परंपरा और आधुनिकता की पहेली

अनन्या अवाक रह गई। वह कुछ बोल ही नहीं पा रही थी। आधुनिकता की तमाम दलीलें देने वाली अनन्या को अचानक अपनी ही भारतीय जड़ों का एहसास होने लगा। उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ने लगा। ‘होने वाले सास-ससुर के सामने मैं एक ही कमरे में रोहन के साथ कैसे रहूँगी? मैं उनके सामने सुबह-सुबह बिना शादी के किस रिश्ते से चाय लेकर जाऊँगी? वे मुझे क्या समझेंगे?’ उसकी सारी ‘प्रैक्टिकल’ सोच इस एक सामाजिक और सांस्कृतिक झिझक के आगे धरी की धरी रह गई। हम कितने भी मॉडर्न क्यों न हो जाएं, हमारे अवचेतन मन में बसी मर्यादा और शर्म कभी नहीं जाती।

बेंगलुरु की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और आसमान छूती इमारतों के बीच, रोहन ने जब पहली बार कदम रखा था, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी घबराहट थी। राजस्थान के एक छोटे से कस्बे से निकलकर इस आईटी हब में आना उसके लिए किसी बड़े सपने के सच होने जैसा था। रोहन ने अपनी पूरी शिक्षा हिंदी माध्यम से और सरकारी स्कूलों से की थी। वह पढ़ने में मेधावी था, इसी के दम पर उसने अपनी एमसीए की डिग्री बहुत अच्छे अंकों से पास की और उसे इस नामी बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी मिल गई।

शुरुआती दिन रोहन के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं थे। उसका पहनावा, बालों में तेल लगाने का तरीका, बात-बात पर ‘जी’ कहना और उसकी टूटी-फूटी अंग्रेजी ऑफिस के लोगों के लिए मज़ाक का विषय बन गई थी। उसके सहकर्मी उसे ‘देसी बाबू’ या ‘किताबी कीड़ा’ कहकर चिढ़ाते थे। रोहन कैंटीन में भी अकेला ही बैठता था क्योंकि पिज़्ज़ा और पास्ता खाने वाले उस समूह में उसे अपनी दाल-रोटी का टिफिन खोलने में संकोच होता था। उसे पार्टियों में जाना, ब्रांडेड कपड़े पहनना या दिखावा करना बिल्कुल नहीं आता था।

लेकिन रोहन कमज़ोर मिट्टी का नहीं बना था। उसने लोगों के तानों को अपनी ढाल बना लिया। उसने तय किया कि वह अपनी जड़ों को बिना छोड़े, इस नए शहर के तौर-तरीकों को सीखेगा। उसने अपनी कम्युनिकेशन स्किल्स पर काम किया, अपने पहनावे में थोड़ा बदलाव किया और सबसे बड़ी बात, अपने काम से सबको चौंका दिया। महज़ डेढ़ साल के भीतर, रोहन ऑफिस का सबसे बेहतरीन एम्प्लॉई बन गया। उसके कोडिंग स्किल्स और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की तारीफ बड़े-बड़े बॉस भी करने लगे। अब जो लोग कल तक उसकी पीठ पीछे हँसते थे, वही आज काम फँसने पर सबसे पहले रोहन की डेस्क पर खड़े नज़र आते थे।

इसी बदलाव ने ऑफिस की कई लड़कियों का ध्यान भी उसकी ओर खींचा। जो लड़कियाँ पहले उसे देखकर मुँह फेर लेती थीं, अब वे कॉफी मशीन के पास उससे बात करने के बहाने ढूँढ़ने लगी थीं। इन्हीं में से एक थी अनन्या।

अनन्या दिल्ली की एक बेहद आत्मविश्वासी, खूबसूरत और आधुनिक विचारों वाली लड़की थी। वह एक संपन्न परिवार से थी। उसके पिता एक बड़े बिजनेसमैन थे, लेकिन अनन्या अपनी पहचान खुद बनाना चाहती थी। वह आत्मनिर्भरता में विश्वास रखती थी और किसी पर निर्भर होना उसके स्वभाव में नहीं था। शुरुआत में अनन्या भी रोहन को बहुत ही ‘बोरिंग’ और ‘पुराने ख्यालों’ वाला मानती थी, लेकिन जब दोनों को एक ही महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में साथ काम करने का मौका मिला, तो अनन्या की सोच बदलने लगी। उसने देखा कि रोहन दिखावे से बहुत दूर, एक बेहद सुलझा हुआ, ईमानदार और महिलाओं का सम्मान करने वाला इंसान है। उसकी सादगी और काम के प्रति उसकी लगन ने अनन्या के दिल में एक खास जगह बना ली।

प्रोजेक्ट की मीटिंग्स, लेट नाइट शिफ्ट्स और कैंटीन की कॉफी के बीच दोनों की दोस्ती गहरी होती गई और यह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, इसका एहसास दोनों को ही नहीं हुआ। रोहन के दिल में भी अनन्या के लिए बहुत इज़्ज़त और प्यार था। एक शाम, ऑफिस के बाद दोनों एक शांत रेस्टोरेंट में बैठे थे, तभी रोहन ने हिम्मत करके अपने दिल की बात अनन्या के सामने रख दी। अनन्या तो जैसे इसी पल का इंतज़ार कर रही थी, उसने बिना पलक झपकाए मुस्कुराकर हाँ कर दी।

इसके बाद तो दोनों अक्सर साथ समय बिताने लगे। वीकेंड्स पर साथ घूमना, मूवी देखना और एक-दूसरे की पसंद-नापसंद को समझना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। एक दिन पार्क में टहलते हुए रोहन ने कहा, “अनन्या, मुझे लगता है कि अब हमें अपने रिश्ते को एक कदम और आगे ले जाना चाहिए। हमें अपने घरवालों से बात कर लेनी चाहिए ताकि हम शादी के बंधन में बंध सकें।”

रोहन ने एक गहरी साँस ली और आगे कहा, “देखो अनन्या, मैं तुम्हें पहले ही बता देना चाहता हूँ कि मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान हूँ। उन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाने के लिए बहुत संघर्ष किया है। शादी के बाद मेरे माता-पिता हमारे साथ ही रहेंगे, यह मेरी ज़िम्मेदारी भी है और मेरी ख्वाहिश भी।”

अनन्या ने मुस्कुराते हुए रोहन का हाथ थाम लिया, “रोहन, मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है। मैं जानती हूँ कि परिवार की अहमियत क्या होती है। मुझे उनके साथ रहने में बहुत खुशी होगी।”

रोहन की आँखों में चमक आ गई। “तो फिर किस बात का इंतज़ार है? मैं आज ही बाबूजी को फोन करके तुम्हारे बारे में बताता हूँ।”

“रुको रोहन,” अनन्या ने अचानक उसे टोकते हुए कहा। उसके चेहरे पर थोड़ी गंभीरता आ गई थी। “शादी को लेकर मेरा नज़रिया थोड़ा अलग है। मैं चाहती हूँ कि शादी जैसे बड़े फैसले से पहले हम कुछ समय के लिए ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रहें।”

रोहन का हाथ अचानक अनन्या के हाथ से छूट गया। यद्यपि उसने दुनिया देखी थी, लेकिन एक छोटे से कस्बे के संस्कारों में पले-बढ़े रोहन के लिए यह शब्द किसी झटके से कम नहीं था। “लिव-इन रिलेशनशिप? तुम्हारा मतलब है कि बिना शादी के हम पति-पत्नी की तरह एक ही घर में रहें?” उसने अविश्वास से पूछा।

अनन्या ने बहुत ही सहजता से जवाब दिया, “हाँ रोहन, इसमें इतना हैरान होने वाली क्या बात है? आज के समय में यह बहुत आम है। तुम खुद सोचो, अरेंज मैरिज में हम एक अजनबी से शादी कर लेते हैं, शुरुआत के कुछ महीने सब अच्छा लगता है, लेकिन जब हम एक ही छत के नीचे रहते हैं, तब असली कमियाँ सामने आती हैं। आदतें नहीं मिलतीं, छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते हैं और कई बार बात तलाक तक पहुँच जाती है। मैं नहीं चाहती कि हमारा रिश्ता उस मोड़ पर आए। अगर हम शादी से पहले एक या दो साल साथ रहेंगे, तो हम एक-दूसरे को बेहतर समझ पाएंगे। हमारी आदतें, हमारा रहन-सहन मैच करता है या नहीं, यह पता चल जाएगा। अगर सब ठीक रहा तो हम शादी कर लेंगे, और अगर लगा कि हम साथ नहीं रह सकते, तो बिना किसी कानूनी पचड़े या कड़वाहट के अपनी-अपनी राह चले जाएंगे।”

रोहन का दिमाग सुन्न हो गया था। “लेकिन अनन्या, अगर इस बीच कोई अनचाही स्थिति आ गई, मतलब… अगर तुम प्रेग्नेंट हो गई तो?”

अनन्या थोड़ी झुंझलाई, “अरे रोहन, हम पढ़े-लिखे लोग हैं। हमें पता है कि खुद को कैसे सुरक्षित रखना है। तुम उन सब बातों की चिंता अभी से क्यों कर रहे हो? तुम पहले साथ रहने के कॉन्सेप्ट पर तो विचार करो।”

रोहन के लिए यह सब बहुत भारी हो रहा था। उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, “अनन्या, मुझे थोड़ा समय चाहिए। मैं इस तरह के परिवेश से नहीं हूँ। मुझे यह सब समझने और सोचने के लिए वक़्त चाहिए।”

अनन्या ने सहमति में सिर हिलाया, “बिल्कुल रोहन, तुम आराम से सोच लो। मैं कोई दबाव नहीं डाल रही, बस मैं चाहती हूँ कि हम जो भी फैसला लें, वह प्रैक्टिकल हो।”

उस रात रोहन सो नहीं पाया। उसका दिल और दिमाग एक अजीब सी कशमकश में फँस गए थे। एक तरफ वह लड़की थी जिससे वह बेइंतहा प्यार करता था, और दूसरी तरफ उसके वे संस्कार थे जिन्हें वह चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था। ऐसे समय में जब भी वह दुविधा में होता, उसे सिर्फ एक ही इंसान की याद आती थी—उसके पिता, रमाकांत जी। रमाकांत जी भले ही एक कस्बे में परचून की दुकान चलाते थे, लेकिन उनकी सोच और तजुर्बा किसी बड़े फिलॉसफर से कम नहीं था। वे रोहन के पिता कम और दोस्त ज़्यादा थे।

अगली सुबह रोहन ने अपने पिता को फोन किया और पूरी ईमानदारी से उन्हें अनन्या के बारे में और उसकी ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ वाली शर्त के बारे में बता दिया। रमाकांत जी ने पूरी बात बहुत शांति से सुनी। उन्होंने कोई गुस्सा नहीं किया, कोई ताना नहीं मारा। थोड़ी देर की खामोशी के बाद वे मुस्कुराए और उन्होंने रोहन को एक सलाह दी। उन्होंने कहा, “बेटा, उसकी बात भी अपनी जगह प्रैक्टिकल है। तुम उसे बस मेरी ये एक बात कह देना, फिर जो उसका जवाब हो, मुझे बताना।”

शाम को रोहन और अनन्या फिर से एक कैफे में मिले। अनन्या को उम्मीद थी कि रोहन शायद मना कर देगा।

“तो रोहन, क्या सोचा तुमने?” अनन्या ने कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए पूछा।

रोहन ने एक लंबी साँस ली और कहा, “अनन्या, मैंने बहुत सोचा। तुम्हारी बात में लॉजिक है। तुम चाहती हो कि शादी के बाद हमारी ज़िंदगी में कोई परेशानी न हो, इसलिए तुम पहले ही हमारी कम्पैटिबिलिटी चेक करना चाहती हो। ताकि भविष्य में हमें एक-दूसरे की आदतों से कोई दिक्कत न हो, सही कहा ना?”

अनन्या का चेहरा खुशी से खिल उठा। “बिल्कुल सही! मुझे खुशी है कि तुमने मेरी बात को इतने पॉजिटिव तरीके से समझा।”

रोहन ने आगे कहा, “लेकिन अनन्या, तुमने एक बात मिस कर दी। मैंने तुमसे कहा था कि शादी के बाद मेरे माता-पिता भी हमारे साथ ही रहेंगे। जब हम भविष्य की परेशानियों से बचने के लिए साथ रहने का ट्रायल कर रहे हैं, तो यह ट्रायल पूरा होना चाहिए ना? इसलिए मैंने तय किया है कि इस लिव-इन रिलेशनशिप में हम दोनों के साथ मेरे माता-पिता भी रहेंगे। ताकि तुम्हें उनके साथ एडजस्ट होने का मौका मिले और उन्हें तुम्हारे साथ। कल को शादी के बाद तुम्हें उनकी किसी आदत से या उन्हें तुम्हारी किसी बात से परेशानी हो गई, तो वे बुढ़ापे में कहाँ जाएंगे? इसलिए बेहतर है कि हम चारों एक साथ रहकर देख लें।”

यह सुनते ही अनन्या के चेहरे की रंगत उड़ गई। उसके हाथ से कॉफी का कप छलकते-छलकते बचा। “क्या? तुम्हारे माता-पिता भी हमारे साथ रहेंगे? बिना शादी के?”

रोहन ने मासूमियत से कहा, “हाँ, इसमें क्या परेशानी है? जब पति-पत्नी बिना शादी के रह सकते हैं, तो होने वाले सास-ससुर क्यों नहीं?”

अनन्या अवाक रह गई। वह कुछ बोल ही नहीं पा रही थी। आधुनिकता की तमाम दलीलें देने वाली अनन्या को अचानक अपनी ही भारतीय जड़ों का एहसास होने लगा। उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ने लगा। ‘होने वाले सास-ससुर के सामने मैं एक ही कमरे में रोहन के साथ कैसे रहूँगी? मैं उनके सामने सुबह-सुबह बिना शादी के किस रिश्ते से चाय लेकर जाऊँगी? वे मुझे क्या समझेंगे?’ उसकी सारी ‘प्रैक्टिकल’ सोच इस एक सामाजिक और सांस्कृतिक झिझक के आगे धरी की धरी रह गई। हम कितने भी मॉडर्न क्यों न हो जाएं, हमारे अवचेतन मन में बसी मर्यादा और शर्म कभी नहीं जाती।

अनन्या ने हड़बड़ाते हुए कहा, “रोहन… मुझे थोड़ा सोचने का समय चाहिए।” और वह अपना पर्स उठाकर वहाँ से चली गई।

अगले तीन दिन तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई। चौथे दिन अनन्या खुद रोहन की डेस्क पर आई और उसे बाहर चलने का इशारा किया। बाहर आकर उसने रोहन की आँखों में देखा और कहा, “रोहन, तुमने मुझे बहुत बड़ा सबक दिया है। रिश्ते किसी ट्रायल रूम के कपड़े नहीं होते जिन्हें पहनकर देखा जाए और फिट न आएं तो वापस कर दिया जाए। रिश्ते विश्वास, समझौते और समर्पण से बनते हैं। मैं तुम्हारे माता-पिता के सामने बिना शादी के तुम्हारे साथ एक कमरे में रहने की कल्पना भी नहीं कर सकती। मेरी आत्मा इस बात की गवाही नहीं देती। इसलिए… अगर तुम चाहो, तो हम सीधे शादी की बात आगे बढ़ा सकते हैं। मैं पूरी ज़िंदगी तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के साथ हर एडजस्टमेंट करने को तैयार हूँ।”

रोहन के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान छा गई। उसने मन ही मन अपने पिता को धन्यवाद दिया। उसने तुरंत अपने पिता को फोन लगाया और उन्हें यह खुशखबरी दी। रमाकांत जी भी यह सुनकर बहुत खुश हुए।

जल्द ही दोनों परिवारों की मुलाकात हुई। अनन्या के माता-पिता भी रोहन के परिवार की सादगी और विचारों से बहुत प्रभावित हुए। बड़ी धूमधाम से दोनों की शादी संपन्न हुई। आज रोहन और अनन्या बेंगलुरु में अपने माता-पिता के साथ एक खुशहाल ज़िंदगी बिता रहे हैं। उनकी एक प्यारी सी बेटी भी है। अनन्या अब अक्सर कहती है कि प्यार को परखने के लिए किसी ‘लिव-इन’ की ज़रूरत नहीं होती, ज़रूरत होती है तो बस एक-दूसरे को समझने की और मुश्किल वक्त में हाथ न छोड़ने के वादे की।

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#परंपरा और आधुनिकता की पहेली

 मूल लेखिका : के कामेश्वरी

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