नेहा स्वभाव से बुरी नहीं थी, लेकिन वह बहुत ‘प्रोफेशनल’ थी। घर की हर चीज़ अपनी जगह पर होनी चाहिए, यह उसका सख्त नियम था। दीनानाथ जी अगर गलती से सोफे पर चाय का एक कतरा भी गिरा देते, तो नेहा के माथे पर सिलवटें पड़ जाती थीं। “पापा जी, आप डाइनिंग टेबल पर ही खा लिया कीजिए ना, सोफे का फैब्रिक बहुत महंगा है, दाग नहीं निकलेगा,” वह बड़े ही मीठे लेकिन चुभने वाले स्वर में कहती। दीनानाथ जी ने धीरे-धीरे खुद को अपने ही कमरे तक समेट लिया था। वे घर में एक ऐसे मेहमान बन गए थे, जिसे बस समय पर खाना और दवा मिल जाती थी, लेकिन प्यार से दो बातें करने वाला कोई नहीं था।
और सबसे ज्यादा तकलीफदेह होता था वह समय, जब उनके छह महीने पूरे होने वाले होते थे। पिछले पंद्रह दिनों से घर में एक अजीब सी हलचल थी। नेहा ने उनका सूटकेस निकाल कर अलमारी के पास रख दिया था। हर रोज वह पूछती थी, “पापा जी, आपके स्वेटर पैक कर दूँ? पुणे में भी हल्की ठंड तो होगी ही।” विकास बार-बार टिकट कन्फर्म होने की बात करता था। दीनानाथ जी को यह देखकर महसूस होता था कि जैसे उनके जाने की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। उनकी विदाई किसी प्रियजन की विदाई नहीं थी, बल्कि एक जिम्मेदारी से मुक्ति पाने का जश्न था, जिसे बड़ी ही खामोशी और शालीनता से मनाया जा रहा था।
सर्दियों की एक धुंधली सुबह थी। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर बारह पर हमेशा की तरह मुसाफिरों की भारी भीड़ थी, कुली सामान लादकर इधर-उधर भाग रहे थे, और चाय वालों की आवाज़ें स्टेशन के शोर में घुल रही थीं। इसी शोरगुल के बीच, पचहत्तर वर्षीय मास्टर दीनानाथ जी अपनी पुरानी वीआईपी अटैची के पास चुपचाप खड़े थे। उनके चेहरे पर समय ने गहरी झुर्रियां उकेर दी थीं, और उन झुर्रियों में न जाने कितनी अनकही कहानियां छिपी थीं। उनके बगल में उनका बड़ा बेटा, विकास खड़ा था। विकास ने महंगे ब्रांड का कोट पहना हुआ था और उसकी निगाहें लगातार उसकी स्मार्टवॉच पर टिक रही थीं। वह शारीरिक रूप से तो वहाँ मौजूद था, लेकिन मानसिक रूप से शायद अपने दफ्तर की किसी मीटिंग में उलझा हुआ था।
“पापा, ट्रेन आने में अभी दस मिनट हैं। मैंने आपका टिफिन बैग में सबसे ऊपर रख दिया है। दवाइयाँ भी निकाल कर पर्स के पास रख दी हैं। समय पर खा लीजिएगा,” विकास ने अपनी घड़ी से नज़र हटाए बिना एक रटा-रटाया वाक्य बोला।
दीनानाथ जी ने गहरी साँस ली और अपने बेटे के चेहरे की तरफ देखा। “हाँ बेटा, तू चिंता मत कर। सब याद है मुझे। तू अब निकल जा, वरना तुझे ऑफिस पहुँचने में देर हो जाएगी। वैसे भी दिल्ली का ट्रैफिक इतना खराब रहता है,” दीनानाथ जी ने अपने कांपते हाथों से विकास के कंधे को थपथपाते हुए कहा।
विकास ने राहत की साँस ली। उसने जल्दी से झुककर पिता के पैर छुए और बोला, “ठीक है पापा, पहुँच कर राघव को फोन कर दीजिएगा। वो स्टेशन पर आपको लेने आ जाएगा।” विकास मुड़ा और भीड़ में कहीं ओझल हो गया। दीनानाथ जी तब तक उसे जाते हुए देखते रहे, जब तक कि उसकी पीठ धुंध में पूरी तरह गायब नहीं हो गई। उनकी बूढ़ी आँखों के कोर हल्के से भीग गए थे। तभी ट्रेन के हॉर्न की तेज आवाज़ ने उन्हें उनकी यादों से बाहर निकाला।
ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर रुक चुकी थी। दीनानाथ जी अपना भारी सूटकेस खींचते हुए एसी 2-टियर के अपने डिब्बे में चढ़ गए। अपनी लोअर बर्थ पर बैठकर उन्होंने एक गहरी ठंडी साँस छोड़ी। जैसे ही ट्रेन ने झटके के साथ चलना शुरू किया, दीनानाथ जी को लगा जैसे उनकी अपनी ज़िंदगी का भी कोई स्थायी स्टेशन नहीं बचा था। वह बस एक चलती हुई गाड़ी में बैठे मुसाफिर बन कर रह गए थे। खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ और इमारतें उन्हें उनके अपने अतीत की तरह लग रहे थे, जो बस पीछे छूटता जा रहा था।
दीनानाथ जी कभी लखनऊ के एक प्रतिष्ठित सरकारी स्कूल में हेडमास्टर हुआ करते थे। उनकी पत्नी, सुभद्रा, एक बहुत ही संस्कारी और ममतामयी महिला थीं। दोनों ने मिलकर अपनी पाई-पाई जोड़कर लखनऊ के गोमती नगर में एक खूबसूरत सा घर बनाया था, जिसका नाम उन्होंने रखा था—’सुभद्रा निवास’। उनके दो बेटे थे, विकास और राघव। दोनों को उच्च शिक्षा दिलाई, दोनों अच्छी नौकरियों में लग गए। विकास दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट बन गया और राघव पुणे में एक बड़ा सॉफ्टवेयर इंजीनियर। दीनानाथ जी और सुभद्रा सोचते थे कि बुढ़ापे में यह भरा-पूरा परिवार उनके आंगन की रौनक बनेगा।
लेकिन तकदीर को कुछ और ही मंजूर था। तीन साल पहले सुभद्रा जी का अचानक दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनके जाते ही दीनानाथ जी की दुनिया जैसे सूनी हो गई। सुभद्रा के जाने के कुछ ही महीनों बाद, बच्चों ने समझाना शुरू किया कि अब उनका इतनी बड़ी उम्र में अकेले इतने बड़े घर में रहना सुरक्षित नहीं है। बातों ही बातों में ‘सुभद्रा निवास’ को बेचने का फैसला हो गया। घर बिका, पैसे दोनों बेटों में बराबर बंट गए, और उसी के साथ बंट गए मास्टर दीनानाथ जी।
बेटों ने एक बहुत ही ‘व्यावहारिक’ समझौता किया। तय यह हुआ कि पापा छह महीने विकास के पास दिल्ली में रहेंगे और छह महीने राघव के पास पुणे में। कोई भी एक बेटा पूरी जिम्मेदारी नहीं उठा सकता था क्योंकि दोनों की पत्नियां भी कामकाजी थीं और दोनों की अपनी-अपनी व्यस्तताएँ थीं।
दीनानाथ जी को वो दिन बहुत अच्छी तरह याद था जब यह फैसला सुनाया गया था। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया, बस चुपचाप अपनी गर्दन हिला दी थी। लेकिन उस दिन उनके अंदर का स्वाभिमानी पिता हमेशा के लिए मर गया था।
पिछले छह महीने से वह दिल्ली में विकास के साथ थे। विकास का घर बहुत बड़ा और आलीशान था। इटैलियन मार्बल के फर्श, चमचमाते झूमर और महंगी गाड़ियाँ। लेकिन उस घर में जो एक चीज़ नहीं थी, वो थी फुर्सत। विकास और उसकी पत्नी नेहा सुबह आठ बजे ही घर से निकल जाते थे। उनका दस साल का पोता, आरव, स्कूल से आने के बाद सीधे अपनी ट्यूशन क्लास और फिर क्रिकेट कोचिंग में चला जाता था। घर में एक मेड थी जो खाना बनाकर चली जाती थी। दीनानाथ जी का पूरा दिन उस बड़े से घर की बालकनी में बैठकर सड़क पर आती-जाती गाड़ियों को गिनने में बीत जाता था।
नेहा स्वभाव से बुरी नहीं थी, लेकिन वह बहुत ‘प्रोफेशनल’ थी। घर की हर चीज़ अपनी जगह पर होनी चाहिए, यह उसका सख्त नियम था। दीनानाथ जी अगर गलती से सोफे पर चाय का एक कतरा भी गिरा देते, तो नेहा के माथे पर सिलवटें पड़ जाती थीं। “पापा जी, आप डाइनिंग टेबल पर ही खा लिया कीजिए ना, सोफे का फैब्रिक बहुत महंगा है, दाग नहीं निकलेगा,” वह बड़े ही मीठे लेकिन चुभने वाले स्वर में कहती। दीनानाथ जी ने धीरे-धीरे खुद को अपने ही कमरे तक समेट लिया था। वे घर में एक ऐसे मेहमान बन गए थे, जिसे बस समय पर खाना और दवा मिल जाती थी, लेकिन प्यार से दो बातें करने वाला कोई नहीं था।
और सबसे ज्यादा तकलीफदेह होता था वह समय, जब उनके छह महीने पूरे होने वाले होते थे। पिछले पंद्रह दिनों से घर में एक अजीब सी हलचल थी। नेहा ने उनका सूटकेस निकाल कर अलमारी के पास रख दिया था। हर रोज वह पूछती थी, “पापा जी, आपके स्वेटर पैक कर दूँ? पुणे में भी हल्की ठंड तो होगी ही।” विकास बार-बार टिकट कन्फर्म होने की बात करता था। दीनानाथ जी को यह देखकर महसूस होता था कि जैसे उनके जाने की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। उनकी विदाई किसी प्रियजन की विदाई नहीं थी, बल्कि एक जिम्मेदारी से मुक्ति पाने का जश्न था, जिसे बड़ी ही खामोशी और शालीनता से मनाया जा रहा था।
“चाय! गरम चाय!”
चाय वाले की आवाज़ से दीनानाथ जी की तंद्रा टूटी। उन्होंने एक कप चाय ली और अपनी खिड़की के बाहर देखने लगे। तभी उनका ध्यान अपनी सामने वाली सीट पर गया। वहाँ एक ग्यारह-बारह साल का लड़का बैठा था, और उसके साथ एक अधेड़ उम्र का आदमी था, जो शायद उसका कोई रिश्तेदार या केयरटेकर लग रहा था।
लड़का लगातार सिसक रहा था। उसकी आँखें लाल थीं और वह अपने आँसुओं को पोंछने की नाकाम कोशिश कर रहा था। उसके साथ बैठे आदमी के चेहरे पर एक सख्त भाव था।
“चुप हो जा कबीर। अब रोने का कोई फायदा नहीं है। मैंने तुझे कितनी बार समझाया है कि मर्दों की तरह रहना सीख,” उस आदमी ने थोड़ी झिड़कते हुए कहा।
कबीर ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “लेकिन मुझे नहीं जाना अंकल। मुझे घर पर रहना है, मम्मी-पापा के पास।”
दीनानाथ जी से रहा नहीं गया। एक पिता और शिक्षक का हृदय बच्चे को रोता देख पसीज गया। उन्होंने अपनी पानी की बोतल आगे बढ़ाते हुए बहुत ही प्यार से पूछा, “क्या हुआ बेटा? कहाँ जा रहे हो तुम? और रो क्यों रहे हो?”
कबीर ने दीनानाथ जी की तरफ देखा। उनके चेहरे की सौम्यता देखकर बच्चे को शायद कुछ अपनापन लगा। उसने पानी का एक घूंट पिया और बोला, “दादू, मेरी छुट्टियाँ खत्म हो गई हैं। मैं देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में पढ़ता हूँ। मुझे वहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। मेरे मम्मी-पापा दोनों बहुत बिजी रहते हैं। उन्होंने मुझे वहाँ भेज दिया है। मैं सिर्फ डेढ़ महीने की छुट्टियों में घर आता हूँ। कल रात ही मेरी छुट्टियाँ खत्म हुई हैं, और आज सुबह ही उन्होंने मुझे अंकल के साथ वापस स्कूल भेज दिया। वो खुद मुझे छोड़ने भी नहीं आए, क्योंकि उनकी कोई जरूरी मीटिंग थी।” इतना कहते-कहते कबीर फिर से फफक कर रो पड़ा।
दीनानाथ जी के हाथ अचानक कांपने लगे। कबीर की बातें उनके सीने में एक धारदार चाकू की तरह उतर रही थीं। उन्होंने कबीर को देखा, जो अपने घर से इसलिए दूर जा रहा था क्योंकि उसके पास अपने माता-पिता के व्यस्त जीवन में कोई जगह नहीं थी, और फिर उन्होंने खुद को देखा, जो अपने ही घर से इसलिए दूर जा रहे थे क्योंकि उनके बच्चों की आलीशान ज़िंदगी में उनके लिए कोई स्थायी कोना नहीं था।
“ये तो आजकल के बच्चों का नाटक है भाई साहब,” कबीर के साथ बैठे उस आदमी ने दीनानाथ जी से कहा। “इनके माता-पिता दिन-रात मेहनत करके इनके लिए लाखों की फीस भरते हैं। घर में कोई इन्हें देखने वाला नहीं है, इसलिए बोर्डिंग में रखा है। नियम तो नियम होते हैं ना। जब घर पर रहने की मियाद (समय-सीमा) पूरी हो गई, तो वापस तो लौटना ही पड़ेगा।”
‘मियाद’… इस एक शब्द ने दीनानाथ जी के अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने एक गहरी, दर्द भरी मुस्कान के साथ उस आदमी की तरफ देखा।
“आप बिल्कुल सही कह रहे हैं भाई साहब,” दीनानाथ जी की आवाज़ में एक अजीब सा सूनापन था। “नियम तो नियम होते हैं, और जब मियाद पूरी हो जाए, तो अपना ठिकाना छोड़ना ही पड़ता है।”
उस आदमी ने दीनानाथ जी के सूटकेस और उनके अकेलेपन को देखकर पूछा, “आप कहाँ जा रहे हैं बाबूजी? इतनी उम्र में अकेले सफर कर रहे हैं, बच्चे साथ नहीं हैं?”
दीनानाथ जी के होठों पर एक फीकी, कृत्रिम मुस्कान तैर गई। उन्होंने कबीर के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और फिर उस आदमी की आँखों में देखते हुए बोले, “मैं भी पुणे जा रहा हूँ भाई साहब… अपने छोटे बेटे के पास। दरअसल, मैं और ये बच्चा (कबीर) एक ही नाव के मुसाफिर हैं।”
“मतलब? मैं कुछ समझा नहीं,” आदमी ने उलझन में पूछा।
दीनानाथ जी ने एक लंबी साँस ली, उनकी आवाज़ भारी हो चुकी थी। उन्होंने कहा, “इस बच्चे की छुट्टियों की मियाद पूरी हो गई है, इसलिए इसे घर से निकालकर वापस बोर्डिंग स्कूल भेजा जा रहा है। और मेरे भी बड़े बेटे के घर रहने की छह महीने की ‘मियाद’ कल ही पूरी हुई है, इसलिए अब मुझे वहाँ से निकालकर छोटे बेटे के पास पुणे भेजा जा रहा है। ये बच्चा घर से स्कूल जा रहा है क्योंकि इसके माता-पिता के पास इसके लिए वक्त नहीं है, और मैं एक बेटे के घर से दूसरे बेटे के घर जा रहा हूँ… क्योंकि मेरे बच्चों के पास अब मेरी जरूरत नहीं है।”
डिब्बे में अचानक एक भारी सन्नाटा छा गया। ट्रेन के पहियों की खड़खड़ाहट के अलावा और कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। वो आदमी निशब्द रह गया था, उसकी आँखें शर्म से झुक गई थीं। कबीर भी चुपचाप दीनानाथ जी को देख रहा था, मानो उसे अपने दर्द से बड़ा कोई दर्द मिल गया हो।
दीनानाथ जी ने अपना चश्मा उतारा और अपनी कमीज़ के कोने से अपनी आँखों में आए पानी को पोंछा। फिर उन्होंने खिड़की के बाहर देखना शुरू कर दिया। ट्रेन पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी, लेकिन मास्टर दीनानाथ जी जानते थे कि उनकी यह यात्रा कभी खत्म नहीं होने वाली। वे अब किसी घर के पिता नहीं, बल्कि दो शहरों के बीच सफर करने वाले एक ऐसे मुसाफिर बन गए थे, जिसकी कोई अपनी मंजिल नहीं थी, बस एक तयशुदा ‘मियाद’ थी।
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#उम्र का वनवास
मूल लेखक : राजेन्द्र पुरोहित