सिंदूर की राख से जन्मी ‘माँ’

 माँ की आवाज में एक ऐसा खौफनाक ठहराव था जो किसी भी इंसान की रूह कंपा दे। उसने आगे कहा, “कान खोलकर सुन लो। तुम्हारी पत्नी कल्याणी आज इसी फर्श पर तुम्हारे इन जूतों के नीचे मर चुकी है। अब जो तुम्हारे सामने खड़ी है, वो सिर्फ और सिर्फ इस लड़के की ‘माँ’ है। और … Read more

स्वाभिमान की धार

 जाने से पहले रघुपति सुरभि के पास आया। उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर सुरभि के सिर के ऊपर रखे और कांपती आवाज में बोला, “बिटिया, आज तुमने सिर्फ इस बूढ़े को काम नहीं दिया, तुमने मेरे स्वाभिमान को मरने से बचा लिया। आज मेरी बच्चियां पेट भर खाना खाएंगी और कल गर्व से स्कूल जाएंगी। … Read more

बरसों बाद लौटी वो शाम

हफ्ते भर की कॉर्पोरेट नौकरी, क्लाइंट मीटिंग्स और अनगिनत टारगेट्स ने मेरे दिमाग को किसी मशीन में तब्दील कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे मैं जी नहीं रहा हूँ, बस कलैंडर की तारीखों के साथ किसी अंधी दौड़ में भाग रहा हूँ। कई महीनों की इस कमरतोड़ मेहनत के बाद आज जाकर मुझे एक … Read more

उड़ान : एक अनकहा सफर

दूसरी ओर, रोहन भी अपने पिता के इस हस्तक्षेप से बुरी तरह चिढ़ गया था। पिता के सामने वह पलट कर जवाब तो नहीं दे सकता था, लेकिन उसका पुरुषार्थ इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि उसकी पत्नी अब उससे एक कदम आगे निकल चुकी है। पति और पत्नी एक गाड़ी … Read more

स्वाभिमान की छत

रात के खाने का समय हो चुका था, लेकिन घर में पसरा सन्नाटा किसी तूफान के आने का संकेत दे रहा था। डाइनिंग टेबल पर रखे खाने से उठती भाप धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी। तभी बेडरूम से एक ज़ोरदार आवाज़ आई। कांच का एक गिलास ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया था। “तुम्हें मेरी … Read more

प्रतिष्ठा का मुखौटा

दीनदयाल जी अपनी बात पूरी कर पाते, उससे पहले ही शेखर सेठ ने उनकी बात काटते हुए तल्ख लहज़े में कहा, “दीनदयाल जी! बात पाँच-सात लाख रुपये के खर्च की नहीं है, बात हमारी ‘हैसियत’ की है। बुआ जी के ससुराल वालों, हमारे पूरे खानदान और शहर के रसूखदार लोगों को पता तो चलना चाहिए … Read more

रिश्तों की डोर: पतंग और आसमान

“तुम्हारे बड़े भाई माधव ने उस धागे की तरह हमेशा तुम्हें थामे रखा,” श्रीधर जी ने आगे कहा। “जब एक्सीडेंट के बाद तुम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, तब उसी धागे ने तुम्हें गिरने नहीं दिया था। आज जब तुम अपने पैरों पर खड़े हो गए हो, तो तुम्हें लग रहा है … Read more

सच्ची तीर्थयात्रा

 “आप कहीं नहीं जाएंगे बाबूजी,” विक्रम ने दृढ़ता से कहा। उसने पीछे मुड़कर देखा और आवाज दी, “मीरा! जरा स्टोर रूम से वह कमोड वाली कुर्सी तो जल्दी से लेकर आना।” “जी, मैं अभी लाई,” मीरा तुरंत कुर्सी लेने दौड़ पड़ी। दीनानाथ जी ने विक्रम का हाथ पकड़ लिया और कांपती हुई आवाज में बोले, … Read more

उजड़ते आंगन में उम्मीद की वापसी

कौशल्या जी ने कांपते हाथों से देवांश का चेहरा उठाया और उसे सीने से लगा लिया। “तू आ गया मेरे बच्चे… तू आ गया। लेकिन तू था कहाँ? हमने तुझे कितना ढूंढा। अंजलि ने तुझे हज़ारों मेल किए, सैकड़ों फोन किए, लेकिन तेरा कोई अता-पता नहीं था। क्या तू हमसे इतना खफा था कि हमारी … Read more

गुरूर की टूटती दीवारें और अपनों का प्यार

विक्रम ने कठोरता से कहा, “माफी मुझसे नहीं, पापाजी से मांगो नीलू । शायद वही तुम्हारे इस कठोर व्यवहार को माफ कर सकें, मैं तो नहीं कर सकता।” नीलू  ने महेश  जी के पैर कसकर पकड़ लिए, “पापाजी, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैं वचन देती हूं कि आज के बाद आपको मुझसे कभी … Read more

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