ईंट की दीवारें

“दीदी, तू आ गई! मुझे लगा तू भी मुझसे पराई हो गई।” मयंक रो पड़ा।

स्मृति भी बाहर आ गई और शालिनी के पैर छूकर रोने लगी। शालिनी ने दोनों को बिठाया और भरे हुए गले से पूछा, “मयंक, ये सब क्या है? बाबूजी और अम्मा के जाने के बाद तुम दोनों ने इस घर को क्या बना दिया? क्या ज़मीन का एक टुकड़ा और दुकान तुम्हारे लिए उस प्यार से बड़े हो गए जो बाबूजी ने हमें सिखाया था?”

मयंक ने नज़रें झुका लीं। “दीदी, बात दुकान की नहीं थी। बड़े भैया को लगने लगा था कि व्यापार में मेरी वजह से नुकसान हो रहा है। मौसी और मामा के उकसाने पर भैया ने मुझसे हिसाब माँग लिया। मैं छोटा था, खून गर्म था, मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ

लखनऊ की भूलभुलैया जैसी पुरानी और भीड़भाड़ वाली गलियों से गुज़रते हुए ई-रिक्शा अपनी मंज़िल की तरफ धीरे-धीरे बढ़ रहा था, लेकिन उसमें बैठी शालिनी का दिल किसी तेज़ दौड़ती ट्रेन की तरह धड़क रहा था। पूरे पाँच साल बीत गए थे उसे अपने मायके की चौखट पर कदम रखे हुए। माता-पिता के अचानक एक रेल दुर्घटना में गुज़र जाने के बाद तो जैसे मायके से उसका नाता ही टूट सा गया था। उस मनहूस वक्त वह आई थी, खूब रोई थी, और फिर अपने पति की आर्मी की ट्रांसफरेबल नौकरी के कारण देश के अलग-अलग कोनों में ऐसी उलझी कि वापस लखनऊ लौट ही नहीं पाई। जब भी आने का कार्यक्रम बनता, कोई न कोई अड़चन सामने आ जाती। कभी बच्चों की बोर्ड परीक्षा, कभी पति की सरहद पर तैनाती। लेकिन इन सब व्यावहारिक कारणों से भी बड़ा एक और कारण था—वह अनजाना डर और घुटन, जो पिछले तीन सालों से उसके मन के किसी कोने में घर कर गया था।

शालिनी के दो भाई थे—बड़ा भाई प्रतीक और छोटा भाई मयंक। जब तक माता-पिता का साया सिर पर था, दोनों भाई मोहल्ले में राम-लक्ष्मण की जोड़ी कहलाते थे। बड़ी भाभी कामिनी और छोटी भाभी स्मृति के बीच तो सगी बहनों से भी गहरा रिश्ता था। पूरे चौक इलाके में उनके पुश्तैनी ज़रदोज़ी और चिकनकारी के व्यापार की और उनके संयुक्त परिवार की मिसालें दी जाती थीं। लेकिन माता-पिता के जाने के कुछ ही समय बाद मायके से जो खबरें शालिनी तक पहुँचने लगीं, वे किसी बुरे सपने जैसी थीं। दूर की मौसी और बुआ ने फोन कर-करके शालिनी के कान भरे थे कि उसके दोनों भाइयों में पुश्तैनी व्यापार और हवेली को लेकर भयंकर विवाद हो गया है। बात इतनी बिगड़ गई थी कि आंगन के बीचों-बीच दीवार खींच दी गई है। शालिनी को इन बातों पर यकीन नहीं होता था, लेकिन जब भी वह दोनों भाइयों को फोन करती, उनकी बातों में आई कड़वाहट और खिंचाव इस सच की गवाही दे देते थे।

आज शालिनी अपनी भतीजी, यानी प्रतीक की बेटी स्नेहा की शादी में शामिल होने आई थी। रिक्शा हवेली के बड़े से नक्काशीदार दरवाज़े के सामने रुका। शालिनी ने भारी मन से रिक्शे वाले को पैसे दिए और अपना सूटकेस लेकर दरवाज़े की ओर बढ़ी। शहनाई की धुन हवेली के अंदर से गूंज रही थी। गेंदे के फूलों से दरवाज़ा सजा हुआ था। जैसे ही शालिनी ने दरवाज़े के अंदर कदम रखा, उसकी नज़र सामने के नज़ारे पर पड़ी और उसके पाँव ज़मीन पर ही जम गए। उसके हाथ से सूटकेस का हैंडल छूट गया।

सामने वह विशाल और खूबसूरत आंगन, जहाँ कभी उसका पूरा बचपन बीता था, जहाँ दोनों भाई एक साथ पतंग उड़ाया करते थे, आज सचमुच दो हिस्सों में बँट चुका था। आंगन के ठीक बीचों-बीच एक भद्दी, बिना पलस्तर की आठ-दस फीट ऊँची ईंटों की दीवार खड़ी थी, जो उस घर का ही नहीं, बल्कि शालिनी के दिल का भी सीना चीर रही थी।

“ये क्या कर दिया भाभी आपने और भैया ने? ये कैसी मनहूस दीवार खड़ी कर दी हमारे घर में?” शालिनी अपने आँसुओं को नहीं रोक पाई और फफक कर रो पड़ी।

उसकी आवाज़ सुनकर बड़ी भाभी कामिनी दौड़ती हुई बाहर आईं। उनकी आँखों में भी शालिनी को देखकर नमी तैर गई, लेकिन उन्होंने शालिनी को गले लगाते हुए उसे चुप कराया, “अरे पगला गई है क्या, बाहर सड़क से लोग देख रहे हैं, तमाशा मत कर। अंदर चल, आज घर में बेटी की शादी का उल्लास है, ऐसे अपशकुन मत कर।”

कामिनी शालिनी को पकड़कर बाईं तरफ वाले हिस्से में ले गईं। शालिनी की नज़र दाईं तरफ वाले हिस्से पर थी। वहाँ सन्नाटा पसरा था, बस कुछ मज़दूर टेंट का सामान रख रहे थे। दिन भर हवेली के बाएँ हिस्से में चहल-पहल रही। शादी का घर था, रिश्तेदार आ-जा रहे थे। गीत गाए जा रहे थे। शालिनी ने देखा कि छोटा भाई मयंक और उसकी पत्नी स्मृति अपने दाईं तरफ वाले हिस्से में ही थे। वे शादी के कुछ बाहरी इंतज़ाम तो देख रहे थे, लेकिन हवेली के अंदर उनके हिस्से का दरवाज़ा बंद था। कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। दोनों भाइयों ने जैसे अपनी-अपनी दुनिया उस दीवार के आर-पार समेट ली थी।

शालिनी का मन इस घुटन भरे माहौल में नहीं लग रहा था। दोपहर के वक्त, जब सब रिश्तेदार आराम कर रहे थे, शालिनी चुपके से पिछले दरवाज़े से होकर दाईं तरफ मयंक के हिस्से में गई। मयंक बरामदे में अकेला बैठा एक डायरी के पन्ने पलट रहा था और स्मृति अंदर रसोई में कुछ काम कर रही थी। शालिनी को देखते ही मयंक की आँखें भर आईं। वह उठकर बहन के गले लग गया।

“दीदी, तू आ गई! मुझे लगा तू भी मुझसे पराई हो गई।” मयंक रो पड़ा।

स्मृति भी बाहर आ गई और शालिनी के पैर छूकर रोने लगी। शालिनी ने दोनों को बिठाया और भरे हुए गले से पूछा, “मयंक, ये सब क्या है? बाबूजी और अम्मा के जाने के बाद तुम दोनों ने इस घर को क्या बना दिया? क्या ज़मीन का एक टुकड़ा और दुकान तुम्हारे लिए उस प्यार से बड़े हो गए जो बाबूजी ने हमें सिखाया था?”

मयंक ने नज़रें झुका लीं। “दीदी, बात दुकान की नहीं थी। बड़े भैया को लगने लगा था कि व्यापार में मेरी वजह से नुकसान हो रहा है। मौसी और मामा के उकसाने पर भैया ने मुझसे हिसाब माँग लिया। मैं छोटा था, खून गर्म था, मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने भी ज़वाब दे दिया। बात बढ़ती गई और फिर… और फिर ये दीवार खड़ी हो गई। लेकिन दीदी, सच कहूँ? इस दीवार ने हमारी शांति भी छीन ली है। आज मेरी भतीजी की शादी है, और मैं अपने ही घर में एक अजनबी की तरह बैठा हूँ।”

शालिनी ने देखा कि मयंक की मेज़ पर एक बहुत ही सुंदर सोने की चेन का डिब्बा रखा था, जिस पर ‘स्नेहा के लिए’ लिखा था। वह समझ गई कि दीवारें भले ही खड़ी हो गई हों, लेकिन खून का रिश्ता अभी पूरी तरह मरा नहीं है।

शाम होते-होते हवेली बारातियों के स्वागत के लिए सज गई। प्रतीक दरवाजे पर खड़े होकर मेहमानों का स्वागत कर रहे थे, लेकिन उनकी आँखें बार-बार उस दीवार की तरफ उठ जाती थीं, जिसके पार उनका छोटा भाई था। जिस मयंक को उन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज बेटी की शादी जैसे बड़े मौके पर वह उनके साथ खड़ा नहीं था। अंदर से प्रतीक भी टूट रहे थे, लेकिन झूठे अहम और रिश्तेदारों की बातों ने उन्हें पत्थर बना दिया था।

बारात आ चुकी थी। जयमाल का कार्यक्रम संपन्न हुआ और मंडप में फेरों की तैयारी होने लगी। नवंबर का महीना था और आसमान साफ था, इसलिए मंडप आंगन में ही सजाया गया था। लेकिन किस्मत को शायद आज रात ही इस परिवार का सबसे बड़ा इम्तिहान लेना था। अचानक मौसम बिगड़ने लगा। तेज़ हवाओं के साथ आसमान में काले बादल घिर आए और देखते ही देखते बेमौसम की मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।

पूरे घर में अफरा-तफरी मच गई। आंगन में सजा मंडप भीगने लगा। मेहमान सिर छिपाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। प्रतीक के हिस्से वाला आंगन खुला था, जबकि मयंक के हिस्से में बाबूजी ने एक बहुत बड़ा पक्का शेड बनवाया था। बारिश इतनी तेज़ थी कि कुछ ही मिनटों में मंडप की आग बुझने की नौबत आ गई। रिश्तेदार और पंडित जी चिल्लाने लगे कि अगर फेरे समय पर नहीं हुए तो शुभ मुहूर्त निकल जाएगा। प्रतीक के माथे पर पसीना और आँखों में बेबसी के आँसू आ गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इतनी जल्दी इतने सारे मेहमानों और मंडप को कहाँ शिफ्ट करें।

तभी हवेली के बीचों-बीच खड़ी उस दीवार के पास से हथौड़े की ज़ोरदार आवाज़ें आने लगीं।

ठक्! ठक्! ठक्!

सब लोग हैरान होकर उस आवाज़ की तरफ देखने लगे। दीवार के उस पार से हथौड़े के वार हो रहे थे। चंद पलों में ही कच्ची ईंटों की वह दीवार बीच में से भरभरा कर गिर पड़ी। धूल का गुबार जैसे ही छँटा, सामने मयंक खड़ा था। उसके हाथ में एक भारी हथौड़ा था और उसके कपड़े धूल से सने हुए थे। उसके पीछे स्मृति और उनके कुछ नौकर खड़े थे।

मयंक ने हथौड़ा फेंक दिया और बिना कुछ कहे, तेज़ी से मंडप की तरफ बढ़ा। उसने अपने नौकरों को इशारा किया। “भैया, खड़े क्या हो! जल्दी से हवन कुंड और कुर्सियाँ उठाकर मेरे हिस्से वाले शेड के नीचे लाओ। मुहूर्त नहीं निकलना चाहिए मेरी बेटी का।”

प्रतीक अवाक रह गए। उनका गला रुंध गया। मयंक ने खुद आगे बढ़कर आग को भीगने से बचाया और सारा सामान अपने हिस्से के उस बड़े शेड के नीचे सुरक्षित रखवा दिया। कुछ ही मिनटों में मयंक और स्मृति ने मिलकर मेहमानों के बैठने की व्यवस्था अपने हिस्से में कर दी। कामिनी और स्मृति, जो सालों से एक-दूसरे से बात नहीं कर रही थीं, इस भागदौड़ में एक साथ मिलकर काम करने लगीं।

शादी की रस्में शेड के नीचे फिर से शुरू हुईं। बारिश बाहर अपना कहर बरपा रही थी, लेकिन हवेली के अंदर बरसों बाद एक अजीब सा सुकून बरस रहा था। जब कन्यादान का समय आया, तो पंडित जी ने कहा, “कन्या के चाचा और चाची को बुलाइए, उन्हें भी कन्यादान में हाथ लगाना है।”

प्रतीक ने मुड़कर मयंक की तरफ देखा। मयंक संकोच से एक कोने में खड़ा था। प्रतीक अपनी जगह से उठे, मयंक के पास गए और बिना कुछ बोले उसे खींचकर मंडप में ले आए। प्रतीक ने मयंक को अपने गले से लगा लिया। दोनों भाइयों के बरसों के गिले-शिकवे, वह सारा झूठा अहम, और रिश्तेदारों की फैलाई हुई वह सारी कड़वाहट, आज उन आँसुओं की धार में बह गई।

“मुझे माफ कर दे मेरे भाई,” प्रतीक ने रोते हुए कहा, “मैं बड़ा होकर भी समझदारी नहीं दिखा पाया। इस घर को, बाबूजी की यादों को मैंने बाँट दिया।”

मयंक ने बड़े भाई के पैर छूते हुए कहा, “नहीं भैया, गलती मेरी भी थी। लेकिन आज इस बारिश ने हमारे दिलों पर जमी धूल को धो दिया है। अब इस घर में कभी कोई दीवार नहीं बनेगी।”

शालिनी मंडप के एक किनारे खड़ी यह सब देख रही थी। उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। आज उसे लगा कि जैसे उसके माता-पिता का आशीर्वाद इस बारिश के रूप में आसमान से बरस रहा हो। विवाह संपन्न हुआ। अगली सुबह जब स्नेहा की विदाई हो रही थी, तो आंगन का नज़ारा बिल्कुल अलग था।

टूटी हुई दीवार की ईंटें आंगन के किनारे हटा दी गई थीं। पूरा आंगन अब एक था, विशाल और खूबसूरत। स्नेहा अपने दोनों पिताओं (प्रतीक और मयंक) के गले लगकर विदा हुई। विदाई के बाद, शालिनी, प्रतीक और मयंक उस टूटी हुई दीवार के मलबे के पास बैठे चाय पी रहे थे।

शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा, “जानते हो भैया, बाहर के लोग चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन एक ही कोख से जन्मे भाई-बहनों के बीच ईंट की दीवारें तो खड़ी की जा सकती हैं, पर दिलों के बीच की डोर को काटा नहीं जा सकता। जब मुसीबत आती है, तो अपना खून ही सबसे पहले सामने आता है।”

प्रतीक और मयंक ने एक-दूसरे की तरफ देखकर हामी भरी। कामिनी और स्मृति ने मिलकर नाश्ता लगाया। आज उस हवेली में फिर से वही पुरानी रौनक लौट आई थी। शालिनी को अब वापस लौटने की जल्दी नहीं थी। उसे पता था कि उसका मायका अब हमेशा के लिए एक हो गया है, एक ऐसा घर जहाँ अब कोई भी दीवार उनके प्यार को नहीं बाँट सकती।

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