आरव ने अपनी मासूम लेकिन तेज आवाज में, जो उस शांत कमरे में गूंज उठी, पूछा, “मम्मी, आप इन आंटी लोगों को इतनी नरम-नरम रोटियां और खीर क्यों दे रही हो? जब दादी हमारे साथ रहती थीं, तब तो आप उन्हें हमेशा कहती थीं कि बुढ़ापे में ज्यादा नखरे नहीं करने चाहिए। जब दादी के दांत दर्द करते थे और वो नरम रोटी मांगती थीं, तब तो आप उन्हें सूखी और कड़क रोटियां ही देती थीं।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। जो महिलाएँ खाना खा रही थीं, उनके हाथ रुक गए।
मेघा के घर में आज सुबह से ही बहुत चहल-पहल थी। पूरे घर को फूलों से सजाया गया था। रसोई से तरह-तरह के पकवानों की मनमोहक सुगंध उठ रही थी। आज मेघा की सास, यानी सुमित्रा देवी की पहली पुण्यतिथि थी। मेघा और उसके पति विकास ने अपनी माँ की याद में शहर के एक बहुत बड़े वृद्धाश्रम से ग्यारह बुजुर्ग महिलाओं को भोजन पर आमंत्रित किया था। दिखावे और सामाजिक प्रतिष्ठा की कोई कमी न रह जाए, इसके लिए मेघा ने शहर के सबसे महंगे हलवाई को बुलाया था। चांदी के बर्तनों में भोजन परोसने की व्यवस्था की गई थी। मेघा आज हल्के रंग की रेशमी साड़ी पहने, माथे पर एक छोटी सी बिंदी लगाए, बिल्कुल एक आदर्श और संस्कारी बहू लग रही थी। जो भी मेहमान आ रहा था, मेघा नम आँखों से उन्हें अपनी सास के किस्से सुना रही थी। वह बता रही थी कि कैसे उसकी सास के जाने के बाद घर सूना हो गया है और उनके बिना एक दिन भी काटना कितना मुश्किल हो रहा है।
वहाँ मौजूद हर रिश्तेदार मेघा की तारीफों के पुल बांध रहा था। “आजकल की बहुएँ कहाँ इतना करती हैं। मेघा ने तो अपनी सास को देवी की तरह पूजा है,” मेघा की एक दूर की चाची ने पास बैठी दूसरी महिला से फुसफुसाते हुए कहा। मेघा यह सब सुन रही थी और उसके चेहरे पर एक संतुष्टि भरा अभिमान झलक रहा था। उसे लग रहा था कि आज उसने समाज के सामने खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित कर दिया है।
लेकिन घर के एक कोने में खड़ा आठ साल का आरव, मेघा का बेटा, अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से यह सब बड़े ध्यान से देख रहा था। उसके मासूम मन में कई सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे, जो उसके छोटे से दिमाग में उलझनों का जाला बुन रहे थे।
दोपहर के बारह बजते ही वृद्धाश्रम की वैन घर के दरवाजे पर आकर रुकी। मेघा और विकास ने आगे बढ़कर सभी बुजुर्ग महिलाओं का स्वागत किया। मेघा ने बहुत ही श्रद्धा भाव से उन सभी को सम्मानपूर्वक घर के अंदर बुलाया और उनके लिए बिछाए गए विशेष आसनों पर बैठाया। उसने अपने हाथों से उनके पैर धुलाए और उन पर गुलाब जल छिड़का। इसके बाद भोजन परोसने का सिलसिला शुरू हुआ। मेघा खुद अपने हाथों से पूड़ियां, मलाई कोफ्ता, मटर पनीर, और केसरिया खीर परोस रही थी। वह हर महिला से बहुत ही मिठास से पूछ रही थी, “माँ जी, थोड़ा और लीजिए ना। माँ जी, यह खीर मैंने खास आपके लिए बनाई है, बिल्कुल नरम है, आपको चबाने में तकलीफ नहीं होगी।”
आरव यह सब देख कर और भी हैरान हो गया। वह धीरे-धीरे अपनी माँ के पास गया और उसकी साड़ी का पल्लू खींचते हुए खड़ा हो गया। मेघा ने उसे देखा और मुस्कुराते हुए बोली, “क्या हुआ बेटा? जाओ अभी तुम बाहर जाकर खेलो, मैं माँ जी लोगों को खाना खिला रही हूँ। आज तुम्हारी दादी का दिन है ना, हम उन्हें याद कर रहे हैं।”
आरव ने अपनी मासूम लेकिन तेज आवाज में, जो उस शांत कमरे में गूंज उठी, पूछा, “मम्मी, आप इन आंटी लोगों को इतनी नरम-नरम रोटियां और खीर क्यों दे रही हो? जब दादी हमारे साथ रहती थीं, तब तो आप उन्हें हमेशा कहती थीं कि बुढ़ापे में ज्यादा नखरे नहीं करने चाहिए। जब दादी के दांत दर्द करते थे और वो नरम रोटी मांगती थीं, तब तो आप उन्हें सूखी और कड़क रोटियां ही देती थीं।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। जो महिलाएँ खाना खा रही थीं, उनके हाथ रुक गए। रिश्तेदारों के बीच चल रही फुसफुसाहट एकदम बंद हो गई। मेघा का चेहरा शर्म और घबराहट से लाल हो गया। उसने झेंपते हुए आरव का हाथ पकड़ा और उसे वहां से हटाने की कोशिश करते हुए दबे स्वर में कहा, “चुप कर आरव, क्या बोल रहा है तू? बड़ों के सामने ऐसे नहीं बोलते। जा अपने कमरे में जा।”
लेकिन आरव कहाँ रुकने वाला था, बच्चों का मन तो आईने की तरह साफ होता है, जो देखता है वही दिखाता है। उसने अपना हाथ छुड़ाते हुए फिर कहा, “नहीं मम्मी, आप मुझे हमेशा सच बोलने के लिए कहती हो ना! आप इन आंटी लोगों के पैर क्यों छू रही हो? जब दादी जीवित थीं, तब तो आप उनके कमरे में भी नहीं जाती थीं। आप हमेशा कहती थीं कि दादी के कमरे से दवाइयों की अजीब सी बदबू आती है। जब दादी आपको अपने पास बैठने के लिए बुलाती थीं, तब आप कहती थीं कि आपके पास फालतू समय नहीं है। तो अब आप इन अनजान आंटी लोगों के पास बैठकर उनसे इतनी मीठी बातें क्यों कर रही हो? क्या दादी ऊपर आसमान से यह सब देखकर खुश हो जाएंगी? वो तो हमेशा अपने अंधेरे कमरे में अकेली रोती रहती थीं।”
आरव के इन मासूम लेकिन तीखे सवालों ने मेघा के उस मुखौटे को तार-तार कर दिया, जिसे उसने सुबह से पहन रखा था। कमरे में मौजूद हर व्यक्ति की नजरें मेघा पर गड़ी थीं। उन नजरों में अब तारीफ नहीं, बल्कि तिरस्कार था। वृद्धाश्रम से आई एक बुजुर्ग महिला ने धीरे से अपनी पत्तल से हाथ हटा लिया और हाथ जोड़कर कांपती हुई आवाज में कहा, “बेटी, जीते जी जो प्यार और सम्मान न मिल सका, वो मरने के बाद इन चांदी के बर्तनों और छप्पन भोग से नहीं मिलता। मरे हुए इंसान को तुम्हारी खीर नहीं, बल्कि जीते जी तुम्हारे दिए गए दो मीठे बोल चाहिए होते हैं।” इतना कहकर वह महिला खड़ी हो गई। बाकी महिलाओं ने भी भोजन वहीं छोड़ दिया। विकास, जो शर्म के मारे जमीन में गड़ा जा रहा था, उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं कर पाया। देखते ही देखते सारे मेहमान भी बहाना बनाकर वहां से खिसकने लगे।
मेघा अपने ही घर में, अपने ही रचे गए ढोंग के बीच अकेली खड़ी रह गई। उसके हाथों से परोसने वाला बर्तन छूटकर गिर गया था। वह भागकर अपने बेडरूम में गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। फूट-फूटकर रोते हुए उसने अपना फोन उठाया और अपनी माँ, सुधा को कॉल किया।
फोन उठते ही मेघा सिसकते हुए बोली, “मम्मी… आज आरव ने सबके सामने मेरी बहुत बेइज्जती करा दी। मेरे सारे किए-धरे पर पानी फेर दिया। इतने लोगों के सामने मुझे नीचा दिखा दिया। न जाने उस बच्चे के दिमाग में ये सब उल्टी-सीधी बातें कौन भरता है।”
सुधा ने सारी बात बहुत ही धैर्य से सुनी। मेघा को उम्मीद थी कि उसकी माँ उसे सांत्वना देगी और आरव की गलती निकालेगी, लेकिन सुधा की आवाज बहुत गंभीर और ठंडी थी।
“मेघा, आरव ने तुम्हारी कोई बेइज्जती नहीं की है, उसने तो बस वह सच बोला है जिसे तुम और यह समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है,” सुधा ने गहरी सांस लेते हुए कहा। “बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं, वे वही सीखते और देखते हैं जो हम उनके सामने करते हैं। तुमने सुमित्रा जी के साथ जो व्यवहार किया, आरव ने वो सब अपनी आँखों से देखा है। जब सुमित्रा जी जिंदा थीं, तब तुमने उन्हें एक इंसान नहीं, बल्कि एक बोझ समझा। उनके खांसने से तुम्हें चिढ़ होती थी, उनकी जरूरतों को तुमने हमेशा अनदेखा किया। तुम भूल गई थीं कि वह तुम्हारे पति की माँ हैं और इस घर की नींव हैं।”
मेघा रोते हुए बोली, “लेकिन मम्मी, मैंने यह सब आज उनकी शांति के लिए ही तो किया था। मैं तो बस…”
“तुम बस दुनिया को दिखाना चाहती थी कि तुम कितनी अच्छी बहू हो,” सुधा ने मेघा की बात काटते हुए कहा। “श्राद्ध का असली मतलब मरे हुए लोगों को खाना खिलाना नहीं होता, बल्कि उनके प्रति अपनी सच्ची श्रद्धा व्यक्त करना होता है। जो श्रद्धा तुम्हारे दिल में जीते जी उनके लिए कभी नहीं जागी, वो आज उनके मरने के बाद अचानक कैसे आ गई? यह श्रद्धा नहीं, मेघा, यह सिर्फ एक दिखावा था। और एक छोटे बच्चे का मन इन दुनियादारी के पर्दों को नहीं समझता। वह ढोंग और सच्चाई के बीच का फर्क बहुत अच्छी तरह जानता है।”
सुधा की बातें मेघा के सीने में तीर की तरह चुभ रही थीं। “तो अब मैं क्या करूँ मम्मी? सब लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे?”
“लोगों की चिंता छोड़ो मेघा, अपने अंदर झांककर देखो। तुमने अपनी सास के साथ जो किया, उसे तो अब तुम बदल नहीं सकती। लेकिन आरव ने आज तुम्हें जो आईना दिखाया है, उससे तुम्हें सबक लेना चाहिए। फोन आरव को दो।”
मेघा ने कांपते हाथों से फोन बाहर खड़े आरव को थमा दिया।
“हेलो नानी,” आरव की उदास आवाज आई।
“बेटा आरव,” सुधा ने अपनी आवाज में दुनिया भर का प्यार भरते हुए कहा, “तुमने आज बिल्कुल सही बात कही। जो लोग भगवान के पास चले जाते हैं, हम उनके नाम से अच्छे काम करते हैं ताकि उन्हें याद रख सकें। लेकिन तुम्हारी मम्मी को यह बात आज समझ आई है कि असली पूजा किसी को जीते जी खुश रखना है। तुम्हारी मम्मी को अपनी गलती का अहसास हो गया है। वो दादी को बहुत याद कर रही हैं इसलिए शायद आज रो रही हैं। तुम अपनी मम्मी से नाराज मत होना, बल्कि उन्हें गले लगाकर कहना कि आगे से हम सब एक-दूसरे का बहुत ध्यान रखेंगे।”
फोन कटने के बाद मेघा ने आरव की तरफ देखा। आरव ने आगे बढ़कर अपनी माँ को कसकर गले लगा लिया और बोला, “रो मत मम्मी, दादी ऊपर से सब देख रही हैं। अगर आप प्रॉमिस करो कि अब से आप कभी किसी के साथ बुरा बर्ताव नहीं करोगी, तो दादी आपको माफ कर देंगी।”
मेघा फूट-फूटकर रोने लगी। उसने आरव को सीने से लगा लिया। आज उसे अपनी गलती का सच में अहसास हो गया था। उसे समझ आ गया था कि मरे हुए इंसान के लिए किए गए कर्मकांड कभी भी उस पाप को नहीं धो सकते, जो आपने उन्हें जीते जी दुख देकर कमाया है। आज एक आठ साल के बच्चे ने अपनी माँ को जीवन का सबसे बड़ा और कड़वा पाठ पढ़ा दिया था। मेघा ने तय किया कि वह अब अपनी बाकी की जिंदगी सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सच्ची इंसानियत और प्रेम के साथ जिएगी।
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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव