पसीने से लिखी तकदीर

बेटी की बातें सुनकर सावित्री का दिल छलनी हो गया। एक माँ के लिए अपने जीते-जी बच्चे के भविष्य पर ऐसा कुठाराघात सहना बहुत मुश्किल था। उसे लगा कि बाहर जाकर उन ढोंगी बाबा को खूब खरी-खोटी सुनाए, लेकिन घर की मर्यादा और सास के डर से वह खून का घूंट पीकर रह गई। उसने … Read more

त्याग के पन्ने

“बेटा, अगर मेरे रहने से इस घर की शांति भंग होती है, तो मैं आज ही यह घर छोड़ दूंगी। मुझे बुढ़ापे में किसी पर बोझ बनकर नहीं रहना।” कांपते हाथों से अपनी पुरानी सूती साड़ी का पल्लू सँभालते हुए, बासठ वर्षीय सावित्री देवी ने अपने भारी मन से ये शब्द कहे। उनके चेहरे की … Read more

अधूरी कोख, मुकम्मल ममता

नंदिनी की उम्र बत्तीस साल हो चुकी थी और उसने यह मान लिया था कि उसकी ज़िंदगी की किताब में ‘परिवार’ नाम का पन्ना कभी नहीं जुड़ेगा। पुणे शहर की एक पुरानी और शांत कॉलोनी में पली-बढ़ी नंदिनी हमेशा से एक भरा-पूरा परिवार चाहती थी। लेकिन ज़िंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम उसे ख्यालों … Read more

स्वाभिमान की उड़ान

शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी रघुनाथ जी की जिंदगी में सब कुछ बहुत ही सुचारू रूप से चल रहा था। उनका साड़ियों का थोक व्यापार था, जिसे उन्होंने अपनी बरसों की कड़ी मेहनत और ईमानदारी से सींचा था। उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा गुरूर और उनकी सबसे बड़ी खुशी उनकी इकलौती बेटी, काव्या थी। काव्या … Read more

अनदेखी बेड़ियाँ: ‘चार लोगों’ का खौफ

विदाई की रुलाई और सफर की थकान से राधिका का पोर-पोर दर्द कर रहा था। भारी लहंगे और गहनों के बोझ से उसका शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था। ससुराल की दहलीज पार करने के बाद उसने सोचा कि अब वह अपने कमरे में जाकर थोड़ी देर आँखें मूंद लेगी। लेकिन अभी वह बिस्तर के … Read more

सिंदूर की राख से जन्मी ‘माँ’

 माँ की आवाज में एक ऐसा खौफनाक ठहराव था जो किसी भी इंसान की रूह कंपा दे। उसने आगे कहा, “कान खोलकर सुन लो। तुम्हारी पत्नी कल्याणी आज इसी फर्श पर तुम्हारे इन जूतों के नीचे मर चुकी है। अब जो तुम्हारे सामने खड़ी है, वो सिर्फ और सिर्फ इस लड़के की ‘माँ’ है। और … Read more

स्वाभिमान की धार

 जाने से पहले रघुपति सुरभि के पास आया। उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर सुरभि के सिर के ऊपर रखे और कांपती आवाज में बोला, “बिटिया, आज तुमने सिर्फ इस बूढ़े को काम नहीं दिया, तुमने मेरे स्वाभिमान को मरने से बचा लिया। आज मेरी बच्चियां पेट भर खाना खाएंगी और कल गर्व से स्कूल जाएंगी। … Read more

बरसों बाद लौटी वो शाम

हफ्ते भर की कॉर्पोरेट नौकरी, क्लाइंट मीटिंग्स और अनगिनत टारगेट्स ने मेरे दिमाग को किसी मशीन में तब्दील कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे मैं जी नहीं रहा हूँ, बस कलैंडर की तारीखों के साथ किसी अंधी दौड़ में भाग रहा हूँ। कई महीनों की इस कमरतोड़ मेहनत के बाद आज जाकर मुझे एक … Read more

उड़ान : एक अनकहा सफर

दूसरी ओर, रोहन भी अपने पिता के इस हस्तक्षेप से बुरी तरह चिढ़ गया था। पिता के सामने वह पलट कर जवाब तो नहीं दे सकता था, लेकिन उसका पुरुषार्थ इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि उसकी पत्नी अब उससे एक कदम आगे निकल चुकी है। पति और पत्नी एक गाड़ी … Read more

स्वाभिमान की छत

रात के खाने का समय हो चुका था, लेकिन घर में पसरा सन्नाटा किसी तूफान के आने का संकेत दे रहा था। डाइनिंग टेबल पर रखे खाने से उठती भाप धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी। तभी बेडरूम से एक ज़ोरदार आवाज़ आई। कांच का एक गिलास ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया था। “तुम्हें मेरी … Read more

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