चाँदी की पायल

नेहा अपनी बालकनी में सूखते हुए कपड़े उतार रही थी कि तभी उसकी नज़र नीचे वाले घर के अहाते में पड़ी। नीचे के हिस्से में मिस्टर और मिसेज़ शर्मा रहते थे, जिन्हें पूरी कॉलोनी वाले प्यार से ‘रघु अंकल’ और ‘कल्याणी आंटी’ कहते थे। नेहा ने देखा कि कल्याणी आंटी बड़ी बेचैनी से मुख्य द्वार (गेट) से लेकर सड़क के नुक्कड़ तक बार-बार चक्कर लगा रही थीं। उनके चेहरे पर गहरी चिंता की लकीरें थीं और वे अपने दुपट्टे के पल्लू को बार-बार उंगलियों में लपेट रही थीं।

नेहा को कुछ अजीब लगा। आमतौर पर इस समय दोनों बुज़ुर्ग पति-पत्नी अपने बरामदे में बैठकर चाय पीते हुए पुराने गानों का आनंद लेते थे। नेहा ने ऊपर से ही आवाज़ दी, “आंटी जी! क्या हुआ? सब ठीक तो है ना? आप ऐसे परेशान क्यों टहल रही हैं?”

नेहा की आवाज़ सुनते ही कल्याणी आंटी का सब्र का बांध टूट गया। वे वहीं गेट के पास खड़ी होकर फूट-फूट कर रोने लगीं। नेहा घबरा गई। उसने कपड़े वहीं कुर्सी पर फेंके और तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरकर नीचे पहुँची।

“क्या हुआ आंटी? आप ऐसे रो क्यों रही हैं? रघु अंकल कहाँ हैं?” नेहा ने उनके कंधे को सहलाते हुए पूछा।

“नेहा बेटी… तुम्हारे अंकल… तुम्हारे अंकल दोपहर तीन बजे से घर पर नहीं हैं,” कल्याणी आंटी की आवाज़ काँप रही थी। “वो बस ये कहकर गए थे कि पास वाले बाज़ार से कुछ ज़रूरी सामान लाना है, आधे घंटे में आ जाऊंगा। पर देख, शाम ढल गई, अंधेरा होने को है, उनका कुछ अता-पता नहीं है।”

तभी नेहा का पति, समीर, अपनी कार से ऑफिस से लौटा। गेट के पास दोनों महिलाओं को इस तरह परेशान और कल्याणी आंटी को रोता हुआ देखकर वह तुरंत कार से बाहर निकला। “क्या हुआ नेहा? आंटी जी इस तरह क्यों रो रही हैं?” समीर ने चिंता से पूछा।

“समीर, रघु अंकल दोपहर से घर नहीं आए हैं। आंटी बहुत घबराई हुई हैं,” नेहा ने जल्दी से स्थिति समझाई।

समीर ने अपनी ब्रीफकेस साइड में रखी और आंटी के पास आकर बोला, “आंटी, आप शांत हो जाइए। क्या आपने उनके मोबाइल पर फोन किया?”

“अरे बेटा, मैं तो पिछले दो घंटे से लगातार फोन मिला रही हूँ। शुरुआत में तो घंटी जा रही थी, पर कोई उठा नहीं रहा था। और अब पिछले आधे घंटे से उनका फोन स्विच ऑफ बता रहा है,” कल्याणी आंटी रुंधे हुए गले से बोलीं। “समीर बेटा, तुझे तो पता है ना, उन्हें दिल की बीमारी है। पिछले साल ही तो बाईपास सर्जरी हुई थी। ऊपर से घुटनों के दर्द की वजह से वो ज़्यादा चल भी नहीं पाते। कहीं रास्ते में चक्कर खाकर गिर तो नहीं गए? हे भगवान! मेरे तो बच्चे भी अमेरिका में हैं, मैं अकेली क्या करूँगी?”

कल्याणी आंटी का डर लाज़िमी था। इस उम्र में, जब शरीर साथ छोड़ना शुरू कर देता है, तब किसी अपने का इस तरह अचानक गायब हो जाना किसी बड़े सदमे से कम नहीं होता।

समीर ने तुरंत अपनी कार की चाबी निकाली और बोला, “आंटी, आप बिल्कुल भी मत घबराइए। मैं अभी आस-पास के सभी बाज़ारों, चौराहों और अगर ज़रूरत पड़ी तो पास के क्लिनिक और अस्पताल में जाकर देखता हूँ। वो ज़रूर कहीं रास्ते में किसी परिचित से बातों में लग गए होंगे। आप बस हिम्मत रखिए।”

नेहा ने कल्याणी आंटी को सहारा देकर अंदर सोफे पर बिठाया और उन्हें पानी का गिलास दिया। “हाँ आंटी, समीर उन्हें अभी ढूँढ कर ले आएंगे। आप अपने मन में बुरे खयाल मत लाइए।”

समीर बस कार स्टार्ट करने ही वाला था कि तभी कॉलोनी के मोड़ से एक पुरानी सी ऑटो-रिक्शा धक-धक करती हुई उनके घर के सामने आकर रुकी। ऑटो के रुकते ही उसमें से जो शख्स उतरा, उसे देखकर कल्याणी आंटी की जान में जान आई और वे लगभग दौड़ती हुई बाहर की तरफ भागीं।

वो रघु अंकल थे। उनके सफेद कुर्ते पर काफी धूल लगी हुई थी, चेहरे पर गहरी थकान थी, पसीने से उनके माथे के बाल चिपके हुए थे और वे अपनी छड़ी के सहारे थोड़ा लंगड़ा कर चल रहे थे। उनके एक हाथ में कपड़े की एक छोटी सी पोटली और एक पुराना सा डिब्बा था।

“कहाँ चले गए थे आप!” कल्याणी आंटी उनके पास पहुँचते ही रोते हुए चीख पड़ीं। “आपको अंदाज़ा भी है कि मेरी यहाँ क्या हालत हो रही थी? दोपहर तीन बजे के गए हुए हैं, और अब रात होने वाली है! फोन क्यों बंद है आपका? ऐसे कोई करता है क्या इस उम्र में?” आंटी की आवाज़ में गुस्सा कम और अपने पति को सुरक्षित देखने की तड़प ज़्यादा थी।

रघु अंकल ने गहरी साँस ली और अपनी थकान भरी आँखों से मुस्कुराते हुए कल्याणी आंटी को देखा। “अरे मेरी झाँसी की रानी, ऐसे मोहल्ले वालों के सामने तो मत डांट। देख, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

समीर ने आगे बढ़कर रघु अंकल को सहारा दिया और उन्हें अंदर लाकर सोफे पर बिठाया। नेहा तुरंत उनके लिए पानी लेकर आई। पानी पीने के बाद जब रघु अंकल की साँस थोड़ी सामान्य हुई, तो समीर ने पूछा, “अंकल जी, सच में आप कहाँ थे? हम लोग तो पुलिस कंप्लेंट करने की सोच रहे थे।”

रघु अंकल ने एक नज़र कल्याणी आंटी पर डाली, जो अभी भी आँसू पोंछते हुए उन्हें गुस्से से घूर रही थीं। उन्होंने प्यार से आंटी का हाथ अपने हाथों में लिया और बोले, “कल्याणी, तुझे याद है आज कौन सा दिन है?”

कल्याणी आंटी ने झल्लाते हुए कहा, “मुझे कुछ याद नहीं है। आप सीधे-सीधे बताइए आप शहर के किस कोने में भटक रहे थे?”

रघु अंकल ने हल्की सी हँसी के साथ कहा, “आज ही के दिन, ठीक पैंतालीस साल पहले, मैं तुम्हें ब्याह कर इस शहर में लाया था। याद है, जब हम स्टेशन पर ट्रेन से उतर रहे थे, तो भीड़ में धक्का लगने से तुम्हारे पैर की एक चाँदी की पायल कहीं गिर गई थी। तुम उस पायल के लिए कितना रोई थीं। वो तुम्हारी माँ की दी हुई आखिरी निशानी थी। मैंने उसी दिन तुमसे वादा किया था कि एक दिन मैं तुम्हें बिल्कुल वैसी ही जालीदार डिज़ाइन वाली चाँदी की पायल लाकर दूँगा।”

कल्याणी आंटी अवाक रह गईं। उनके गुस्से की जगह अब एक अजीब सी हैरानी ने ले ली थी।

रघु अंकल ने अपनी बात जारी रखी, “ज़िंदगी की भागदौड़ में, बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादियाँ, और फिर बीमारियों के खर्चे में… वो वादा कहीं पीछे छूट गया। पर मुझे वो वादा हमेशा याद रहा। आज हमारी पैंतालीसवीं सालगिरह थी। मैं पास वाले सुनार के पास नहीं जाना चाहता था, क्योंकि पुरानी डिज़ाइन सिर्फ पुराने शहर के चौक बाज़ार में ही मिल सकती थी, जहाँ वो पुराने कारीगर बैठते हैं।”

समीर हैरान होकर बोला, “चौक बाज़ार! अंकल, वो यहाँ से बीस किलोमीटर दूर है और वहाँ इतनी भीड़ होती है। आप वहाँ कैसे गए?”

“बस बदल-बदल कर गया बेटा,” रघु अंकल ने मासूमियत से जवाब दिया। “मुझे पता था कि अगर मैं तुम्हें या कल्याणी को बताता, तो तुम लोग मुझे इतनी दूर अकेले जाने ही नहीं देते। और अगर तुम साथ जाते, तो ये सरप्राइज़ कैसे रहता? वहाँ बाज़ार में उस कारीगर की दुकान ढूँढने में बहुत समय लग गया। और ऊपर से चौक की उस भीड़ में किसी का धक्का लगा, तो मेरा मोबाइल हाथ से छूटकर गिर गया और टूट गया। इसलिए मैं तुम्हें फोन भी नहीं कर पाया।”

इतना कहकर रघु अंकल ने अपने हाथ में पकड़ी हुई वो कपड़े की पोटली खोली। उसमें से एक बेहद खूबसूरत, पुरानी शैली की जालीदार चाँदी की पायल की जोड़ी निकली, जो बिल्कुल वैसी ही थी जैसी पायल कल्याणी आंटी ने पैंतालीस साल पहले खो दी थी। साथ ही उन्होंने वो पुराना सा डिब्बा भी खोला, जिसमें कल्याणी आंटी की मनपसंद ‘रमाकांत हलवाई’ की केसरिया जलेबियाँ थीं, जो सिर्फ उसी चौक बाज़ार में मिलती थीं।

“मेरी पेंशन के पैसों से मैं तुम्हारे लिए कोई हीरे का हार तो नहीं ला सकता कल्याणी, लेकिन अपना सालों पुराना वादा तो पूरा कर ही सकता हूँ,” रघु अंकल ने मुस्कुराते हुए कहा। फिर उन्होंने अपनी कमर के दर्द की परवाह न करते हुए, धीरे से नीचे झुककर कल्याणी आंटी के पैरों में वो पायल पहनानी शुरू कर दी।

कल्याणी आंटी की आँखों से अब जो आँसू बह रहे थे, वो डर या गुस्से के नहीं, बल्कि बेइंतहा प्यार और खुशी के थे। उन्होंने रघु अंकल के हाथों को पकड़ लिया और उनके सीने से लगकर फूट-फूट कर रो पड़ीं। “आप भी ना… बिल्कुल पागल हैं। मुझे ये पायल नहीं चाहिए, मुझे सिर्फ आप चाहिए। अगर आपको कुछ हो जाता तो मैं इस पायल का क्या करती?”

रघु अंकल ने प्यार से उनके आँसू पोंछे और कहा, “अरे पगली, जब तक तू मेरे साथ है, मुझे क्या हो सकता है? चल अब बता, ये पायल पहनकर तू खुश तो है ना?”

वहाँ खड़े समीर और नेहा की आँखें भी भीग चुकी थीं। आज उन्होंने किताबों और फिल्मों से अलग, असल ज़िंदगी के उस प्रेम को देखा था, जो उम्र की झुर्रियों, बीमारियों और समय की मार से भी कहीं ज़्यादा ताक़तवर था। उन्होंने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया, शायद ये सोचकर कि क्या वे भी बुढ़ापे में एक-दूसरे से ऐसा ही निस्वार्थ प्रेम कर पाएंगे।

प्रेम की कोई उम्र नहीं होती, कोई सीमा नहीं होती। जब तक दिल धड़कता है, तब तक प्यार जवां रहता है।

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लेखक : विजय सीकर

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