मेरे पास समय नहीं है – करुणा मलिक 

शाम की धुंधली रोशनी खिड़की से छनकर ड्राइंग रूम में आ रही थी। 65 वर्षीय रमाकांत अपनी आराम कुर्सी पर बैठे दीवार घड़ी की टिक-टिक सुन रहे थे। टिक… टिक… टिक…। यह आवाज़ उन्हें हमेशा याद दिलाती थी कि समय कैसे रेत की तरह उनकी मुट्ठी से फिसलता जा रहा है। रमाकांत एक रिटायर्ड बैंक … Read more

वसीयत – करुणा मलिक 

काजल के हाथ से चाय का कप लगभग गिरते-गिरते बचा। बाहर आँगन में हो रहे शोर-शराबे ने उसके कानों में जैसे सीसा घोल दिया था। “तूने क्या सोचा था कि हमेशा ऐसे ही चलता रहेगा? ये घर मेरा है! और अब से वही होगा जो मैं कहूँगा,” आलोक, उसका जेठ, चिल्ला रहा था। काजल के … Read more

मातृत्व – करुणा मलिक 

नीलम अपनी बालकनी में खड़ी थी, हाथ में चाय का कप था जो अब ठंडा हो चुका था। उसकी नज़रें दूर कहीं शून्य में टिकी थीं, लेकिन मन स्मृतियों के बवंडर में फंसा हुआ था। वह सोच रही थी कि कैसे एक ‘सही’ फैसला लेने के चक्कर में जिंदगी उसे उस मोड़ पर ले आई … Read more

जोरू का गुलाम – गरिमा चौधरी 

“खट!” स्टील की थाली को मेज पर पटकने की तीखी आवाज़ से पूरे घर का सन्नाटा टूट गया। रसोई में खड़ी सुधा का दिल एक पल के लिए सहम गया। वह अपने सूजे हुए पैरों को घसीटते हुए डाइनिंग हॉल में आई। सामने उसकी सास, विमला देवी, और उनकी बड़ी ननद, सरोज बुआ, मुंह फुलाकर … Read more

बंटवारा – रमा शुक्ला

  ‘रघुनाथ सदन’ के विशाल बरामदे में एक अजीब सी मनहूसियत छाई थी। हवेली के मुखिया, ठाकुर वीरेंद्र प्रताप सिंह का आज तेरहवीं का दिन था। गांव भर के लोग भोजन करके जा चुके थे। घर के सदस्य अब थके-हारे और उदास चेहरों के साथ दीवान पर बैठे थे। लेकिन यह उदासी किसी अपने को खोने … Read more

असली शादी

कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ के साथ ही, बाहर बज रही शहनाई और मेहमानों का शोर एकदम से मद्धम पड़ गया। सन्नाटा… एक ऐसा भारी और बोझिल सन्नाटा जो किसी तूफ़ान के बाद आता है। मैं, मीरा, लाल जोड़े में सजी, पलंग के एक कोने पर बैठी थी। मेरे हाथों की मेहंदी का … Read more

मां कोई ज़रूरत नहीं होती, मां तो वो नीव होती है – लतिका श्रीवास्तव 

“मां..! अब मैं यहां एक पल भी नहीं रुक सकता। इस घर की दीवारों में अब मेरा और मेघा का दम घुटता है।” राघव ने अपना सूटकेस डाइनिंग टेबल पर पटकते हुए चीखकर कहा। उसकी आंखों में आंसू और गुस्सा दोनों एक साथ तैर रहे थे। “तो रुकने को कहा किसने है?” कौशल्या देवी ने … Read more

बुढ़ापे की लाठी – नरेंद्र चावला 

अनन्या अपने घर के आंगन की वह गौरैया थी, जिसके चहकने से ही सुबह होती थी। घर की सबसे छोटी संतान होने के नाते, उसे कभी ज़मीन पर पैर रखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। पिता हरिशंकर जी शहर के नामी व्यापारी थे, और उन्होंने अपनी इस लाडली को दुनिया की हर धूप-छांव से बचाकर … Read more

झांसी की रानी – सीमा राय 

खाकी वर्दी की बांह चढ़ाते हुए वाणी जैसे ही अपनी कॉलोनी के नुक्कड़ पर स्थित ‘दीनानाथ जनरल स्टोर’ के पास से गुजरी, हवा में तैरता हुआ एक तंज उसके कानों से टकराया। “-लो भाई, आ गई ‘झांसी की रानी’! घर में बीमार आदमी पड़ा है और मैडम को देखो, पुरुषों की तरह ऑटो दौड़ाने का … Read more

अपना घर – मनमोहन तिवारी 

“लो, तुम फिर यहाँ अँधेरे में खड़ी आँसू बहा रही हो… अब क्या हुआ? अभी तो अंदर सब कितना हँस-बोल रहे थे, समीर की प्रमोशन की खुशी मना रहे थे और तुम अचानक उठ कर यहाँ बालकनी में आकर रोना चालू हो गई।” पति, विवेक ने झुंझलाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में चिंता कम और … Read more

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