प्रतिष्ठा का मुखौटा

दीनदयाल जी अपनी बात पूरी कर पाते, उससे पहले ही शेखर सेठ ने उनकी बात काटते हुए तल्ख लहज़े में कहा, “दीनदयाल जी! बात पाँच-सात लाख रुपये के खर्च की नहीं है, बात हमारी ‘हैसियत’ की है। बुआ जी के ससुराल वालों, हमारे पूरे खानदान और शहर के रसूखदार लोगों को पता तो चलना चाहिए … Read more

रिश्तों की डोर: पतंग और आसमान

“तुम्हारे बड़े भाई माधव ने उस धागे की तरह हमेशा तुम्हें थामे रखा,” श्रीधर जी ने आगे कहा। “जब एक्सीडेंट के बाद तुम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, तब उसी धागे ने तुम्हें गिरने नहीं दिया था। आज जब तुम अपने पैरों पर खड़े हो गए हो, तो तुम्हें लग रहा है … Read more

सच्ची तीर्थयात्रा

 “आप कहीं नहीं जाएंगे बाबूजी,” विक्रम ने दृढ़ता से कहा। उसने पीछे मुड़कर देखा और आवाज दी, “मीरा! जरा स्टोर रूम से वह कमोड वाली कुर्सी तो जल्दी से लेकर आना।” “जी, मैं अभी लाई,” मीरा तुरंत कुर्सी लेने दौड़ पड़ी। दीनानाथ जी ने विक्रम का हाथ पकड़ लिया और कांपती हुई आवाज में बोले, … Read more

उजड़ते आंगन में उम्मीद की वापसी

कौशल्या जी ने कांपते हाथों से देवांश का चेहरा उठाया और उसे सीने से लगा लिया। “तू आ गया मेरे बच्चे… तू आ गया। लेकिन तू था कहाँ? हमने तुझे कितना ढूंढा। अंजलि ने तुझे हज़ारों मेल किए, सैकड़ों फोन किए, लेकिन तेरा कोई अता-पता नहीं था। क्या तू हमसे इतना खफा था कि हमारी … Read more

गुरूर की टूटती दीवारें और अपनों का प्यार

विक्रम ने कठोरता से कहा, “माफी मुझसे नहीं, पापाजी से मांगो नीलू । शायद वही तुम्हारे इस कठोर व्यवहार को माफ कर सकें, मैं तो नहीं कर सकता।” नीलू  ने महेश  जी के पैर कसकर पकड़ लिए, “पापाजी, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैं वचन देती हूं कि आज के बाद आपको मुझसे कभी … Read more

देहरी की सूनी आस

 रात को घर पहुंचकर स्नेहा ने सूटकेस से कपड़े वापस निकालने शुरू किए। रिया ने मासूमियत से पूछा, “मम्मा, हम नानी के घर कब जाएंगे?” स्नेहा ने अपने आंसू छुपाते हुए उसे गले से लगा लिया और कहा, “इस बार नहीं बेटा, अगले साल जरूर जाएंगे।” लेकिन सबसे मुश्किल काम था बनारस फोन करना। स्नेहा … Read more

कर्मों का खाता: एक अनकही उधारी

कैलाश की आँखों में भी अब आंसू आ गए थे। उनके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। आदित्य ने कहा, “मैंने रोते हुए आपके पैर पकड़ लिए थे और खुशी के मारे आपको पच्चीस हजार रुपये इनाम के तौर पर देने चाहे थे। मेरे पास शब्द नहीं थे। लेकिन काका, क्या आपको याद है … Read more

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