संपत्ति का बँटवारा

 “बेटी, पराई या माँगी हुई दौलत से कभी किसी का घर नहीं बसता। सम्मान और सुख हमेशा अपनी मेहनत और समझदारी से मिलता है। तुम्हारे ससुर एक प्रतिष्ठित शिक्षक रहे हैं, तुम्हारे पति एक होनहार इंजीनियर हैं। अगर वहाँ कोई कलह है, तो उसका समाधान बातचीत और सूझबूझ से खोजो, मायके को लूटने से ससुराल में कभी इज्जत नहीं मिलेगी। तुम मेरी लाडली बिटिया थी, लेकिन जब तुमने अपने भाइयों के साथ मिलकर हमारे आशियाने को बेचने की बात सोची, तो तुमने मेरा भरोसा तोड़ा। फिर भी तुम इस घर की बेटी हो। यह घर तुम्हारे लिए हमेशा खुला रहेगा, लेकिन एक स्वाभिमानी बेटी बनकर आओगी तब, किसी हिस्सेदार की तरह नहीं।”

 रेलवे के वरिष्ठ लेखा अधिकारी पद से सेवानिवृत्त होकर देवेश्वर बाबू अपने पैतृक गाँव रामपुर की चौखट पर पहुँचे थे। बत्तीस वर्षों की अनवरत सेवा के बाद जब इंसान अपनी ही मिट्टी में लौटता है, तो उसके सीने में अपनों के साथ सुकून के दो पल बिताने की गहरी अभिलाषा होती है। देवेश्वर जी भी उसी उम्मीद से भरे हुए थे। उनके आने के ठीक एक सप्ताह बाद दीपावली का पर्व था। तभी अचानक आँगन में एक के बाद एक टैक्सियाँ आकर रुकीं। बड़ी गाड़ी से बड़ा बेटा समर अपनी पत्नी रूपाली के साथ उतरा, दूसरी गाड़ी से छोटा बेटा मयंक अपनी पत्नी तन्वी के साथ निकला, और सबसे पीछे वाली गाड़ी से उनकी इकलौती बेटी शालिनी अपने दोनों बच्चों को लेकर उतरी।

देवेश्वर जी चबूतरे पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। अपनी आँखों के सामने तीनों बच्चों को एक साथ उतरते देख एक पल के लिए उनका चेहरा चमक उठा, लेकिन अगले ही क्षण उनके माथे पर चिंता और संदेह की गहरी लकीरें खिंच गईं। शालिनी की शादी को सात वर्ष हो चुके थे और पिछले चार सालों से उसने कभी गाँव का रुख नहीं किया था। हर तीज-त्योहार पर पूछने पर उसका एक ही जवाब होता था कि बच्चों की पढ़ाई और ससुराल की जिम्मेदारियों के चलते छुट्टी नहीं मिल पाती। आज अचानक तीनों भाई-बहन का एक साथ, एक ही दिन, बिना किसी पूर्व सूचना के यूँ पहुँच जाना किसी सामान्य पारिवारिक मिलन का संकेत नहीं लग रहा था।

देवेश्वर जी ने कमरे में जाकर अपनी पत्नी मनोरमा से कहा, “मनोरमा, देख रही हो? तीनों बच्चे एक साथ आए हैं। शालिनी तो चार बरस बाद मायके की दहलीज लांघ रही है। मुझे तो कुछ अनहोनी की बू आ रही है। कहीं कोई भारी विपदा तो नहीं आ गई इन पर?”

मनोरमा जी, जो गाँव के ही कस्तूरबा बालिका विद्यालय में प्रधानाध्यापिका थीं और जिनकी सेवानिवृत्ति में अभी दो वर्ष शेष थे, उन्होंने अपने चश्मे को ठीक किया और एक गहरी सांस खींचते हुए बोलीं, “आप बिल्कुल निश्चिंत रहिए, कोई विपदा नहीं आई है बल्कि ये खुद हम पर विपदा बनकर टूटने आए हैं। कल रात ही मेरी बड़ी बहू रूपाली से फोन पर बात हो रही थी तो बातों-बातों में उसने सब उगल दिया था। इन तीनों ने शहर में बैठकर पूरी योजना तैयार की है। आपकी ग्रेच्युटी, पीएफ और यहाँ की पाँच एकड़ पुश्तैनी उपजाऊ जमीन और इस चार कमरों के पक्के मकान का बँटवारा करने आए हैं ये लोग। सबने शहर में अपने-अपने लिए फ्लैट देख रखे हैं और बयाना देने की तारीख तय कर ली है।”

देवेश्वर जी एकटक अपनी पत्नी का चेहरा देखते रह गए। जिस घर को उन्होंने अपने पसीने की एक-एक बूँद से सींचा था, जिस जमीन को उनके पूर्वजों ने माँ की तरह पूजा था, उसे औलाद ने महज एक व्यावसायिक सौदे का टुकड़ा समझ लिया था। उन्होंने अपने भीतर उमड़ते आक्रोश को दबाया और तय किया कि दीपावली का पवित्र त्योहार बीत जाने तक वे खामोश रहेंगे।

दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन बड़े धूमधाम से हुआ। दीपों की पंक्तियों ने हवेली को जगमगा दिया, लेकिन उस रोशनी के पीछे रिश्तों की सियाही घुल रही थी। रात का खाना खाने के बाद जैसे ही सब दालान में जमा हुए, समर ने खंखारते हुए बात की शुरुआत की, “बाबूजी, अब आप भी रिटायर हो गए हैं और अम्मा की नौकरी भी बस कुछ ही महीनों की बची है। गाँव में रहकर अब आप लोग इतनी बड़ी संपत्ति और जमीन का क्या करेंगे? देखरेख भी नहीं हो पाती। हम तीनों ने आपस में बैठकर बात कर ली है। अगर इस मकान और जमीन को किसी बिल्डर को दे दिया जाए या बेच दिया जाए, तो कम से कम दो करोड़ रुपये आसानी से मिल जाएंगे। हम तीनों को अपना-अपना हिस्सा मिल जाएगा तो हम शहर में अपना स्वतंत्र आशियाना बना सकेंगे। आप और अम्मा हमारे साथ शहर में बारी-बारी से रह लीजिएगा, वहाँ चिकित्सा सुविधाएँ भी अच्छी हैं।”

मयंक ने तुरंत बड़े भाई के सुर में सुर मिलाया, “हाँ बाबूजी, भैया बिल्कुल दुरुस्त कह रहे हैं। गाँव में रखा ही क्या है? यहाँ जमीन सहेजने के चक्कर में हम शहर में किराए के मकानों में पिस रहे हैं। और आपकी रिटायरमेंट का जो पैसा मिला है, उसे भी हम तीनों में बराबर बाँट दीजिए ताकि हम अपने कर्जे चुका सकें।”

शालिनी भी पीछे नहीं रही। उसने मासूमियत का मुखौटा ओढ़ते हुए कहा, “बाबूजी, आज के जमाने में बेटियों को भी बराबर का हक मिलता है। मेरे ससुराल में भी व्यापार में भारी घाटा हुआ है। अगर मुझे मेरा हिस्सा मिल जाए तो हम अपना अलग कारोबार शुरू कर सकते हैं। आप तो हमेशा कहते थे कि बेटी और बेटे में कोई फर्क नहीं होता।”

देवेश्वर बाबू चुपचाप एक-एक चेहरे को पढ़ रहे थे। उनकी आँखों में ममता की जगह अब एक अनुभवी और कठोर प्रशासक की चमक उभर आई थी। वे शांत स्वर में बोले, “हिस्सा? किस बात का हिस्सा मांग रहे हो तुम लोग मुझसे? क्या इस जमीन की एक इंच भी मिट्टी तुम लोगों ने खरीदी है? क्या इस पक्के मकान की एक भी ईंट तुम लोगों की कमाई से लगी है? बत्तीस साल तक मैंने दिन-रात एक करके तुम तीनों को नामी कॉलेजों में पढ़ाया, डिग्रियां दिलवाईं, शादियाँ कीं। अगर हिसाब ही करना है तो पहले मेरे उस पसीने का, उस परवरिश का और उन लाखों रुपयों का हिसाब चुकाओ जो मैंने तुम लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए खर्च किए। तुम लोग जो शहर में ठाठ की नौकरियां कर रहे हो, उस काबिल मैंने बनाया है। अपना सामान बाँधो, अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों को संभालो और इसी वक्त मेरे घर की चौखट से बाहर निकल जाओ।”

समर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, “बाबूजी, आप यह कैसी बात कर रहे हैं? अम्मा, आप चुप क्यों बैठी हैं? आप समझाइए बाबूजी को!”

मनोरमा जी अपनी जगह से उठीं और उनके स्वर में एक कड़ा अनुशासन था, “तुम्हारे बाबूजी बिल्कुल सच कह रहे हैं। कल रात से तुम लोगों के कमरों से जो फुसफुसाहटें आ रही थीं, मैं सब सुन रही थी। तुम लोग हमारे जीते जी हमें बेदखल करने का सपना देख रहे थे। यहाँ तक कि मयंक की पत्नी कह रही थी कि अगर बूढ़े नहीं माने तो किसी अच्छे वृद्धाश्रम में इनका दाखिला करवा देंगे। क्या यही संस्कार दिए थे हमने तुम लोगों को? इन बहुओं को देखो, जिन्हें हमने अपनी बेटी समझा, वे हमारे ही घर को नीलाम करने का ताना-बाना बुन रही हैं। शर्म आनी चाहिए तुम लोगों को। जितनी जल्दी हो सके यहाँ से चले जाओ, हमें किसी के अहसान की जरूरत नहीं है।”

माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि दोनों बेटों ने तुरंत अपने बैग उठाए और गुस्से में बड़बड़ाते हुए बाहर निकल गए। समर ने जाते-जाते दरवाजे पर खड़े होकर कहा, “याद रखिएगा बाबूजी, अब आपके बुलाने पर भी हम कभी इस गाँव में कदम नहीं रखेंगे!”

देवेश्वर जी ने बिना विचलित हुए कहा, “दीपावली पर भी मैंने तुम्हें कोई निमंत्रण पत्र नहीं भेजा था। तुम लोग अपनी लालच की भूख मिटाने आए थे। जब तक हम दोनों जीवित हैं, इस जमीन की एक धूर भी किसी के हाथ नहीं लगेगी।”

दोनों बेटे अपनी गाड़ियों में सवार होकर रात के अंधेरे में ही रवाना हो गए। लेकिन शालिनी वहीं बरामदे में एक कोने में अपनी अटैची पर बैठी रह गई। उसकी ट्रेन शाम चार बजे की थी। भाइयों ने निकलते वक्त अपनी बहन से एक बार भी नहीं पूछा कि वह इतनी दूर स्टेशन कैसे पहुँचेगी और इतने भारी सामान के साथ अकेले कैसे जाएगी। जिस स्वार्थ के लिए वे एक हुए थे, स्वार्थ टूटते ही उनका भाईचारा भी हवा हो गया।

दोपहर के समय देवेश्वर जी खेत की मेड़ों का मुआयना करके लौटे, तो उन्होंने देखा कि शालिनी आँगन में अकेली गुमसुम बैठी रो रही है। देवेश्वर जी का कठोर पिता अंदर से पिघलने लगा। वे धीमे कदमों से आगे बढ़े और अपनी बेटी के सिर पर स्नेह से हाथ रख दिया।

शालिनी फूट-फूट कर रो पड़ी, “बाबूजी, मुझे क्षमा कर दीजिए। भैया लोगों की बातों में आकर मैं अंधी हो गई थी। ससुराल में सचमुच बहुत कलह है। सास और ननदें रोज ताने देती हैं कि तुम्हारे पिता तो बड़े अफसर हैं, रिटायर हुए हैं तो कुछ धन लेकर आओ ताकि अलग मकान बन सके। उसी दबाव में मैं यहाँ आ गई थी।”

देवेश्वर जी ने उसे कुर्सी पर बैठाया और पानी का गिलास थमाते हुए गंभीर स्वर में समझाया, “बेटी, पराई या माँगी हुई दौलत से कभी किसी का घर नहीं बसता। सम्मान और सुख हमेशा अपनी मेहनत और समझदारी से मिलता है। तुम्हारे ससुर एक प्रतिष्ठित शिक्षक रहे हैं, तुम्हारे पति एक होनहार इंजीनियर हैं। अगर वहाँ कोई कलह है, तो उसका समाधान बातचीत और सूझबूझ से खोजो, मायके को लूटने से ससुराल में कभी इज्जत नहीं मिलेगी। तुम मेरी लाडली बिटिया थी, लेकिन जब तुमने अपने भाइयों के साथ मिलकर हमारे आशियाने को बेचने की बात सोची, तो तुमने मेरा भरोसा तोड़ा। फिर भी तुम इस घर की बेटी हो। यह घर तुम्हारे लिए हमेशा खुला रहेगा, लेकिन एक स्वाभिमानी बेटी बनकर आओगी तब, किसी हिस्सेदार की तरह नहीं।”

तभी मनोरमा जी अंदर से आईं। उनके हाथ में मखमल की एक छोटी सी डिब्बी थी। उन्होंने डिब्बी शालिनी की हथेली पर रख दी। शालिनी ने खोलकर देखा तो उसमें सोने के वही पारंपरिक झुमके थे जो देवेश्वर जी ने शालिनी के जन्म पर बनवाए थे और जिसे पहनकर वह बचपन में नाचा करती थी। मनोरमा जी ने कहा, “बेटी कभी मायके से खाली हाथ नहीं जाती। यह तुम्हारी बेटी के लिए है। जाओ और अपने परिवार को प्रेम से जोड़ो।”

शालिनी की आँखें आत्मग्लानि और कृतज्ञता के आँसुओं से भीग गईं। उसने बाबूजी और माँ के पैर छुए और गाँव के पुराने वफादार ड्राइवर हरखू की जीप में बैठकर स्टेशन की ओर रवाना हो गई।

उस रात घर में गहरा सन्नाटा था। चूल्हा ठंडा पड़ा था। देवेश्वर जी खिड़की के पास खड़े होकर बाहर फैले अंधियारे खेतों को देख रहे थे। उनकी आँखों में एक अजीब सा खालीपन था। मनोरमा जी ने उनके कंधे पर हाथ रखा, “इतने उदास क्यों हो रहे हैं आप? जिन बच्चों को हमने अपना समझा, वे तो हमें वृद्धाश्रम भेजने की योजना बना रहे थे। अच्छा हुआ कि समय रहते उनका नकाब उतर गया।”

देवेश्वर जी ने गहरी सांस ली, “उदास इसलिए नहीं हूँ कि बच्चे चले गए, बल्कि इसलिए हूँ कि अब इस जीवन का उद्देश्य क्या बचा? बत्तीस साल तक जिनके लिए दौड़ता रहा, वही पराए हो गए। अब यह खाली घर, यह पाँच एकड़ जमीन और यह बची हुई जिंदगी कैसे कटेगी?”

मनोरमा जी मुस्कुराईं और उनका आत्मविश्वास देवेश्वर जी के भीतर एक नई ऊर्जा भरने लगा। वे बोलीं, “किसने कहा कि जीवन खत्म हो गया? अभी तो असली जीवन शुरू हुआ है। आपके पास आपकी अच्छी-खासी पेंशन है, मेरे पास अभी दो साल की नौकरी है। हमारे गाँव के किसान और मजदूर देखिए। हरखू का बेटा सुखदेव और पड़ोस के रामचरण के दोनों लड़के शहर में मजदूरी करने जाते हैं, जहाँ ठेकेदार उनका शोषण करते हैं और दो वक्त की सूखी रोटी भी नसीब नहीं होती। हमारी पाँच एकड़ जमीन उपजाऊ है, ट्यूबवेल लगा हुआ है। हम इन नौजवानों को अपने साथ जोड़ेंगे। हम पारंपरिक खेती की जगह जैविक खेती और औषधीय पौधों की खेती शुरू करेंगे। जो मुनाफा होगा, उसका सत्तर प्रतिशत हम इन काम करने वाले लड़कों को देंगे और तीस प्रतिशत से इस गाँव के गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए एक ट्रस्ट बनाएंगे।”

देवेश्वर जी की आँखों में चमक आ गई, “मनोरमा, तुम सच कह रही हो! जब अपनी संतानों ने केवल लेना सीखा, तो क्यों न हम इस गाँव के उन बच्चों को देना सीखें जिन्हें सचमुच सहारे की जरूरत है। हम केवल मालिक नहीं बनेंगे, हम उनके मार्गदर्शक बनेंगे।”

अगली ही सुबह से देवेश्वर बाबू की नई दिनचर्या शुरू हो गई। उन्होंने हरखू, सुखदेव और गाँव के चार बेरोजगार युवाओं को बुलाया। दालान में बैठकर योजना बनी। देवेश्वर जी ने अपनी बचत से उन्नत किस्म के बीज, आधुनिक जैविक खाद और ड्रिप इरिगेशन की व्यवस्था की। सुखदेव और उसके साथियों की आँखों में उम्मीद का नया सवेरा तैरने लगा। वे अपनी पूरी लगन और ईमानदारी से खेत में जुट गए। देवेश्वर जी खुद सुबह पाँच बजे गमछा बांधकर खेत की मेड़ों पर खड़े हो जाते, कभी फावड़ा चलाते तो कभी पौधों की छँटाई करते। जो हाथ कभी फाइलों के पन्नों पर कलम घिसते थे, वे अब धरती माँ का सीना सहलाकर सोना उगाने लगे थे।

छह महीने बीतते-बीतते खेतों की सूरत बदल गई। लहलहाती हरी सब्जियाँ, जैविक टमाटर और स्ट्रॉबेरी की पैदावार देखकर पूरा इलाका दंग रह गया। पास के बड़े कस्बों और मंडियों के व्यापारी सीधे खेत पर आकर माल खरीदने लगे। पहली ही फसल में लाखों का मुनाफा हुआ।

देवेश्वर जी ने पंचायत भवन में गाँव के सभी लोगों को इकट्ठा किया। उन्होंने भरी सभा में सुखदेव और उसके साथियों को उनका पचहत्तर प्रतिशत हिस्सा चेक के रूप में सौंपा। जब उन गरीब मजदूरों के हाथों में मेहनत की इतनी बड़ी गाढ़ी कमाई आई, तो उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। सुखदेव ने देवेश्वर जी के चरण स्पर्श करते हुए कहा, “बाबूजी, शहर में हमें कीड़े-मकोड़े समझा जाता था। आपने हमें न केवल रोजी-रोटी दी, बल्कि अपने सीने से लगाकर एक पिता जैसा मान दिया। हम जीते जी इस माटी और आपका साथ कभी नहीं छोड़ेंगे।”

उसी दिन देवेश्वर जी और मनोरमा जी ने घोषणा की कि उनके हिस्से के मुनाफे से गाँव की बेटियों के लिए एक नि:शुल्क डिजिटल कंप्यूटर केंद्र और सिलाई प्रशिक्षण केंद्र खोला जाएगा।

इधर शहर में, समर और मयंक की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ने लगी थी। जिस रियल एस्टेट में उन्होंने बिना सोचे-समझे हाथ डाला था, उसमें भारी मंदी आ गई। मयंक की नौकरी में छँटनी हो गई और समर पर भारी बैंक कर्ज चढ़ गया। बहुओं के रोज-रोज के झगड़ों और कलह ने दोनों भाइयों का जीना दूभर कर दिया था। जब उन्हें खबर मिली कि बाबूजी ने गाँव में न केवल लाखों का कृषि साम्राज्य खड़ा कर लिया है, बल्कि पूरे जिले में उनका नाम एक आदर्श समाजसेवी के रूप में गूँज रहा है, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

अगले साल होली के अवसर पर, समर और मयंक अपनी पत्नियों के साथ चुपचाप गाँव पहुँचे। लेकिन इस बार उनके चेहरों पर वह पुराना अहंकार नहीं था, बल्कि पश्चाताप और शर्मिंदगी थी। वे जब हवेली के आँगन में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि शालिनी भी अपने पति और बच्चों के साथ आई हुई थी, लेकिन वह किसी हिस्से की मांग लेकर नहीं, बल्कि माँ-बाबूजी के लिए अपने हाथों से गुझिया बनाकर लाई थी। पूरा आँगन गाँव के खुशहाल लोगों और हँसते-खेलते बच्चों से भरा हुआ था।

समर और मयंक आगे बढ़े और बिना कुछ कहे बाबूजी के पैरों में गिर पड़े। समर रोते हुए बोला, “बाबूजी, हमें क्षमा कर दीजिए। हमने स्वार्थ में आकर उस डाली को ही काटने की कोशिश की थी जिसने हमें छाँव दी थी। शहर की चमक-दमक ने हमारी आँखें अंधी कर दी थीं। आज हम आपसे कोई हिस्सा मांगने नहीं आए हैं, बस अपनी उस भूल की माफी मांगने आए हैं जिसने हमें इंसान से हैवान बना दिया था।”

देवेश्वर बाबू ने दोनों बेटों को उठाकर गले से लगा लिया। उनकी आँखें नम थीं लेकिन चेहरा स्वाभिमान से दमक रहा था। उन्होंने कहा, “देर आए दुरुस्त आए। संपत्ति का बँटवारा तो कोई भी कर सकता है, लेकिन जो परिवार के सुख-दुख को बाँटना सीख जाए, वही सच्चा बेटा है। यह घर और यह जमीन किसी एक की जागीर नहीं है, यह संस्कारों की धरोहर है। अगर तुम लोग अपनी मिट्टी से जुड़कर ईमानदारी से जीना चाहते हो, तो इस गाँव में और हमारे दिल में तुम्हारे लिए हमेशा जगह है।”

उस दिन हवेली के आँगन में केवल अबीर और गुलाल ही नहीं उड़ा, बल्कि टूटे हुए पारिवारिक रिश्ते भी एक नई समझ और प्रेम के रंग में रंग गए। देवेश्वर बाबू और मनोरमा जी ने यह साबित कर दिया था कि उम्र कभी किसी को लाचार नहीं बनाती, यदि सोच सकारात्मक हो और स्वाभिमान जिंदा हो, तो जीवन की ढलती सांझ भी एक सुनहरी भोर बन सकती है।

आपकी राय हमारे लिए अनमोल है: आज के समय में जब बच्चे माता-पिता की गाढ़ी कमाई और पैतृक संपत्ति को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझकर उन पर हुक्म चलाने लगते हैं, तो क्या देवेश्वर बाबू की तरह कड़ा फैसला लेना उचित था? क्या माता-पिता को अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी संपत्ति बच्चों में तुरंत बाँट देनी चाहिए या अपने स्वाभिमान और भविष्य के लिए सुरक्षित रखनी चाहिए? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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