पिताजी की आवाज रुंध गई थी। उन्होंने आगे कहा, “जब मैं विमला की भेजी हुई इस साधारण सी सूती राखी को अपनी कलाई पर बांधता हूं, तो मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी छोटी बहन ने अपना सारा दर्द, अपना सारा संघर्ष इस धागे में पिरोकर मुझे भेज दिया है। यह राखी मुझे याद दिलाती है कि मेरी बहन कितनी तकलीफ में है और फिर भी मुझसे कितना प्यार करती है।
हर साल अगस्त का महीना आते ही घर में एक अलग सी ही रौनक छा जाती थी। सावन की फुहारों के साथ-साथ मेरे मन में भी रक्षाबंधन के त्योहार की खुशियां हिलोरें मारने लगती थीं। मेरे लिए रक्षाबंधन का मतलब सिर्फ कलाई पर राखी बंधवाना नहीं था, बल्कि दूर-दराज के शहरों से आने वाले उन बड़े-बड़े पार्सलों का बेसब्री से इंतजार करना था। मेरे पिताजी, श्रीकांत जी की चार बहनें थीं। तीन बुआ तो बड़े शहरों में ब्याही थीं, लेकिन मुझे सबसे ज्यादा इंतजार दिल्ली वाली सुनीता बुआ, मुंबई वाली सरिता बुआ और चंडीगढ़ वाली कविता बुआ के कोरियर का रहता था।
त्योहार से एक हफ्ते पहले ही डाकिया या कोरियर वाले भइया हमारे घर के चक्कर काटने लगते थे। सुनीता बुआ दिल्ली से थीं, उनके पार्सल में मेरे लिए महंगे रिमोट कंट्रोल वाले खिलौने, ब्रांडेड कपड़े और विदेश से मंगवाई गई खास तरह की चॉकलेट्स होती थीं। मुंबई वाली सरिता बुआ भी पीछे नहीं रहती थीं; उनके पैकेट में पिताजी के लिए किसी नामी कंपनी की रेशमी शर्ट, मां के लिए कांजीवरम या सिल्क की साड़ी और मेरे लिए वीडियो गेम्स होते थे। चंडीगढ़ वाली कविता बुआ भी सूखे मेवों के बड़े-बड़े डिब्बे और शानदार राखियां भेजती थीं, जिन पर सुनहरे और रुपहले नग जड़े होते थे। मां बड़े जतन से उन सभी पैकेटों को खोलतीं और सारा सामान डाइनिंग टेबल पर सजा देती थीं, ताकि पिताजी ऑफिस से लौटकर अपनी बहनों के प्यार को देख सकें।
मैं उन बड़े-बड़े डिब्बों को देखकर फूला नहीं समाता था। लेकिन उन चमचमाते और भारी-भरकम पैकेटों के बीच हर साल एक बेहद साधारण सा, भूरे रंग का लिफाफा भी आता था। यह लिफाफा मेरी सबसे छोटी बुआ, विमला बुआ का होता था, जो कानपुर के एक छोटे से कस्बे में रहती थीं। विमला बुआ के लिफाफे में कभी कोई बड़ा गिफ्ट नहीं होता था। उसमें बस एक सादे से कागज में लिपटी हुई चार सूती धागे वाली राखियां, थोड़ी सी रोली, चावल के कुछ दाने और मेरे लिए आशीर्वाद के रूप में एक मुड़ा-तुड़ा बीस रुपये का नोट होता था। बचपन की नासमझी में मुझे विमला बुआ की वह राखी बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। मैं सोचता था कि बाकी बुआ कितने अच्छे गिफ्ट भेजती हैं, पर विमला बुआ कभी मेरे लिए कोई खिलौना क्यों नहीं भेजतीं।
उस दिन भी रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले शाम का वक्त था। मां ने डाइनिंग टेबल पर सुनीता, सरिता और कविता बुआ के भेजे हुए सारे महंगे उपहार सजा कर रख दिए थे। पास ही एक कोने में विमला बुआ का वह भूरा लिफाफा भी रखा हुआ था। शाम को करीब सात बजे पिताजी अपने बैंक से थके-हारे घर लौटे। उनके माथे पर थकान की लकीरें थीं। रोज की तरह उन्होंने अपना चश्मा और ऑफिस का बैग मेज पर रखा और सोफे पर आकर लेट गए।
मां ने उनके लिए रसोई से चाय लाते हुए कहा, “सुनिए, आपकी चारों बहनों की राखियां आ गई हैं। मैंने टेबल पर रख दी हैं, जरा देख लीजिए। दिल्ली और मुंबई वाली दीदी ने इस बार भी बहुत सारा सामान भेजा है।”
पिताजी ने चाय का कप हाथ में लिया, डाइनिंग टेबल की तरफ एक उड़ती हुई नजर डाली, लेकिन उन महंगे कपड़ों, चॉकलेट्स और चमकती राखियों ने उनका ध्यान नहीं खींचा। उन्होंने चाय का कप मेज पर रखते हुए तुरंत पूछा, “विमला का लिफाफा कहां है? जरा वो मुझे देना।”
यह हर साल का नियम था। पिताजी को उन बड़े पार्सलों से ज्यादा विमला बुआ के उस साधारण से लिफाफे का इंतजार रहता था। रक्षाबंधन के दिन भी, पिताजी सबसे पहले विमला बुआ की ही भेजी हुई सूती राखी अपनी कलाई पर बंधवाते थे, उसके बाद ही बाकी बहनों की राखियों का नंबर आता था।
मां ने बिना कुछ कहे चुपचाप वह भूरा लिफाफा पिताजी के हाथों में थमा दिया। पिताजी ने बड़ी सावधानी से, जैसे कोई बहुत कीमती खजाना खोल रहे हों, उस लिफाफे को खोला। उसमें से वही पुरानी जैसी सूती राखियां और एक बीस रुपये का नोट निकला। उस बीस रुपये के नोट को देखकर पिताजी की आंखें भर आईं। उन्होंने उस नोट को अपने माथे से लगाया और गहरी सांस लेते हुए सोफे पर पीछे की तरफ टिक गए।
बचपन में मैं इस बात को नहीं समझ पाता था, लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मुझे पिताजी के इस व्यवहार का असली कारण समझ में आया। विमला बुआ, पिताजी की चारों बहनों में सबसे छोटी थीं और पूरे घर की लाडली थीं। दादा-दादी और पिताजी ने उन्हें बहुत नाजों से पाला था। विमला बुआ पढ़ाई में भी बहुत तेज थीं और स्वभाव से बहुत ही चुलबुली थीं। जब उनकी शादी तय हुई, तो परिवार वालों ने कानपुर के एक बहुत बड़े व्यापारी परिवार को चुना था। पिताजी ने अपनी हैसियत से बढ़कर विमला बुआ की शादी में दान-दहेज दिया था। लगा था कि घर की सबसे छोटी और लाडली बेटी अब जीवन भर रानी बनकर राज करेगी।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। शादी के कुछ सालों बाद ही विमला बुआ की जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया जिसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। बुआ के देवर ने धोखे से पुश्तैनी व्यापार और घर अपने नाम करवा लिया और बुआ-फूफाजी को घर से बाहर निकाल दिया। इस गहरे सदमे ने फूफाजी को अंदर से तोड़ दिया। वह डिप्रेशन में चले गए और धीरे-धीरे उनकी मानसिक और शारीरिक हालत इतनी खराब हो गई कि वह कोई भी काम करने लायक नहीं रहे। रातों-रात महलों में रहने वाली विमला बुआ सड़क पर आ गईं।
पिताजी ने बहुत कोशिश की कि वह बुआ को अपने साथ ले आएं या उनकी आर्थिक मदद करें। लेकिन विमला बुआ जितनी कोमल दिखती थीं, अंदर से उतनी ही स्वाभिमानी थीं। उन्होंने अपने भाई पर बोझ बनने से साफ इंकार कर दिया। बुआ ने एक छोटी सी सिलाई की दुकान खोल ली और उसी की आमदनी से अपने बीमार पति का इलाज कराने लगीं और अपने इकलौते बेटे, आयुष को पढ़ाने लगीं। आयुष को उन्होंने बहुत मुश्किल से एक साधारण से सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाया था। बुआ का जीवन एक अंतहीन संघर्ष बन चुका था, जिसमें वह अकेले ही परिस्थितियों से लड़ रही थीं। दिन-रात मशीन चलाकर जो थोड़े-बहुत पैसे वह बचा पाती थीं, उसी में से वह हर साल अपने भाई के लिए राखियां और मेरे लिए आशीर्वाद का वह बीस रुपये का नोट भेजती थीं।
उस रात पिताजी काफी देर तक उस बीस रुपये के नोट को हाथ में लिए बैठे रहे। मैं उनके पास जाकर बैठ गया और पूछा, “पापा, आप हर साल सबसे पहले विमला बुआ की राखी क्यों बांधते हैं? बाकी बुआ तो कितनी सुंदर राखियां भेजती हैं।”
पिताजी ने मुझे अपने पास बिठाया, मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “बेटा, राखियों की कीमत बाजार में नहीं, भेजने वाले के दिल में तय होती है। तुम्हारी दिल्ली और मुंबई वाली बुआ बहुत अमीर हैं। उनके लिए ये महंगे गिफ्ट भेजना बहुत आसान है, उनके लिए ये सिर्फ पैसों की बात है। लेकिन तुम्हारी विमला बुआ… वो दिन-रात मेहनत करती है, एक-एक रुपया जोड़ती है। वह बीस रुपये का नोट जो तुम्हें मामूली लगता है, वह उसकी कई रातों की नींद और उसकी आंखों का पानी है। वह भूखे पेट सो सकती है, लेकिन अपने भाई को राखी और अपने भतीजे को शगुन भेजना कभी नहीं भूलती।”
पिताजी की आवाज रुंध गई थी। उन्होंने आगे कहा, “जब मैं विमला की भेजी हुई इस साधारण सी सूती राखी को अपनी कलाई पर बांधता हूं, तो मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी छोटी बहन ने अपना सारा दर्द, अपना सारा संघर्ष इस धागे में पिरोकर मुझे भेज दिया है। यह राखी मुझे याद दिलाती है कि मेरी बहन कितनी तकलीफ में है और फिर भी मुझसे कितना प्यार करती है। दुनिया के सबसे महंगे रेशम में वो ताकत नहीं, जो इस कच्चे सूत के धागे में है।”
उस दिन मुझे जीवन की एक बहुत बड़ी सीख मिली। मैंने महसूस किया कि डाइनिंग टेबल पर रखे उन चमचमाते गिफ्ट्स की चमक, विमला बुआ के उस साधारण से भूरे लिफाफे के सामने बिल्कुल फीकी थी। उस दिन के बाद से, मुझे भी कभी दिल्ली या मुंबई वाले पार्सलों का इंतजार नहीं रहा। हर रक्षाबंधन पर, मेरी आंखें भी दरवाजे पर बस उस भूरे लिफाफे को तलाशने लगीं। मुझे समझ आ गया था कि रिश्ते पैसों से नहीं, भावनाओं से सींचे जाते हैं। आज विमला बुआ का बेटा आयुष भी पढ़-लिखकर एक अच्छी नौकरी कर रहा है और बुआ के दिन फिर गए हैं, लेकिन आज भी जब उनकी राखी आती है, तो उस लिफाफे के अंदर रखे उस बीस रुपये के नोट की अहमियत हमारे परिवार में लाखों रुपये से ज्यादा होती है।
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