तान्या के आंसुओं को अपने आंचल से पोंछा और उसे अपने सीने से लगाते हुए बोलीं, “अरे पगली, मां-बाप कभी अपने बच्चों की नादानियों से नाराज नहीं होते। तुम इस घर की बहू नहीं, हमारी बेटी हो। अगर हम तुम्हें समय पर आने-जाने या सेहत का ध्यान रखने को कहते हैं, तो इसलिए नहीं कि हम तुम्हारी आजादी छीनना चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि हमारी पूरी दुनिया तुम दोनों बच्चों की सलामती में ही बसती है। जब तक यह बूढ़े हाथ सलामत हैं, तुम्हें किसी भी परेशानी की आंच नहीं आने देंगे।”
भोपाल के अरेरा कॉलोनी के शांत और हरे-भरे इलाके में स्थित ‘सदाशिव सदन’ में सुबह की धूप खिली हुई थी। घर का वातावरण वैसे तो रोज की तरह शांत था, लेकिन इस शांति के भीतर एक अनकहा तूफान करवटें ले रहा था। दो मंजिला इस खूबसूरत मकान के आंगन में तुलसी के चौरे पर जल चढ़ाकर जैसे ही सावित्री जी रसोई की तरफ बढ़ीं, उन्हें हॉल से अपनी बहू तान्या के तेज कदमों की आवाज सुनाई दी। तान्या आधुनिक विचारों वाली, महत्वाकांक्षी और एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत युवती थी। उसका विवाह दो वर्ष पहले ही बैंक प्रबंधक मोहित के साथ हुआ था। घर में ससुर अमरनाथ जी, सास सावित्री जी, मोहित और तान्या चार ही लोग थे। पूरा परिवार सुखी और संपन्न था, लेकिन तान्या के मन में एक बात हमेशा खटकती रहती थी—घर के छोटे-छोटे नियम और कायदे।
उस दिन शाम को मोहित और तान्या को एक दोस्त की शादी की रिसेप्शन पार्टी में जाना था। तान्या गहरे लाल रंग की रेशमी साड़ी और भारी गहनों से सज-धज कर तैयार हुई थी। मोहित भी सूट-बूट में तैयार था। जब दोनों मुख्य द्वार से बाहर निकलने लगे, तो सावित्री जी ने हॉल से निकलते हुए बड़े लाड़ और अपनेपन से कहा, “अरे बच्चों, बाहर ठंड बढ़ रही है, जरा संभलकर जाना। और हां मोहित, कल सुबह तुम्हारे बाबूजी का रूटीन चेकअप है और तुम्हारी भी सुबह जल्दी मीटिंग है, तो कोशिश करना कि रात ग्यारह बजे तक लौट आओ। देर रात की सर्दी में सफर करना ठीक नहीं होता।”
सावित्री जी का यह कहना केवल एक मां की सहज चिंता थी, लेकिन तान्या के चेहरे का रंग पल भर में बदल गया। उसकी भौंहें तन गईं और होंठ खिंच गए। गाड़ी में बैठते ही उसने जोर से कार का दरवाजा बंद किया और गुस्से में मोहित की ओर देखकर चिल्ला पड़ी, “बस बहुत हो गया मोहित! मैं तुम्हारी मां के इस मानसिक पहरे में अब एक पल भी नहीं रह सकती। जब देखो तब टोका-टाकी! कब जाना है, कब आना है, क्या पहनना है, क्या खाना है… हर चीज पर तुम्हारी मम्मी जी का फरमान! मुझे ऐसा अलग घर चाहिए जहां मैं खुलकर सांस ले सकूं, जहां कोई मेरे आने-जाने का समय तय करने वाला न हो।”
मोहित ने स्टेयरिंग संभालते हुए उसे समझाने की भरसक कोशिश की, “तान्या, बात का बतंगड़ मत बनाओ। मां ने सिर्फ इतना ही तो कहा कि समय से लौट आना क्योंकि सुबह ठंड होती है और काम भी हैं। इसमें पहरा कहां से आ गया? वह हमारी फिक्र करती हैं।”
“फिक्र नहीं, यह हुकूमत है!” तान्या ने बिफरते हुए कहा। “तुम्हें यह प्यार लगता होगा क्योंकि तुम बचपन से इसके आदी हो, पर मेरे लिए यह गुलामी है। और मैं अब इस चारदीवारी में अपने जीवन की आजादी का दम घुटते नहीं देख सकती। कल ही मैं अलग फ्लैट देखने जा रही हूं। अगर तुम्हें अपनी मां के आंचल में ही रहना है तो तुम रहो, मैं अपना अलग आशियाना बसाऊंगी।”
पार्टी में भी तान्या का मूड उखड़ा रहा। अगले दिन रविवार था। उसने अपनी पुरानी सहेली और ऑफिस की सीनियर सहकर्मी वंदना के घर कॉफी पर मिलने का समय तय किया। वंदना तान्या से लगभग आठ वर्ष बड़ी थी, बेहद सुलझी हुई और तान्या उसे अपनी प्रेरणा मानती थी। वंदना ने पांच साल पहले अपने सास-ससुर से अलग होकर शहर के दूसरे कोने में एक बहुमंजिला अपार्टमेंट में फ्लैट लिया था। तान्या को हमेशा लगता था कि वंदना जैसी स्वच्छंद और आत्मनिर्भर जिंदगी ही असली नारी सशक्तीकरण और सुकून का नाम है।
दोपहर के समय जब तान्या वंदना के फ्लैट पर पहुंची, तो उसने देखा कि वंदना के चेहरे पर वह पुरानी ताजगी और चमक नहीं थी। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे थे, बाल बेतरतीब बंधे हुए थे और वह रसोई से हॉल के बीच बदहवास सी दौड़ रही थी। सिंक में जूठे बर्तनों का ढेर लगा था, वाशिंग मशीन की आवाज आ रही थी, और उसका सात साल का बेटा आरव सोफे पर बैठा रो रहा था क्योंकि उसे स्कूल के प्रोजेक्ट में मदद चाहिए थी।
“अरे तान्या, आओ बैठो… मैं बस दो मिनट में चाय चढ़ाकर आती हूं। आज कामवाली बाई नहीं आई और दूध वाला भी देर से आया,” वंदना ने हांफते हुए कहा।
तान्या ने सोफे पर बिखरे कपड़ों को समेटते हुए जगह बनाई और बैठ गई। कुछ देर बाद जब वंदना चाय के दो कप लेकर आई और गहरी सांस छोड़कर बैठी, तो तान्या ने उत्साह से कहा, “दीदी, मैं आपके पास एक बहुत जरूरी सलाह लेने आई हूं। मुझे आपके इसी अपार्टमेंट या आसपास कोई अच्छा सा टू-बीएचके फ्लैट किराए पर दिलवा दीजिए। मैं अब ससुराल छोड़ रही हूं। मुझे अपनी सास की उस बंदिशों भरी गुलामी से मुक्ति चाहिए। जैसे आप आजाद हैं, अपनी मर्जी की मालकिन हैं, मुझे भी वैसी ही जिंदगी जीनी है।”
तान्या की बात सुनकर वंदना के चेहरे पर कोई उत्साह नहीं आया, बल्कि उसकी आंखों में एक गहरी और दर्दनाक उदासी तैर गई। उसने चाय का घूंट भरा और एक ठंडी सांस लेकर तान्या की आंखों में झांका, “तान्या… आज से पांच साल पहले मैं भी ठीक इसी मोड़ पर खड़ी थी, जहां आज तुम खड़ी हो। मैंने भी अपनी सास की ममतामयी चिंता को गुलामी का नाम दिया था और बड़ी अकड़ के साथ अलग घर बसाया था। पर सच कहूं? जिस दिन मैंने उस चौखट को पार किया था, मैं आजाद नहीं हुई थी, बल्कि असल मायनों में उसी दिन से मैं जिंदगी की सबसे बदतरीन गुलामी में जकड़ गई।”
तान्या चौंक गई। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं, “यह आप क्या कह रही हैं दीदी? आप तो आत्मनिर्भर हैं, अपनी मर्जी से उठती हैं, सोती हैं, कोई टोकने वाला नहीं है। फिर गुलामी कैसी?”
वंदना ने फीकी हंसी हंसते हुए अपना सिर झुका लिया, “यही तो सबसे बड़ा मुगालता है तान्या! हम जवानी के घमंड और तथाकथित आधुनिकता के नशे में जिसे आजादी समझते हैं, वह दरअसल जिम्मेदारियों और अकेलेपन का ऐसा दलदल है जिससे बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता है। सुनो मेरी कहानी…”
वंदना ने नम आंखों से बताना शुरू किया, “जब मैं अपने ससुराल में थी, तब मुझे इस बात की तनिक भी परवाह नहीं होती थी कि घर के दरवाजे की घंटी कब बजी। कौन आया, कौन गया, बिजली का बिल कब भरा गया, राशन में दाल या चीनी खत्म हुई या नहीं, गैस सिलेंडर कब बुक कराना है—इन सब चिंताओं से मेरा दिमाग पूरी तरह आजाद था। सुबह मेरी नींद भले देर से खुले, पर मेज पर गर्म चाय और नाश्ता तैयार मिलता था। मेरी सास मुझे कभी एक शब्द नहीं कहती थीं। जब आरव पैदा हुआ, तो मुझे करियर छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि उसके दादा-दादी उसे अपनी पलकों पर बिठाकर रखते थे। वह उसके खाने-पीने से लेकर उसकी हर छोटी आदत का ध्यान रखते थे। मुझे कभी ऑफिस से घर भागने की हड़बड़ी नहीं होती थी।”
तान्या चुपचाप सुन रही थी। वंदना ने आगे कहा, “पर मुझे क्या लगता था? मुझे लगता था कि सासू मां का यह पूछना कि ‘बहू, ऑफिस से कब लौटोगी? आज खाने में क्या बनाऊं?’ मेरी आजादी में दखल है। मुझे चिढ़ होती थी जब मेरे पति गौरव ऑफिस से आकर पहले अपनी मां के कमरे में जाकर उनका हालचाल पूछते थे। मुझे लगता था कि मेरा पति सिर्फ मेरा होना चाहिए। मैंने झगड़े किए, ताने मारे, और आखिरकार गौरव को मजबूर करके यह अलग फ्लैट ले लिया।”
“फिर क्या हुआ दीदी?” तान्या की उत्सुकता और भीतर का डर दोनों बढ़ रहे थे।
“फिर जो हुआ, वह आजादी नहीं, एक अंतहीन सजा थी,” वंदना का गला रुंध गया। “अलग होते ही मैं इस घर की हर चीज की गुलाम बन गई। दरवाजे की घंटी की गुलाम, कामवाली बाई के नखरों की गुलाम, धोबी और दूध वाले के समय की गुलाम! अगर बाई एक दिन न आए, तो पूरे घर का काम, झाड़ू-पोछा और बर्तन मेरे सिर पर आ जाता है। ऑफिस में बैठी होती हूं तो दिमाग में यह चिंता घूमती रहती है कि आरव स्कूल से आकर अकेला क्या कर रहा होगा। किसी पार्टी या दोस्तों की महफिल में जाने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है क्योंकि बच्चे को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता, और हर जगह उसे घसीटा नहीं जा सकता। बच्चे की जरा सी तबीयत खराब हो जाए तो मेरी रातें जागते हुए कटती हैं। ससुराल में जब आरव को बुखार होता था, तो मां जी रात भर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखती थीं और मुझे सोने के लिए कहती थीं। यहां मैं सब कुछ खुद करते-करते शारीरिक और मानसिक रूप से टूट चुकी हूं।”
वंदना की आंखों से दो बूंद आंसू छलक कर उसके गालों पर बह निकले। उसने कांपती आवाज में कहा, “और सबसे बड़ी बात तान्या… मेरे इस फैसले ने मेरे हंसते-खेलते पति की मुस्कान छीन ली। गौरव पहले कितना खुशमिजाज था, आज वह केवल एक थका हुआ, चिड़चिड़ा इंसान बनकर रह गया है। उस पर अकेले पूरे घर का किराया, ईएमआई और अनगिनत खर्चों का ऐसा बोझ पड़ा है कि वह हंसना ही भूल गया है। उसके मन में अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़ने का जो अपराधबोध है, उसने हमारे बीच के प्यार को भी लील लिया है। अब हमारे बीच सिर्फ हिसाब-किताब और जिम्मेदारियों की बहस होती है, प्यार की बातें नहीं।”
तान्या का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने झिझकते हुए पूछा, “तो… तो आप वापस अपने ससुराल क्यों नहीं चली जातीं दीदी? आप सब लोग फिर से एक साथ क्यों नहीं रहने लगते?”
वंदना ने निराशा से अपना सिर हिलाया, “किस मुंह से वापस जाऊं तान्या? जब स्वाभिमान और जिद में आकर कोई रिश्ता तोड़ा जाता है, तो कांच की तरह बिखर जाता है। पिछले साल जब मैं बहुत बीमार पड़ी और गौरव भी ऑफिस के टूर पर था, तब गौरव ने हिम्मत करके बाबूजी से कहा था कि हम वापस घर आना चाहते हैं। जानते हो बाबूजी ने भारी मन से क्या कहा था? उन्होंने कहा, ‘बेटा, जब तुम दोनों हमें छोड़कर गए थे, तो उस सदमे और अपमान से उबरने में हमें सालों लग गए। समाज के तानों और अपने ही बच्चों के दिए उस घाव को हमने बड़ी मुश्किल से सहा है। अब इस बुढ़ापे में हममें फिर से कोई नया झटका या रोज-रोज की कलह सहने की हिम्मत नहीं बची है। तुम जहां हो, वहीं सुखी रहो।’ उनके उन शब्दों ने मेरे सीने को छलनी कर दिया था। उस दिन मुझे समझ आया कि बड़ों का घर छोड़ना जितना आसान होता है, उस टूटे हुए भरोसे के साथ वापस लौटना उतना ही नामुमकिन होता है।”
वंदना ने तान्या का हाथ अपने हाथों में थाम लिया और बड़ी आत्मीयता से समझाया, “तान्या, जब तक हम माता-पिता की छत्रछाया में रहते हैं, हमें धूप की तपिश का अहसास नहीं होता। वे एक मजबूत छतरी की तरह बाहर के सारे थपेड़ों को अपने ऊपर झेल लेते हैं और हमें सुरक्षित रखते हैं। उनकी थोड़ी सी रोक-टोक कोई गुलामी नहीं, बल्कि हमारी सुरक्षा की लक्ष्मण रेखा होती है। जिस दिन वह छतरी हटती है, उस दिन जिंदगी की कड़ी धूप सीधे हमारी रूह को झुलसा देती है। अपनी झूठी आजादी की खातिर उस ममतामयी छांव को मत ठुकराना। घर से बाहर कदम रखने से पहले हजार बार सोचना, क्योंकि बाहर सिर्फ अकेलापन और संघर्ष है, अपनापन नहीं।”
वंदना की बातें तान्या के दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रही थीं। घर लौटते समय रास्ते में उसके दिमाग में विचारों का भयानक द्वंद्व चल रहा था। कार की खिड़की से बाहर देखते हुए उसे अपनी सास का वह चेहरा याद आ रहा था, जो हर रोज उसके दफ्तर से लौटने पर एक गिलास ठंडा पानी और बादाम का हलवा लेकर उसके सामने मुस्कुराते हुए खड़ी रहती थीं। उसे याद आया कि जब पिछले महीने उसे तेज माइग्रेन का दर्द उठा था, तो सावित्री जी ने तीन घंटे तक उसके सिर में तेल की मालिश की थी और बिना किसी शिकायत के उसका पूरा ख्याल रखा था।
“और मैं? मैं उस निस्वार्थ ममता को गुलामी समझ बैठी?” तान्या की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उसे अपनी सोच पर गहरी ग्लानि होने लगी। उसने सोचा कि यदि वह अलग हो जाती, तो क्या वह वाकई खुश रह पाती? बिल्कुल नहीं। वह भी वंदना दीदी की तरह जिम्मेदारियों के बोझ तले दबकर चिड़चिड़ी हो जाती और अपने वैवाहिक जीवन की मिठास खो बैठती।
शाम के करीब सात बज रहे थे जब तान्या ने ‘सदाशिव सदन’ के दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा सावित्री जी ने ही खोला। उनके चेहरे पर वही सहज, वात्सल्य भरी मुस्कान थी। तान्या के चेहरे पर उदासी और आंखों में नमी देखकर सावित्री जी तुरंत चिंतित हो उठीं। उन्होंने तान्या का माथा छूते हुए कहा, “अरे बहू, क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है ना तुम्हारी? चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है? रुक, मैं अभी तेरे लिए अदरक वाली गर्म चाय बनाकर लाती हूं।”
तान्या अब अपने आंसुओं को रोक नहीं पाई। उसने आगे बढ़कर अपनी सास के गले से खुद को लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी। सावित्री जी हड़बड़ा गईं, उन्होंने तान्या की पीठ सहलाते हुए पूछा, “क्या हुआ तान्या बेटा? किसी ने कुछ कहा क्या? मोहित से कोई अनबन हुई है? मुझे बताओ, मैं डांटूंगी उसे।”
तान्या ने रोते हुए अपना सिर उठाया और हाथ जोड़कर बोली, “नहीं मम्मी जी, किसी ने कुछ नहीं कहा। बस मेरी ही आंखों पर अहंकार और नासमझी की ऐसी पट्टी बंधी थी कि मुझे आपकी ममता भरी फिक्र में बंदिशें नजर आ रही थीं। मैंने आज सुबह आपके प्रति जो कड़वाहट और गुस्सा दिखाया, उसके लिए मुझे माफ कर दीजिए। मैं इतनी अंधी हो गई थी कि यह भूल गई कि यह घर, यह परिवार और आपका आशीर्वाद ही मेरी सबसे बड़ी ताकत और सुरक्षा है।”
हॉल में खड़े मोहित और अमरनाथ जी भी यह सब देख रहे थे। मोहित की आंखों में हैरानी के साथ-साथ एक गहरा सुकून था। सावित्री जी की आंखें भी छलक आईं। उन्होंने तान्या के आंसुओं को अपने आंचल से पोंछा और उसे अपने सीने से लगाते हुए बोलीं, “अरे पगली, मां-बाप कभी अपने बच्चों की नादानियों से नाराज नहीं होते। तुम इस घर की बहू नहीं, हमारी बेटी हो। अगर हम तुम्हें समय पर आने-जाने या सेहत का ध्यान रखने को कहते हैं, तो इसलिए नहीं कि हम तुम्हारी आजादी छीनना चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि हमारी पूरी दुनिया तुम दोनों बच्चों की सलामती में ही बसती है। जब तक यह बूढ़े हाथ सलामत हैं, तुम्हें किसी भी परेशानी की आंच नहीं आने देंगे।”
उस पल तान्या को महसूस हुआ कि असली आजादी किसी रिश्ते को तोड़कर अलग हो जाने में नहीं है, बल्कि अपनों के स्नेह और सुरक्षा के दायरे में रहकर एक-दूसरे के सुख-दुख को बांटने में है। परिवार कोई बंधन नहीं, बल्कि वह मजबूत नींव है जो जीवन के हर तूफान में इंसान को डगमगाने से बचाती है। उस शाम जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर हंसते-मुस्कुराते हुए चाय पी रहा था, तो तान्या के मन का सारा संशय धुल चुका था। उसने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि सही समय पर उसकी आंखें खुल गईं और उसका हंसता-खेलता परिवार बिखरने से बच गया।
एक विचार आपके लिए: आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में अक्सर युवा पीढ़ी बड़ों की छोटी-मोटी रोक-टोक और फिक्र को ‘अपनी आजादी में दखल’ या ‘गुलामी’ समझ लेती है। लेकिन क्या सचमुच परिवार और माता-पिता के साये से अलग होकर ही आजादी मिलती है, या फिर असल सुकून और सुरक्षा अपनों के बीच रहकर ही संभव है? आपकी राय में एक सुखी संयुक्त परिवार को बनाए रखने के लिए बहू और सास दोनों को किस तरह से एक-दूसरे की सीमाओं और भावनाओं का सम्मान करना चाहिए? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।