गिरवी रखे कंगन – नम्रता सिंह 

जेठ की तपती दुपहरी थी। सूरज आग उगल रहा था और गांव की पगडंडियों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। अमराइयों में छिपी कोयल भी गर्मी के मारे चुप थी। इसी सन्नाटे को चीरती हुई एक सफेद रंग की बड़ी गाड़ी धूल उड़ाती हुई ‘चौधरी विला’ के पुराने लेकिन भव्य लोहे के गेट पर आकर रुकी। … Read more

देहरी के पार – डॉ उर्मिला शर्मा 

घर के आंगन में गेंदे के फूलों की सजावट और रसोई से आती देसी घी की महक बता रही थी कि आज तिवारी जी के घर में कोई खास उत्सव है। और हो भी क्यों न? उनकी लाड़ली बेटी, वंदना, पूरे दो साल बाद अपने मायके जो आई थी। घर का कोना-कोना खिल उठा था। … Read more

  शगुन का एक रुपया – संगीता अग्रवाल   

“जब एक अमीर समधी ने गरीब पिता के सामने हाथ फैलाकर कहा—’मुझे आपकी दौलत नहीं, आपकी वो धरोहर चाहिए जिसे आपने अपनी गरीबी की भट्टी में तपाकर कुंदन बनाया है… मुझे दहेज में आपकी बेटी के संस्कार और आपकी जेब का वो एक सिक्का चाहिए।’” शहर के सबसे पॉश इलाके में बने ‘सिंघानिया विला’ के … Read more

 मखमल के पर्दे  – रश्मि प्रकाश 

“हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि बाजार से हम ‘सुविधा’ खरीद सकते हैं, लेकिन ‘परवाह’ नहीं। जब करियर की दौड़ में एक माँ हारी, तो उस ‘घरेलू’ भाभी ने ही जीत दिलाई जिसे वो हमेशा कमतर समझती थी।” “अरे वाह नताशा! ये नई गाड़ी? और ये बैग तो पक्का इटैलियन ब्रांड का है?” पड़ोस … Read more

  “रिश्तों का रफू” – डॉ पारुल अग्रवाल 

“दीवारों की सीलन छुपाने के लिए हम अक्सर उस पर नई पेंटिंग टांग देते हैं, लेकिन घर के बुजुर्ग वो कारीगर होते हैं जो पेंटिंग नहीं देखते, बल्कि दीवार की नमी को छूकर बता देते हैं कि नींव कहाँ से कमज़ोर हो रही है।” घर के हॉल में सुबह के नौ बजते ही युद्ध का … Read more

“दो अधूरे सच” – निभा राजीव

“उसने शादी की थी अपने भाई की साँसें खरीदने के लिए, और उसने सात फेरे लिए थे अपनी बेटी को एक ‘माँ’ देने के लिए—जब दो मजबूरियां एक छत के नीचे टकराईं, तो रिश्ता कागज़ का नहीं, रूह का बन गया।” बनारस जंक्शन से ट्रेन के छूटते ही एसी फर्स्ट क्लास के कूपे में एक … Read more

फर्ज़ और फ़रेब के बीच – नंदिनी शर्मा

रसोई में बर्तनों के पटकने की आवाज़ ने सुबह की शांति को भंग कर दिया था। “गजब है! आज घर में सत्संग है, पंडित जी आने वाले हैं, और बहु महारानी कुर्सी पर बैठकर पूड़ियाँ बेल रही हैं? हे भगवान! अब तो रसोई भी अपवित्र हो गई। हमारे ज़माने में तो पैर टूटने पर भी … Read more

वो दूसरा कमरा – रमा शुक्ला 

“जब एक बहू ने अपनी सास के लिए वृद्धाश्रम का फॉर्म भरा, तो उसे नहीं पता था कि उसी फॉर्म पर अगला नाम उसकी अपनी माँ का लिखा जाने वाला है। एक ऐसा सच जो आपको झकझोर कर रख देगा। शाम की चाय की चुस्की लेते हुए वंदना ने अपने पति, समीर की ओर देखा। … Read more

दास बाबु की डायरी – प्रेषक प्रभा पारीक

पुरानी दिल्ली का चाँदनी चौक में पहाड़गंज का वह भीड़-भाड़ भरा पुराना ईलाका।  पता नहीं क्यों वहाँ एक ही तरह की रौनक ओर जिन्दा दिली सदा पसरी रहती। जो किसी की भी समझ के परे था। गरीब होते हुये भी यहाँ कोई उदास नहीं दिखता । चहकते से नजर आते चैहरेां के लोग,दास बाबु का … Read more

समझौता अब नहीं – करुणा मलिक 

रसोई की खिड़की से आती धूप की तीखी किरणें सुधा के चेहरे पर पसीने की बूंदों को चमका रही थीं। गैस पर चढ़ा बड़ा सा पतीला खदबदा रहा था, जिसमें पचास लोगों के लिए कढ़ी पक रही थी। सुधा ने पल्लू से माथा पोंछा और एक गहरी साँस ली। पिछले पाँच सालों से यही उसकी … Read more

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