वंदना की आंखें नम हो गईं। उसने धीरे से कहा, “मां जी सच कह रही हैं आरोही। बाजार की हर चीज में कीमत होती है, पर मां के हाथ के बने उस एक कौर में जो सुरक्षा और बेफिक्री का अहसास होता है, वह दुनिया की किसी दौलत से नहीं खरीदा जा सकता। जब मैं अपनी मां के हाथ का बना एक पापड़ भी सेक कर खाती हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं आज भी वही छोटी बच्ची हूँ जिसके सिर पर मां का हाथ है।”
आंगन के एक कोने में बैठी मालती देवी अपने चश्मे को नाक पर थोड़ा नीचे खिसकाकर बड़े जतन से बड़े से कांसे के परात में आम और कटहल के अचार के लिए मसाले का मिश्रण तैयार कर रही थीं। तभी सीढ़ियों की तरफ से पायल की छम-छम और लड़कियों की खिलखिलाहट की तेज आवाज गूंजी।
“अरे ओ आरोही! जरा संभलकर जा री… अपने पीछे पूरी फौज लेकर छत पर तो चढ़ी जा रही है, पर ध्यान रखना कि मुंडेर के पास जो सफेद सूती चादर पर मैंने अभी-अभी चिप्स और साबूदाने के पापड़ फैलाए हैं, उनमें से किसी पर तुम्हारा पैर न पड़ जाए। सुबह चार बजे उठकर तेरी मां और मैंने घिस-घिस कर तैयार किए हैं।” मालती देवी ने अपनी खुरदुरी मगर ममता भरी आवाज में टोकते हुए ऊपर देखा।
सोलह साल की आरोही, जो अपनी दो हमउम्र सहेलियों मान्या और रिद्धि के साथ सीढ़ियों की पहली पायदान पर थी, तुरंत पलटकर मुसकराई। उसकी आंखों में वही चिर-परिचित शरारत चमक रही थी, जो पूरे घर को हर वक्त जिंदादिल बनाए रखती थी।
“अरे दादी! आप भी न बस हर वक्त हम पर ही शक करती हैं। हम क्या नादान बच्चे हैं जो आपके पापड़ों को रौंद देंगे? और वैसे भी, मुझे अच्छी तरह मालूम है कि यह सारी मशक्कत किसके लिए हो रही है। यह सब दिल्ली वाली आपकी प्यारी बेटी, यानी मेरी प्रिया बुआ के लिए बन रहा है न? और आप शायद भूल रही हैं कि सुबह साबूदाने का घोल चलाते-चलाते मेरे हाथ में भी दर्द होने लगा था, फिर भी आप मुझे ही डांट रही हैं!” आरोही ने नकली नाराजगी जताते हुए अपनी कमर पर हाथ रख लिया।
“देख री बहु, अपनी लाडली बेटी की जुबान! कैसी कैंची की तरह चलती है। बात-बात में नानी याद दिला देती है,” मालती देवी ने रसोई में काम कर रही अपनी बड़ी बहू वंदना को पुकारते हुए कहा, मगर उनके चेहरे पर खिली मुस्कान ने साफ कर दिया कि पोती का यह चुलबुलापन उनके दिल को कितना भाता है। “अरे लाडली तो तू भी मेरी उतनी ही है जितनी प्रिया, पर मुझे डर इस बात का है कि धूप में सूखते कुरकुरे पापड़ देखकर सबसे पहले तेरी ही नीयत फिसलती है। जा, आराम से धूप सेक और अपनी सहेलियों के साथ गपशप कर, पर नजर पापड़ों पर ही रखना।”
“अच्छा-अच्छा, हम जा रहे हैं पहरेदारी करने!” आरोही हंसती हुई अपनी सहेलियों को लेकर धड़धड़ाती हुई छत की ओर भाग गई।
वंदना रसोई से हाथ पोंछते हुए बाहर आई और सासू मां के पास बैठकर मसाला मिलाने में हाथ बंटाने लगी। “मां जी, आरोही बिल्कुल सही कहती है। आप प्रिया के लिए जब भी कुछ बनाती हैं, तो उसमें अपनी पूरी जान झोंक देती हैं। पिछले हफ्ते ही तो आपने आंवले का मुरब्बा और मेथी के लड्डू का एक बड़ा डिब्बा भेजा था, अब यह पापड़ और बड़ियां…”
मालती देवी ने एक गहरी सांस ली, उनके चेहरे की झुर्रियों में बरसों की ममता और यादों की परतें सिमट आईं। वे कुछ कहने ही वाली थीं कि तभी छत से आरोही की तीखी और घबराई हुई चीख सुनाई दी— “दादी! अरे दादी बचाओ! जल्दी आइए दादी… बंदर आ गया!”
यह सुनते ही मालती देवी के हाथ से मसाले का चमचा छूट गया। घुटनों के असहनीय दर्द का जो रोना वे सुबह से रो रही थीं, वह न जाने किस पल में काफूर हो गया। पास में रखी अपनी पुरानी शीशम की छड़ी को मजबूती से थामा और बिना एक पल गंवाए, किसी नौजवान की तरह फुर्ती से सीढ़ियां चढ़ने लगीं। वंदना भी पीछे-पीछे भागी।
छत का दरवाजा खोलते ही मालती देवी ने छड़ी हवा में लहराई और हांफते हुए चिल्लाईं, “कहाँ है बंदर? हट परे… आरोही, तू पीछे हट री!”
लेकिन सामने का नजारा देखकर मालती देवी की सांसें वहीं अटक गईं। छत पर कोई बंदर नहीं था। दूर-दूर तक केवल खुली धूप, नीले आसमान में उड़ती पतंगें और सफेद चादरों पर करीने से सूखते सफेद-सुनहरे पापड़ नजर आ रहे थे। और एक कोने में आरोही, मान्या और रिद्धि अपने दुपट्टे मुंह में दबाकर हंसी रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थीं। अगले ही पल तीनों की हंसी का फव्वारा छूट पड़ा।
“वाह दादी! क्या बात है!” आरोही ताली बजाते हुए आगे बढ़ी, “सुबह जब मां कह रही थी कि दादी जरा सीढ़ियां चढ़कर ऊपर धूप में बैठ जाइए, तो आप कह रही थीं कि ‘अरे री बहू, मेरे तो जोड़ों में इतना दर्द है कि पैर मुड़ते ही नहीं, मुझसे एक सीढ़ी न चढ़ा जाए।’ और अभी देखिए, बिना रुके, बिना हांफे, आप एक सांस में छत पर आ गईं! बंदर का नाम सुनते ही आपका घुटनों का दर्द कहां भाग गया?”
मान्या और रिद्धि भी जोर-जोर से खिलखिलाने लगीं।
मालती देवी ने पहले तो अपनी त्योरी चढ़ाई, फिर अपनी छड़ी को जमीन पर ठोकते हुए बनावटी गुस्से में बोलीं, “अच्छा! तो यह तेरी शैतानी थी? तूने मुझे बेवकूफ बनाया! रुक अभी… आज तेरी इस बंदर वाली नौटंकी की दवा मैं इस छड़ी से ही करती हूँ। रुक तू!”
मालती देवी बच्चों की तरह छड़ी लेकर आगे बढ़ीं और आरोही व उसकी सहेलियां हंसती-चीखती हुई छत के चारों तरफ गोल-गोल दौड़ने लगीं। पूरा माहौल हंसी की खनक और जूतियों की आवाज से गूंज उठा। वंदना भी दरवाजे पर खड़ी होकर अपनी सास और बेटी के इस निश्छल प्रेम को देखकर अपनी हंसी न रोक सकी।
दौड़ते-भागते जब सब पूरी तरह थक गए, तो मालती देवी ने हार मानकर छड़ी एक तरफ रख दी और छत पर बिछी बड़ी सी दरी पर बैठ गईं। आरोही भी हांफते हुए उनके बिल्कुल करीब आई और अपना सिर दादी की गोद में रखकर लेट गई। मान्या और रिद्धि भी संकोच छोड़कर मालती देवी के दोनों तरफ बैठ गईं। धूप अब हल्की गुनगुनी और बेहद सुकून देने वाली लग रही थी।
आरोही ने दादी की साड़ी के पल्लू से खेलती हुई धीरे से पूछा, “दादी, सच-सच बताओ न… एक बात मुझे कभी समझ नहीं आती। प्रिया बुआ खुद इतनी अच्छी कुक हैं। जब वे गर्मियों की छुट्टियों में यहां आती हैं, तो इटैलियन, साउथ इंडियन और यहां तक कि पारंपरिक मिठाइयां भी इतनी स्वादिष्ट बनाती हैं कि हम उंगलियां चाटते रह जाते हैं। जब वे अपने घर में खुद इतना कुछ बना सकती हैं, तो फिर आप हर मौसम में—चाहे ठंड हो या गर्मी—घंटों पसीना बहाकर, अपनी कमर दुखाकर उनके लिए यह सब क्यों बनाती हैं? अचार, बड़ियां, पापड़, पंजीरी, तिल के लड्डू… हर महीने कोई न कोई पार्सल उनके पते पर क्यों जाता है?”
आरोही ने थोड़ा रुककर अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आंखों से दादी की तरफ देखा और बोली, “और हां… यह भी बताइए कि क्या जब मेरी शादी हो जाएगी और मैं किसी दूसरे घर चली जाऊंगी, तब क्या आप मेरे लिए भी ऐसे ही अपने हाथों से चीजें बनाकर भेजा करेंगी?”
मालती देवी ने प्यार से आरोही के गाल पर एक हल्की सी चपत लगाई और मुसकराते हुए बोलीं, “धत् पगली! अभी तो बित्ते भर की है तू, स्कूल की किताबें ठीक से संभालना नहीं आता और बातें अभी से ससुराल और विदाई की करने लगी! और तेरे ब्याह तक क्या मैं यह सब करने के लिए बैठी रहूंगी?”
“दादी, मजाक मत उड़ाइए, बताइए न!” आरोही ने मचलते हुए कहा। मान्या और रिद्धि भी उत्सुकता से सुनने लगीं।
मालती देवी ने अपनी गोद में रखे आरोही के सिर पर हाथ फेरते हुए एक नजर धूप में चमकते पापड़ों पर डाली। उनकी आवाज में एक अजीब सी गहराई और ठहराव आ गया।
“बिटिया, यह जो तू देख रही है न, यह सिर्फ उड़द की दाल, पिसा हुआ मसाला या साबूदाने की टिकिया नहीं है। यह हमारे घरों की एक ऐसी अनकही रीत है, जो किसी किताब में नहीं लिखी, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के आंचल में चुपचाप बांध दी जाती है। जब एक लड़की ब्याह कर दूसरे घर जाती है, तो वह केवल एक घर नहीं बदलती, उसका पूरा संसार बदल जाता है। वह वहां बहू बनती है, पत्नी बनती है, मां बनती है, और पूरे घर की जिम्मेदारियों का बोझ उसके नाजुक कंधों पर आ जाता है।”
मालती देवी की नजरें दूर क्षितिज पर टिक गईं, मानो वे अपने अतीत में लौट गई हों। “वहां जाकर वह सबके पसंद-नापसंद का ख्याल रखती है। किसे चाय में चीनी कम चाहिए, किसे सब्जी में नमक ज्यादा चाहिए, बच्चों को कब क्या खिलाना है… वह सबका ध्यान रखते-रखते खुद को भूल जाती है। जब प्रिया मेरे सामने होती है, तो वह मेरी वही छोटी सी गुड़िया होती है जो कभी अपनी चोटी खिंचवाने पर रो पड़ती थी। लेकिन जब वह दिल्ली में अपनी ससुराल में होती है, तो वह एक पूरे परिवार की धुरी होती है। वहां उसे सब कुछ बनाना आता है, वह अपने ससुराल वालों को हर तरह का लजीज खाना बनाकर खिलाती है, पर उसे अपने हाथ का बना खाना खाते-खाते कभी उस स्वाद की याद आ जाती है, जो केवल उसकी मां की रसोई में मिलता था।”
वंदना भी पास आकर चुपचाप बैठ गई थी। मालती देवी ने अपनी बहू की तरफ देखा और फिर आरोही से बोलीं, “तेरी मां वंदना को ही देख ले। जब यह इस घर में ब्याह कर आई थी, तो क्या इसे खाना बनाना नहीं आता था? आज पूरे मोहल्ले में इसके हाथ के खाने की तारीफ होती है। लेकिन तूने देखा है कि जब भी तेरी नानी का पत्र आता है या जब तेरी मां मायके से लौटती है, तो इसके ट्रंक में क्या होता है? वही पुराने डिब्बे, जिनमें नानी के हाथ का बना कूटू का आटा, आम की खटाई, घर का बना घी और भुने हुए चिवड़े का नमकीन भरा होता है। क्या यह सब हम भोपाल के बाजार से नहीं खरीद सकते? या क्या तेरी मां यह सब खुद नहीं बना सकती?”
वंदना की आंखें नम हो गईं। उसने धीरे से कहा, “मां जी सच कह रही हैं आरोही। बाजार की हर चीज में कीमत होती है, पर मां के हाथ के बने उस एक कौर में जो सुरक्षा और बेफिक्री का अहसास होता है, वह दुनिया की किसी दौलत से नहीं खरीदा जा सकता। जब मैं अपनी मां के हाथ का बना एक पापड़ भी सेक कर खाती हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं आज भी वही छोटी बच्ची हूँ जिसके सिर पर मां का हाथ है।”
मालती देवी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “बिल्कुल सही बात है। जब बेटी ससुराल में काम करते-करते थक जाती है, और शाम को जब वह अपनी मां की भेजी हुई मठरी या अचार का डिब्बा खोलती है, तो उस डिब्बे से केवल सौंफ या मेथी की खुशबू नहीं निकलती, बल्कि उस डिब्बे से उसकी मां की दुआएं निकलती हैं। वह स्वाद उसे याद दिलाता है कि भले ही वह कितनी भी दूर क्यों न हो, दुनिया के किसी कोने में एक बूढ़ी मां बैठी है जो आज भी उसके बारे में सोचती है, जो आज भी उसके लिए जागती है और जो यह मानती है कि उसकी बेटी चाहे जितनी बड़ी हो जाए, रहेगी हमेशा उसकी नन्हीं बच्ची ही।”
छत पर पूरी तरह शांति छा गई थी। हवा का एक झोंका आया और उसने धूप में सूखती सूती चादर के कोनों को थोड़ा फड़फड़ा दिया। आरोही, जो हमेशा बात-बात पर तर्क करती थी, आज बिल्कुल शांत थी। उसकी सहेलियां मान्या और रिद्धि भी बहुत भावुक होकर सुन रही थीं।
“तो दादी,” आरोही ने रुंधे हुए गले से पूछा, “इसका मतलब यह जो आप हर साल इतनी मेहनत करती हैं, यह कोई फर्ज नहीं है?”
“फर्ज?” मालती देवी हंसीं, “अरे पगली, ममता कभी फर्ज के तराजू पर नहीं तौली जाती। यह तो वह धागा है जो दो घरों के बीच की दूरी को मिटा देता है। जब मेरी मां जिंदा थीं, तो वे भी मेरे लिए हर बरस ऐसे ही डिब्बे भरकर भेजा करती थीं। जब तक वे रहीं, मुझे कभी यह नहीं लगा कि मैं पराई हो गई हूँ। और आज जब मैं प्रिया के लिए यह सब बनाती हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं अपनी मां का कर्ज उतार रही हूँ। और जब कल को तू बड़ी होगी, तेरी शादी होगी, तो मैं रहूं या न रहूं, तेरी मां तेरे लिए यही सब बनाएगी। और जब तेरी मां बूढ़ी हो जाएगी, तब तू अपनी बेटी के लिए बनाएगी। यह प्यार की वो परंपरा है आरोही, जो कभी खत्म नहीं होनी चाहिए।”
आरोही उठकर बैठ गई। उसने अपने नन्हे हाथों से दादी के झुर्रीदार हाथों को थाम लिया और उन्हें अपनी आंखों से लगा लिया।
“दादी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं सोचती थी कि आप सिर्फ बुआ को खुश करने के लिए यह सब करती हैं। मुझे नहीं पता था कि इन सूखे पापड़ों और बड़ियों में इतना सारा प्यार और इतनी बड़ी रीत छिपी होती है। आज से मैं कभी इन सब चीजों का मजाक नहीं उड़ाऊंगी।”
तभी रिद्धि ने मुस्कुराते हुए कहा, “दादी जी, आज आपने हमें वो बात समझाई जो शायद हम कभी किसी किताब से नहीं सीख पाते। मेरी नानी भी मेरी मम्मी के लिए हर साल तिलकुट भेजती हैं, और मम्मी उसे ऐसे संभालकर रखती हैं जैसे कोई खजाना हो। आज मुझे समझ आया कि मम्मी उस डिब्बे को देखकर इतना भावुक क्यों हो जाती थीं।”
“चलो-चलो, अब बहुत भावुकता हो गई,” मालती देवी ने माहौल को हल्का करते हुए कहा, “अब अगर तुम तीनों को यह बात समझ आ ही गई है, तो जल्दी से उठो और इन पापड़ों को जरा पलट दो, ताकि दोनों तरफ से अच्छी धूप लग जाए। वरना शाम की ओस पड़ते ही ये सब नरम पड़ जाएंगे।”
“जी दादी, हुक्म सिर माथे!” आरोही खुशी से उछल पड़ी।
अब खेल केवल शरारत का नहीं था, बल्कि उसमें अपनी जड़ों और परंपरा के प्रति गहरा आदर जुड़ गया था। तीनों सहेलियां और वंदना मिलकर बड़ी सावधानी से एक-एक पापड़ को पलटने लगीं। धूप अब ढलने की ओर थी, लेकिन उस छत पर जो प्यार, संस्कार और रिश्तों की गर्माहट फैली थी, उसने हर दिल को एक नए उजाले से भर दिया था। मालती देवी दूर बैठी अपनी पोती को देख रही थीं और उनके मन में एक गहरा संतोष था कि उनके परिवार की ममता की यह विरासत सुरक्षित हाथों में आगे बढ़ रही है।
घर के बड़ों के हाथ का बना एक साधारण सा पकवान भी किसी अनमोल उपहार से कम नहीं होता, क्योंकि उसमें स्वाद के साथ-साथ पीढ़ियों का आशीर्वाद और प्यार मिला होता है। क्या आपके घर में भी मां या नानी-दादी के हाथ के बने किसी ऐसे खास पकवान या परंपरा की याद है जो आज भी आपके दिल के सबसे करीब है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।
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लेखिका : रमा शुक्ला