खोई हुई पहचान: एक अनकही दास्तान

शिखा ने मीरा का हाथ पकड़कर कहा, “मीरा, एक बात हमेशा याद रखना। अगर इंजन में ही खराबी आ जाए, तो गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती। तुम इस घर का इंजन हो। तुम दिन-रात सेवा कर रही हो, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन अगर तुम अंदर से खुश नहीं हो, तो तुम दूसरों को क्या खुशी दोगी? और यह कैसी बेवकूफी है कि औरत को अपने शौक मारने पड़ते हैं? तुम एक काम करो। दिन के कुछ घंटों के लिए एक केयरटेकर (आया) रख लो, जो बाबूजी की साफ़-सफाई और भारी कामों में तुम्हारी मदद कर सके। और तुम अपनी आर्ट क्लासेस शुरू करो। जब तक तुम खुद अपने लिए खड़ी नहीं होगी, यह समाज और तुम्हारा परिवार तुम्हें सिर्फ एक काम करने वाली मशीन ही समझेगा।”

कमरे में फैली फिनाइल और दवाइयों की मिली-जुली गंध अब मीरा की ज़िंदगी का स्थायी हिस्सा बन चुकी थी। पिछले तीन सालों से उसकी दुनिया इस एक कमरे, रसोई और घर के दालान तक ही सिमट कर रह गई थी। ससुर जी, जिन्हें घर में सब ‘बाबूजी’ कहते थे, लकवे के शिकार होने के बाद से पूरी तरह बिस्तर पर थे। उनका खाना-पीना, कपड़े बदलना, दवाइयां देना—सब कुछ मीरा के ही ज़िम्मे था। सुबह की पहली किरण से लेकर रात के आखिरी पहर तक मीरा एक रोबोट की तरह काम करती रहती। उसकी अपनी कोई इच्छा, कोई रूचि जैसे कहीं बहुत पीछे छूट गई थी।

तभी मीरा के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘माँ’ लिखा चमक रहा था। मीरा ने गहरी सांस ली और फोन उठाया। “कैसी हो मीरा? अब तो लगता है तूने मान लिया है कि तेरा कोई मायका ही नहीं है। पिछले डेढ़ साल से तूने इस घर की दहलीज पर कदम नहीं रखा है। क्या एकाध दिन के लिए भी तू हमसे मिलने नहीं आ सकती?” फोन के दूसरी तरफ से उसकी माँ, सावित्री देवी की उलाहना भरी आवाज़ आई।

मीरा का गला भर आया। उसने खुद को संभालते हुए कहा, “माँ, आप तो सब जानती हैं। बाबूजी की ऐसी हालत है। वो करवट भी खुद नहीं ले सकते। मैं उन्हें इस हालत में छोड़कर कैसे आ सकती हूँ? मैं तो खुद चाहती हूँ कि आपसे मिलूँ, थोड़ा घर से बाहर निकलूँ। सच कहूँ माँ, कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं किसी अस्पताल की वॉर्ड बॉय बन गई हूँ। मेरा अपना कोई वजूद ही नहीं बचा है। मुझे आपसे थोड़ी हिम्मत की उम्मीद थी, पर आप भी उल्हाना दे रही हैं।”

सावित्री देवी ने तुरंत जवाब दिया, “देख बेटी, औरत का तो जन्म ही सेवा के लिए होता है। अब बाबूजी बीमार हैं, तो बहू होने के नाते ये तेरा फर्ज़ है। हमारे ज़माने में तो हम दस-दस लोगों के भरे-पूरे परिवार को संभालते थे और कभी उफ तक नहीं करते थे। तू ये कैसी बातें कर रही है? राजेश कमा कर ला ही रहा है, घर में पैसे की कोई कमी नहीं है। तू बस मन लगाकर सेवा कर, भगवान इसका फल देगा। मैं अब फोन रखती हूँ, मुझे पूजा का इंतज़ाम करना है।”

फोन कट चुका था, लेकिन मीरा के कानों में माँ के शब्द गूंज रहे थे। एक अजीब सी घुटन उसे जकड़ रही थी। शाम को जब उसका पति राजेश ऑफिस से लौटा, तो मीरा ने उसे चाय देते हुए अपने मन की बात कहनी चाही। “राजेश, मैं सोच रही थी कि दिन में जब बाबूजी सो रहे होते हैं, तब मैं कुछ ऑनलाइन आर्ट क्लासेस शुरू कर दूँ। या फिर मैं अपनी पुरानी पेंटिंग्स के ऑर्डर्स लेना शुरू करूँ? आपको तो पता है शादी से पहले मैं कितनी अच्छी पेंटिंग करती थी। इससे मेरा मन भी लगा रहेगा और मुझे ऐसा लगेगा कि मैं भी कुछ कर रही हूँ।”

राजेश ने चाय का कप मेज़ पर खिसकाते हुए अजीब सी नज़र से मीरा को देखा। “तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है मीरा? क्या मेरे कमाने में कोई कमी रह गई है जो अब तुम्हें पेंटिंग बेचकर पैसे कमाने की सूझ रही है? लोग क्या कहेंगे कि राजेश अपनी बीवी को पाल नहीं सकता, इसलिए वो घर बैठकर चित्रकारी कर रही है? और बाबूजी की देखभाल कौन करेगा? क्या तुम्हारी वो पेंटिंग उन्हें दवा देगी?”

“राजेश, मैं बाबूजी की देखभाल से पीछे नहीं हट रही हूँ। मैं बस अपने लिए दिन के दो घंटे मांग रही हूँ। मैं घुटन महसूस करती हूँ। क्या मेरी अपनी कोई ज़िंदगी नहीं है?” मीरा की आँखों में आंसू थे।

“ज़िंदगी तो मेरी भी नहीं बची है मीरा। सुबह जाता हूँ, रात को थका-हारा आता हूँ। क्या मैं शिकायत कर रहा हूँ? तुम औरतों को हर चीज़ में बस अपनी ही परेशानी दिखती है। मुझे और परेशान मत करो, मेरा खाना लगा दो,” राजेश ने झिड़कते हुए कहा और बेडरूम में चला गया। मीरा वहीं खड़ी रह गई, अपने आंसुओं को पीती हुई।

अगले दिन मीरा की पड़ोसन और उसकी अच्छी दोस्त शिखा उससे मिलने आई। शिखा एक वर्किंग वुमन थी और मीरा की हालत को बहुत करीब से समझती थी। मीरा का उतरा हुआ चेहरा देखकर शिखा ने पूछ ही लिया। बातों-बातों में मीरा ने अपने दिल का सारा गुबार शिखा के सामने निकाल दिया।

शिखा ने मीरा का हाथ पकड़कर कहा, “मीरा, एक बात हमेशा याद रखना। अगर इंजन में ही खराबी आ जाए, तो गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती। तुम इस घर का इंजन हो। तुम दिन-रात सेवा कर रही हो, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन अगर तुम अंदर से खुश नहीं हो, तो तुम दूसरों को क्या खुशी दोगी? और यह कैसी बेवकूफी है कि औरत को अपने शौक मारने पड़ते हैं? तुम एक काम करो। दिन के कुछ घंटों के लिए एक केयरटेकर (आया) रख लो, जो बाबूजी की साफ़-सफाई और भारी कामों में तुम्हारी मदद कर सके। और तुम अपनी आर्ट क्लासेस शुरू करो। जब तक तुम खुद अपने लिए खड़ी नहीं होगी, यह समाज और तुम्हारा परिवार तुम्हें सिर्फ एक काम करने वाली मशीन ही समझेगा।”

शिखा की बातों ने मीरा के अंदर एक सोई हुई चिंगारी को हवा दे दी। दो दिन बाद जब राजेश का मूड कुछ ठीक लगा, तो मीरा ने दोबारा हिम्मत की। “राजेश, मैंने तय किया है कि मैं शाम को एक घंटे बच्चों को पेंटिंग सिखाऊंगी। इससे मेरी कला भी ज़िंदा रहेगी और मुझे खुशी मिलेगी।”

राजेश फिर से भड़क गया, “मैंने एक बार कह दिया ना कि यह सब फालतू के काम मेरे घर में नहीं होंगे। तुम्हें अगर वक्त काटना है तो टीवी देख लो, या बच्चों को पढ़ा लिया करो। यह ट्यूशन-व्यूशन की नौटंकी मुझे पसंद नहीं है।”

राजेश की यह ज़ोरदार आवाज़ मीरा के दोनों बच्चों, 16 साल के आर्यन और 14 साल की नव्या, ने सुन ली। नव्या बाहर आई और बोली, “पापा, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? मम्मी को पेंटिंग करना बहुत पसंद है। वो सारा दिन दादू के पास रहती हैं, उनके सारे काम करती हैं। क्या उन्हें अपनी पसंद का कोई काम करने का हक नहीं है? आप तो ऑफिस जाकर दुनिया देख लेते हैं, पर मम्मी की दुनिया तो इस घर की चारदीवारी में कैद हो गई है।”

राजेश अपनी बेटी के मुंह से ऐसी बातें सुनकर अवाक रह गया, पर अपनी ज़िद में उसने नव्या को डांट कर कमरे में भेज दिया। लेकिन मीरा ने इस बार तय कर लिया था कि वो पीछे नहीं हटेगी। उसने अपनी कॉलोनी के व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डाल दिया कि वो शाम को 5 से 6 बजे तक बच्चों के लिए आर्ट और क्राफ्ट की क्लासेस शुरू कर रही है। उसकी पुरानी पहचान और हुनर को कई लोग जानते थे। देखते ही देखते छह-सात बच्चों ने नाम लिखा लिया।

क्लासेस शुरू हो गईं। जब मीरा के हाथों में ब्रश और रंग होते, तो उसके चेहरे पर एक ऐसी चमक आ जाती जो पिछले तीन सालों में कहीं खो गई थी। बच्चों की हंसी-खिलखिलाहट से वो एक घंटा कैसे बीत जाता, उसे पता ही नहीं चलता। इस बीच उसने बाबूजी के लिए दिन में कुछ घंटों के लिए एक वॉर्ड बॉय का भी इंतज़ाम कर लिया था, जिसका खर्चा वो अपनी छोटी सी कमाई से देने लगी थी।

राजेश को मीरा का यह फैसला बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। उसके पुरुषवादी अहम को ठेस पहुंच रही थी। एक दिन राजेश ऑफिस से थोड़ा जल्दी आ गया। उस वक्त मीरा की क्लास चल रही थी और बच्चे ड्राइंग रूम में बैठे पेंटिंग कर रहे थे। राजेश सीधे अंदर आया, उसने बच्चों की तरफ देखा भी नहीं और गुस्से में चिल्लाया, “मीरा! मेरे लिए एक कप चाय बनाओ। या फिर मैं जाकर बाहर किसी नुक्कड़ पर चाय पी लूँ? घर को तो तुमने स्कूल बना रखा है।”

बच्चों के सामने इस तरह से अपमानित होने पर मीरा का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने बहुत संयम से बच्चों से कहा, “बच्चों, आज की क्लास हम यहीं खत्म करते हैं। बाकी का काम हम कल करेंगे।” बच्चे सहमे हुए अपने-अपने घर चले गए।

जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, मीरा का बांध टूट गया। उसने सीधे राजेश की आँखों में देखते हुए कहा, “राजेश, आपको शर्म नहीं आती? इतने छोटे बच्चों के सामने आपने मेरा तमाशा बना दिया। आप जताना क्या चाहते हैं? कि मैं आपकी गुलाम हूँ?”

राजेश चिल्लाया, “तुम मेरी बात काट कर ये सब कर रही हो, उसका क्या? पति जब घर आए तो पत्नी का काम है उसे पानी देना, ना कि दूसरों के बच्चों के साथ रंग-रोगन करना।”

मीरा ने भी उसी तेवर में जवाब दिया, “मैं आपकी पत्नी हूँ, कोई बंधुआ मज़दूर नहीं। मैं सुबह से लेकर शाम तक आपके पिता की, आपके बच्चों की और इस घर की पूरी ज़िम्मेदारी उठाती हूँ। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने अपनी रूह आपके नाम गिरवी रख दी है। अगर आपको इतनी ही परेशानी है, तो आप ऑफिस छोड़कर घर बैठिए और अपने पिता की सेवा कीजिए। मैं भी देखती हूँ कि आप कितने दिन यह मानसिक संत्रास झेल पाते हैं। जीवन में पति-पत्नी दोनों को एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करनी होती है, वरना ये रिश्ता सिर्फ एक समझौता बनकर रह जाता है।”

मीरा के इन तीखे लेकिन सत्य वचनों ने राजेश को निशब्द कर दिया। अगले ही दिन रविवार था। मीरा रसोई में काम कर रही थी। तभी मीरा का फोन बजा, जिसे राजेश ने उठा लिया। फोन पर मीरा की माँ, सावित्री देवी थीं।

“अरे दामाद जी, आप कैसे हैं? मुझे पता चला है कि मीरा ने कोई ट्यूशन शुरू कर दी है। आप उसे समझाइए। भला हमारे घरों की औरतें ऐसे चार पैसे कमाने के लिए घर से बाहर या घर में गैरों को बुलाकर काम करेंगी? घर में सब भरा-पूरा है। आप ज़रा सख्ती से पेश आइए उसके साथ।” सावित्री देवी अपनी पुरानी मानसिकता का ज़हर घोल रही थीं।

राजेश को लगा कि जैसे उसे कोई समर्थक मिल गया हो। लेकिन इससे पहले कि राजेश कुछ कहता, उसका बेटा आर्यन वहां आ गया। आर्यन ने फोन स्पीकर पर करवाया और बोला, “नानी जी, आपको मेरी मम्मी की खुशी से इतनी चिढ़ क्यों है? मम्मी कोई गलत काम नहीं कर रही हैं। वो दादू की सेवा भी करती हैं और अब उन्हें कुछ ऐसा मिल गया है जिससे वो खुश रहती हैं। पापा भी तो अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जी रहे हैं। अगर मम्मी कल को डिप्रेशन में चली गईं या उन्होंने चिड़चिड़ा होकर सब कुछ छोड़ दिया, तो क्या आप आएंगी दादू को संभालने? मम्मी इस घर की रीढ़ हैं, और हम उनकी खुशियों को ऐसे कुचलने नहीं देंगे।”

आर्यन की बात सुनकर सावित्री देवी चुप हो गईं और उन्होंने झेंपते हुए फोन काट दिया। राजेश अपने ही बेटे की बातें सुनकर सन्न था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि वो किस कदर अंधा हो चुका था। वो सिर्फ पैसे कमाकर खुद को एक महान पति और बेटा समझ रहा था, जबकि ज़मीनी हकीकत में उसकी पत्नी तिल-तिल कर अपने शौक, अपनी जवानी और अपनी खुशियों की बलि दे रही थी।

अगले दिन सुबह मीरा जब उठी, तो उसने देखा कि राजेश रसोई में चाय बना रहा है। उसने दो कप में चाय छानी और एक कप मीरा की तरफ बढ़ाते हुए बोला, “मीरा, मुझे माफ़ कर दो। मैं सच में बहुत स्वार्थी हो गया था। मैंने अपने पिता के प्रति अपने कर्तव्य का पूरा बोझ तुम्हारे कमज़ोर कंधों पर डाल दिया था और बदले में तुम्हारी वो मुस्कान भी छीन ली जो कभी मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी। तुम सही कहती हो, हर इंसान को अपने लिए जीने का हक है। आज से तुम्हारी आर्ट क्लास में कोई दखलंदाज़ी नहीं होगी, बल्कि मैं खुद तुम्हारी मदद करूँगा।”

मीरा की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली, लेकिन इस बार ये आंसू घुटन के नहीं, बल्कि सुकून के थे। उसने बस चुपचाप राजेश का हाथ पकड़ लिया।

वक़्त का पहिया घूमता रहा। लगभग एक साल बाद बाबूजी का देहांत हो गया। उनके जाने के बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। मीरा अचानक से खुद को बहुत खाली-खाली महसूस करने लगी। एक दिन राजेश ऑफिस से लौटते हुए अपने साथ एक फाइल लेकर आया। उसने वो फाइल मीरा के हाथों में रख दी।

“ये क्या है?” मीरा ने पूछा।

“ये पास वाले कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में एक छोटी सी दुकान के कागज़ हैं। अब घर में रहकर क्या करोगी? बाबूजी भी नहीं रहे। अब तुम उस दुकान में अपना एक प्रोफेशनल आर्ट स्टूडियो खोलो। अब तुम्हें उड़ान भरनी चाहिए, मैंने तुम्हारे पंखों को बहुत दिनों तक बांध कर रखा था,” राजेश ने मुस्कुराते हुए कहा।

मीरा ने आसमान की तरफ देखा, जैसे उसे उसकी खोई हुई पहचान पूरी इज़्ज़त और सम्मान के साथ वापस मिल गई हो। एक औरत का असली सम्मान सिर्फ उसकी पूजा करने में नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं, उसके हुनर और उसके अस्तित्व को स्वीकार करने में है।

क्या आपके आस-पास भी कोई ऐसी ‘मीरा’ है जिसने परिवार के लिए अपने सपनों को मार दिया हो? क्या समाज को अब औरतों के प्रति अपना नज़रिया नहीं बदलना चाहिए? इस विषय पर आपके क्या विचार हैं, हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएँ।

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