ऊपर वाले का दरवाजा

सुमेधा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। दस दिन का वह नर्क, वह पल-पल मरने का एहसास, वह रातों की नींद और आंसुओं का सैलाब… सब कुछ एक झटके में खत्म हो गया था। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।

डॉक्टर माथुर ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “देखिए मिसेज सुमेधा, पिछले दस दिनों में आपने और आपके पति ने जो मानसिक संत्रास झेला है, जो तकलीफ उठाई है, उसकी भरपाई मैं या यह अस्पताल किसी भी कीमत पर नहीं कर सकते।

बारिश की हल्की बूँदें मंदिर के प्रांगण को भिगो रही थीं, लेकिन सुमेधा की आँखों से बहने वाला सैलाब इस सावन की बारिश से कहीं ज्यादा गहरा और दर्दनाक था। वह नंगे पैर मंदिर की सीढ़ियां चढ़ रही थी। उसके पैरों में चुभने वाले कंकड़ उसे महसूस नहीं हो रहे थे क्योंकि उसके दिल में जो शूल चुभ रहा था, उसके आगे दुनिया का हर दर्द बेमानी था। पिछले दस दिनों से उसकी आँखों में नींद का एक कतरा तक नहीं था। एक पत्नी, जिसने अपनी दुनिया सिर्फ अपने पति के इर्द-गिर्द बुनी हो, भला वह कैसे सो सकती थी? उसका पति, उसका इकलौता सहारा, उसका प्यार—आदित्य, आज शहर के सबसे बड़े अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था।

सुमेधा और आदित्य की कहानी किसी परीकथा से कम नहीं थी। दोनों ने दुनिया की परवाह किए बिना, अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर एक-दूसरे का हाथ थामा था। आदित्य ने सुमेधा को हर वह खुशी दी थी, जिसकी उसने कभी ख्वाहिश की थी। एक छोटे से किराए के मकान में शुरू हुआ उनका सफर, दोनों की मेहनत और अटूट प्रेम के बल पर एक खुशहाल आशियाने में बदल गया था। लेकिन किस्मत को शायद उनकी यह खुशी रास नहीं आई। दस दिन पहले, आदित्य को अचानक चक्कर आया और वह ऑफिस में बेहोश होकर गिर पड़ा। शुरुआत में सबको लगा कि यह सिर्फ थकान या कमजोरी है, लेकिन जब सुमेधा उसे लेकर अस्पताल दौड़ी और कई सारे टेस्ट हुए, तो डॉक्टर ने जो रिपोर्ट बताई, उसने सुमेधा के पैरों तले से जमीन ही खिसका दी।

डॉक्टर के वे लफ्ज़ आज भी सुमेधा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंज रहे थे—”आई एम सॉरी मिसेज सुमेधा, आपके पति को ब्लड कैंसर है, और वह भी एडवांस स्टेज में।”

कैंसर… यह सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि सुमेधा की दुनिया के उजड़ जाने का फरमान था। उस दिन अस्पताल के उस ठंडे केबिन में सुमेधा को लगा था जैसे किसी ने उसका दिल मुट्ठी में भींच लिया हो। वह बाहर आकर आदित्य के सामने मुस्कुराने की कोशिश करती, उसे ढांढस बंधाती कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन अंदर ही अंदर वह कांच की तरह चकनाचूर हो चुकी थी। जब भी वह वार्ड में किसी डॉक्टर या नर्स को सफेद कोट पहने देखती, तो उसे उनमें जिंदगी बचाने वाले फरिश्ते नहीं, बल्कि साक्षात यमदूत नजर आते। उसे लगता जैसे ये सफेद कोट वाले लोग बस यह बताने आते हैं कि अब आदित्य के पास कितना कम समय बचा है।

बीमारी के इस कहर के साथ-साथ एक और पहाड़ सुमेधा के सामने खड़ा था—पैसों का इंतजाम। कैंसर का इलाज, कीमोथेरेपी, और अस्पताल का भारी-भरकम बिल। सुमेधा ने अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी थी, अपने गहने तक गिरवी रख दिए थे, लेकिन फिर भी इलाज के लिए जितने पैसों की जरूरत थी, उसका आधा भी इकट्ठा नहीं हो पा रहा था। हर दरवाजा खटखटाने के बाद भी जब हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी, तो आज वह उस दर पर आई थी, जहां से कोई खाली हाथ नहीं लौटता।

मंदिर में आज कोई खास भीड़ नहीं थी। सुमेधा धीरे-धीरे चलते हुए भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की भव्य मूर्ति के सामने जाकर खड़ी हो गई। कभी इसी मंदिर में वह आदित्य के साथ हंसते-मुस्कुराते आती थी, भविष्य के सपने बुनती थी, लेकिन आज उसके होंठ कांप रहे थे। उसने अपने दोनों हाथ जोड़े और मूर्ति के सामने घुटनों के बल बैठ गई। उसकी रुंधे हुए गले से आवाज निकली, “हे कान्हा… मैंने अपनी जिंदगी में कभी आपसे कुछ ज्यादा नहीं मांगा। आपने हमें गरीबी दी, हमने हंसकर सह लिया। आपने हमें अपने परिवारों से दूर कर दिया, हमने एक-दूसरे में ही अपनी दुनिया खोज ली। हमारे आंगन में कोई संतान नहीं आई, मैंने कभी शिकायत नहीं की… मैंने यही सोचा कि शायद मेरे भाग्य में मां बनना नहीं लिखा है, और मैं आदित्य के प्यार को ही अपना सब कुछ मानकर खुश रही। पर आज… आज आप मुझसे मेरा सुहाग, मेरा जीवनसाथी छीन रहे हैं? यह कैसा न्याय है मेरे ठाकुर?”

सुमेधा की आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह सिसकते हुए बोली, “मुझे कोई दौलत नहीं चाहिए, कोई महल नहीं चाहिए, बस मेरे आदित्य को मुझे लौटा दो। वह मेरे बिना जी नहीं पाएगा और मैं उसके बिना एक पल भी सांस नहीं ले पाऊंगी। चारों तरफ सिर्फ घना अंधेरा है प्रभु, मुझे कोई रास्ता दिखाओ। कोई चमत्कार कर दो मेरे कान्हा…”

मंदिर के शांत वातावरण में सिर्फ सुमेधा की सिसकियां गूंज रही थीं। कुछ देर वहीं फर्श पर सिर रखकर रोने के बाद, वह उठी। बाहर निकलते हुए उसकी नजर मंदिर के प्रांगण में बने गरुड़ जी की मूर्ति पर पड़ी। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, सुमेधा ने उनके कानों के पास जाकर फुसफुसाते हुए अपनी मन्नत मांगी, “कहते हैं आप भगवान तक हमारी पुकार बहुत जल्दी पहुंचाते हैं… कृपया मेरे आदित्य के प्राणों की रक्षा कीजिए। आज डॉक्टर उसकी कीमोथेरेपी की पहली तारीख तय करने वाले हैं, आज कुछ ऐसा कर दीजिए कि मुझे मेरा हंसता-खेलता परिवार वापस मिल जाए।”

भारी कदमों और एक अनजानी सी, धुंधली सी उम्मीद के साथ सुमेधा ने मंदिर की सीढ़ियां उतरीं और सीधे अस्पताल की तरफ चल पड़ी। रास्ते भर उसके दिमाग में बुरे ख्याल आ रहे थे। अगर आदित्य को कुछ हो गया तो वह क्या करेगी? अस्पताल के गेट पर पहुंचते ही उसकी धड़कनें तेज हो गईं। वह तेज कदमों से चलती हुई ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट की तरफ बढ़ी।

जैसे ही सुमेधा डॉक्टर माथुर के केबिन के बाहर पहुंची, नर्स ने उसे तुरंत अंदर जाने को कहा। सुमेधा कांपते हाथों से दरवाजा खोलकर अंदर दाखिल हुई। डॉक्टर माथुर अपनी कुर्सी पर बैठे थे और उनके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी। सुमेधा को देखते ही डॉक्टर माथुर अपनी जगह से खड़े हो गए और उन्होंने अपनी नजरें झुका लीं।

“आई एम सो सॉरी, मिसेज सुमेधा…” डॉक्टर के मुंह से निकले इन शब्दों को सुनते ही सुमेधा के शरीर का सारा खून जैसे जम गया। उसका दिमाग सुन्न पड़ गया। ‘सॉरी’ का क्या मतलब था? क्या आदित्य…? क्या समय खत्म हो गया था? अनिष्ट की आशंका से सुमेधा का पूरा शरीर पसीने से भीग गया। इससे पहले कि वह गिर पड़ती या उसकी चीख निकलती, डॉक्टर माथुर ने तुरंत आगे बढ़कर कहा, “प्लीज घबराइए मत! आपके पति बिल्कुल ठीक हैं मिसेज सुमेधा! प्लीज, रिलैक्स… बैठिए।”

सुमेधा की सांसें जो गले में अटक गई थीं, वह भारीपन से कुर्सी पर धम्म से बैठ गई। उसकी आँखों में आंसू और उलझन दोनों थे। “ठीक हैं? लेकिन आपने अभी सॉरी कहा… और वो कैंसर…”

डॉक्टर माथुर ने एक गहरी सांस ली और हाथ जोड़ते हुए बोले, “मैं आपसे हाथ जोड़कर माफी मांगना चाहता हूं। दरअसल… अस्पताल की पैथोलॉजी लैब से एक बहुत बड़ी, एक भयानक गलती हो गई थी। उसी दिन हमारे अस्पताल में ‘आदित्य कुमार’ नाम के एक और मरीज का ब्लड सैंपल और बोन मैरो टेस्ट आया था। लैब असिस्टेंट की लापरवाही से दोनों सैंपल्स के बारकोड बदल गए थे। आपके पति की रिपोर्ट उस दूसरे मरीज की फाइल में लग गई और उस कैंसर पेशेंट की रिपोर्ट आपके पति की फाइल में…”

सुमेधा की आंखें फटी की फटी रह गईं। “तो… तो मेरे आदित्य को…?”

“आपके पति को कोई कैंसर नहीं है मिसेज सुमेधा। कोई जानलेवा बीमारी नहीं है,” डॉक्टर माथुर के चेहरे पर अब राहत और पछतावे के मिले-जुले भाव थे। “उन्हें सिर्फ एक गंभीर किस्म का वर्टिगो (चक्कर आने की बीमारी) और अत्यधिक स्ट्रेस के कारण होने वाली एक्यूट कमजोरी है। इसी वजह से वो बेहोश हुए थे। कुछ विटामिन्स की कमी है और बस एक हफ्ते के सामान्य इलाज और आराम के बाद वो बिल्कुल स्वस्थ होकर आपके साथ घर जा सकेंगे।”

सुमेधा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। दस दिन का वह नर्क, वह पल-पल मरने का एहसास, वह रातों की नींद और आंसुओं का सैलाब… सब कुछ एक झटके में खत्म हो गया था। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।

डॉक्टर माथुर ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “देखिए मिसेज सुमेधा, पिछले दस दिनों में आपने और आपके पति ने जो मानसिक संत्रास झेला है, जो तकलीफ उठाई है, उसकी भरपाई मैं या यह अस्पताल किसी भी कीमत पर नहीं कर सकते। यह कोई छोटी-मोटी भूल नहीं, बल्कि एक अक्षम्य अपराध है। मैनेजमेंट ने उस लैब असिस्टेंट को सस्पेंड कर दिया है। लेकिन एक डॉक्टर होने के नाते, यह मेरी जिम्मेदारी थी। इसलिए, प्रायश्चित के तौर पर, आपके पति के अब तक के इलाज, कमरे का किराया, और आगे की दवाइयों का सारा खर्च मैं खुद उठाऊंगा। आपको एक भी पैसा देने की जरूरत नहीं है। मुझे पता है कि इससे आपके दर्द की भरपाई नहीं होगी, लेकिन शायद मेरा बोझ कुछ कम हो जाए।”

सुमेधा अब भी अवाक थी। उसकी आँखों से अब जो आंसू बह रहे थे, वे दुख के नहीं, बल्कि असीम शांति और खुशी के थे। उसने खिड़की की तरफ देखा। बाहर बारिश रुक चुकी थी और बादलों के बीच से सूरज की सुनहरी किरणें छनकर केबिन में आ रही थीं। उन किरणों की रोशनी में डॉक्टर माथुर का वह सफेद कोट चमक रहा था। जो सफेद कोट पिछले दस दिनों से उसे यमराज की पोशाक लगता था, आज उसी सफेद कोट में सुमेधा को साक्षात अपने कान्हा, अपने भगवान नजर आ रहे थे, जिन्होंने किसी रूप में आकर उसके सुहाग की रक्षा की थी।

सुमेधा ने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखा और उसके होंठों से बस यही निकला—”जय श्री कृष्णा… मेरे कान्हा, तूने मेरी पुकार सुन ली।”

वह उठी और दौड़ते हुए आदित्य के वार्ड की तरफ भाग गई, अपने उस जीवनसाथी को गले लगाने के लिए, जिसे किस्मत ने मौत के मुंह से वापस उसकी झोली में डाल दिया था। आज उसे यकीन हो गया था कि जब इंसान के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब ऊपर वाले का दरवाजा जरूर खुलता है।

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