के लिए इस शहर से दूर चले जाएंगे।
समय बीत रहा था। घड़ी की हर टिक-टिक संगीता के सीने पर हथौड़े की तरह वार कर रही थी। वह सूटकेस का जिप बंद करके उठी। प्यास के मारे उसका गला सूख रहा था। दबे पांव, बिना कोई आवाज किए वह अपने कमरे से बाहर निकली और रसोई की तरफ बढ़ी। हॉल से गुजरते हुए उसकी नजर अपने माता-पिता के कमरे की तरफ गई। दरवाजा हल्का सा खुला था। अंदर से पिता के खांसने की आवाज आई और साथ ही मां के धीमे स्वर में बड़बड़ाने की, “रात के समय खांसी बढ़ जाती है, कल डॉक्टर के पास जरूर चलना है।” पिता ने खांसते हुए कहा, “अरे कुछ नहीं, बस थोड़ी ठंड लग गई है। मेरी चिंता छोड़ो, संगीता की फीस कल जमा करनी है, मैंने पैसे अलमारी में रख दिए हैं, सुबह उसे याद से दे देना।”
संगीता के कदम वहीं ठिठक गए। एक पल के लिए उसे लगा जैसे किसी ने उसके मुंह पर जोरदार तमाचा जड़ दिया हो। जो पिता अपनी बीमारी भूलकर उसकी पढ़ाई की फीस की चिंता कर रहे थे, आज वह उन्हीं पिता की पगड़ी सरेआम नीलाम करने जा रही थी? वह हॉल में रखी पिता की आरामकुर्सी के पास गई, जहां उनका चश्मा और एक डायरी रखी थी। डायरी के पन्नों में घर के खर्चों का हिसाब था और हर पन्ने पर कहीं न कहीं उसकी जरूरतों को सबसे ऊपर रखा गया था।
संगीता का मन एक भयंकर अंतर्द्वंद्व में फंस गया। एक तरफ समीर का प्यार था, उसके साथ सजाए गए भविष्य के सपने थे, और दूसरी तरफ वो पिता थे जिन्होंने ताउम्र अपनी बेटियों को बेटों से बढ़कर माना था। क्या समीर का प्यार इतना कमजोर था कि उसे समाज का सामना करने का साहस नहीं दे सका? क्या समीर को उसकी इज्जत की कोई परवाह नहीं थी कि वह उसे रात के अंधेरे में चोरों की तरह घर से भागने पर मजबूर कर रहा था? संगीता की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। उसे समीर की बातों में छुपी स्वार्थपरता अचानक शीशे की तरह साफ नजर आने लगी।
तभी उसके हाथ में पकड़ा मोबाइल वाइब्रेट होने लगा। स्क्रीन पर ‘समीर कॉलिंग’ फ्लैश हो रहा था। समय देखा, रात के 12:45 बज चुके थे। संगीता ने कांपते हाथों से फोन उठाया लेकिन कुछ बोल नहीं पाई।
उधर से समीर की दबी लेकिन अधीर आवाज आई, “संगीता ! मैं बस पहुंचने ही वाला हूँ। तुम तैयार हो ना? जल्दी से पिछला दरवाजा खोलकर बाहर आ जाओ, मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। अगर किसी ने देख लिया तो सारा खेल बिगड़ जाएगा।”
संगीता चुप रही। उसकी चुप्पी ने समीर को और बेचैन कर दिया।
“हैलो! संगीता , सुन रही हो? जवाब क्यों नहीं दे रही? क्या कर रही हो तुम?” समीर की आवाज में अब प्यार से ज्यादा एक चिड़चिड़ाहट थी।
संगीता ने गहरी सांस ली, आंसुओं को पोंछा और एक दृढ़ स्वर में कहा, “समीर… मैं नहीं आ सकती।”
फोन के उस पार जैसे सन्नाटा छा गया। कुछ सेकंड बाद समीर फुफकारते हुए बोला, “क्या मतलब तुम नहीं आ सकती? दिमाग तो खराब नहीं हो गया है तुम्हारा? मैंने दोस्तों से उधारी मांगकर कार का इंतजाम किया है, आगे जाकर रुकने की जगह तय की है और तुम ऐन मौके पर नाटक कर रही हो?”
समीर के शब्दों का चयन और लहजा संगीता के लिए बिल्कुल नया था। उसने कहा, “नाटक नहीं है समीर, ये मेरी जिंदगी और मेरे परिवार की इज्जत का सवाल है। मैं अपने पिता को इस तरह धोखा नहीं दे सकती। अगर हम सच में प्यार करते हैं, तो हमें मेरे परिवार को मनाना चाहिए, भागना कोई समाधान नहीं है।”
“तो क्या तुम चाहती हो कि मैं तुम्हारे उस खड़ूस बाप के पैरों में गिर जाऊं?” समीर की आवाज अब धमकी भरी हो चुकी थी, “मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि वो कभी नहीं मानेंगे। तुम मुझे धोखा दे रही हो संगीता । याद रखना, मैं वो इंसान नहीं हूँ जो चुपचाप हार मान ले।”
संगीता को यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही समीर है जो कल तक उसके लिए चांद-तारे तोड़ने की बातें करता था।
“तुम्हारे प्यार की सच्चाई बस इतनी ही थी समीर?” संगीता ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “जिस प्यार में मर्यादा और सम्मान ना हो, वो प्यार नहीं जिद है। तुम आज मुझे मेरे पिता से दूर कर रहे हो, कल तुम अपनी किसी जिद के लिए मुझे भी छोड़ दोगे। मैं तुम्हारे साथ कहीं नहीं जा रही हूँ।”
समीर का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने नीचता पर उतरते हुए कहा, “तुम मुझे अभी जानती नहीं हो संगीता । अगर तुम आज रात मेरे साथ नहीं आई, तो कल सुबह तुम्हारे मोहल्ले की हर दीवार पर हमारी तस्वीरें चिपकी होंगी। तुम्हारे उस इज्जतदार बाप को मुंह दिखाने लायक नहीं छोडूंगा। मेरा इतना समय और पैसा बर्बाद किया है तुमने, इसका अंजाम तो तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा।”
समीर की ये धमकी संगीता के लिए किसी झटके से कम नहीं थी, लेकिन इस झटके ने उसे डराने के बजाय और मजबूत कर दिया। उसके भीतर बैठी डरी हुई लड़की अचानक एक शेरनी में बदल गई। उसने सख्ती से कहा, “तुमने अपनी असली औकात दिखा दी समीर। मुझे लगा था मैं एक प्रेमी से बात कर रही हूँ, पर तुम तो एक ब्लैकमेलर निकले। रही बात अंजाम की, तो अब वो तुम भुगतोगे। मैं कोई लावारिस नहीं हूँ, मेरा पूरा परिवार मेरे साथ है। तुम मेरी एक भी तस्वीर के साथ कुछ गलत करने की कोशिश करना, कल शाम तक मेरा भाई और मेरे पिता तुम्हें पुलिस के हवाले कर देंगे। मुझे तुम्हारी धमकियों से अब डर नहीं लगता। ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है कि उसने मुझे घर की दहलीज लांघने से पहले ही तुम्हारे जैसे मक्कार और जाहिल इंसान का असली चेहरा दिखा दिया।”
संगीता ने फोन काट दिया और उस नंबर को हमेशा के लिए ब्लॉक कर दिया। उसने एक लंबी राहत की सांस ली। सूटकेस में रखे कपड़े वापस अलमारी में रखे और बिस्तर पर लेट गई। आज उसे नींद नहीं आ रही थी, लेकिन मन में एक अजीब सी शांति थी—एक बड़े तूफान से बाल-बाल बच जाने की शांति।
अगली सुबह सूरज की किरणें कुछ ज्यादा ही उजली लग रही थीं। संगीता जानती थी कि आज का दिन आसान नहीं होने वाला है, लेकिन उसने तय कर लिया था कि वह झूठ के साये में नहीं जिएगी। सुबह जब पिता दीनानाथ जी अखबार पढ़ रहे थे और मां चाय बना रही थीं, संगीता उनके पास जाकर फर्श पर बैठ गई। उसने बिना कोई बात छुपाए, शुरू से लेकर अंत तक सारी सच्चाई अपने माता-पिता और बड़े भाई के सामने रख दी। उसने अपने उस भटके हुए रास्ते के बारे में बताया, भागने की योजना के बारे में बताया और रात में फोन पर हुई समीर की धमकियों के बारे में भी। बोलते-बोलते संगीता फूट-फूट कर रोने लगी।
कमरे में भारी सन्नाटा छा गया। दीनानाथ जी के हाथ से अखबार छूट कर नीचे गिर गया। उनकी आंखें लाल हो गई थीं और होंठ कांप रहे थे। संगीता को लगा कि अभी उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा पड़ेगा और उसे घर से निकाल दिया जाएगा।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। दीनानाथ जी उठे, उनके कदमों में थोड़ी लड़खड़ाहट थी। उन्होंने संगीता के कंधे पर हाथ रखा और उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया। उनकी भी आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने रूंधे हुए गले से कहा, “गलतियां हर इंसान से होती हैं बिटिया, लेकिन उन गलतियों को सुधारने का साहस बहुत कम लोगों में होता है। तूने आज सिर्फ खुद को नहीं, पूरे परिवार को एक गहरे खड्ड में गिरने से बचा लिया। मुझे तुझ पर कोई गुस्सा नहीं है, बल्कि गर्व है कि तूने आखिरी वक्त पर अपने परिवार के संस्कारों को चुना।”
संगीता के भाई ने आगे बढ़कर कहा, “रही बात उस समीर की, तो उसकी चिंता तू मत कर संगीता । अगर उसने तेरी तरफ आंख भी उठाकर देखी, तो मैं उसे ऐसा सबक सिखाऊंगा कि वो किसी भी लड़की की तरफ देखने लायक नहीं रहेगा।”
उस दिन संगीता को समझ में आ गया कि असली प्यार वो नहीं जो आपको अपनों से दूर करे, अंधेरे में छिपने पर मजबूर करे या धमकियां दे। असली प्यार और सुरक्षा तो परिवार के उस साये में है, जो आपकी सौ गलतियों के बाद भी आपको अपनी पनाह में ले लेता है।
आपको क्या लगता है, क्या संगीता ने आखिरी वक्त पर सही फैसला लिया? क्या परिवार से बगावत करके किया गया प्यार कभी सफल हो सकता है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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#भ्रम का टूटना: एक बेटी का फैसला
लेखिका : प्रियंका नाथ