सुशीला बहन, तुम्हारी नजर में कोई ऐसी सीधी-सादी और घरेलू लड़की है क्या, जो मेरे सुमित को संभाल सके? हम दहेज में एक पैसा नहीं मांगेंगे, बस लड़की हमारे बेटे को सुधार दे।”
सुशीला तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए चहक उठी, “अरे मेरे मायके के पड़ोस में एक बहुत ही गरीब लेकिन संस्कारी परिवार है। उनकी बेटी है अंजलि। बिल्कुल गाय जैसी सीधी है। रंग-रूप भी अच्छा है। गरीब बाप है तो वो लोग ज्यादा पूछताछ भी नहीं करेंगे।
रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। शहर के एक शांत मोहल्ले में स्थित रामदीन जी के घर के बाहर अचानक एक ऑटो आकर रुका। ऑटो से उनका बड़ा बेटा विक्रम उतरा और उसने ऑटो वाले की मदद से अपने छोटे भाई सुमित को बाहर निकाला। सुमित की हालत बेहद खराब थी। उसके कपड़े जगह-जगह से फटे हुए थे, चेहरे पर चोट के ताजे निशान थे और उसके मुंह से शराब और सिगरेट की तेज बदबू आ रही थी। वह ठीक से अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। विक्रम के चेहरे पर थकान और गहरी निराशा के भाव थे। वह किसी तरह सुमित को सहारा देकर घर के अंदर ले गया।
दरवाजे की आहट सुनते ही रामदीन जी और उनकी पत्नी कौशल्या दौड़कर बाहर आए। अपने लाडले बेटे की यह दुर्दशा देखकर कौशल्या की चीख निकल गई। “अरे मेरे राम! क्या हो गया मेरे बच्चे को? विक्रम, किसने किया मेरे सुमित का ये हाल?” कौशल्या रोते हुए सुमित के चेहरे को चूमने लगीं।
विक्रम ने सुमित को सोफे पर पटकते हुए गहरी सांस ली और कठोर स्वर में बोला, “माँ, इसे किसी और ने नहीं, इसके अपने कर्मों ने मारा है। शहर के जुआरियों से उधार लेकर जुआ खेलता है आपका ये लाडला। आज पैसे नहीं चुका पाया तो उन गुंडों ने इसे सड़क किनारे पीटा है। अगर मुझे समय पर इसके एक दोस्त का फोन नहीं आता, तो आज ये शायद जिंदा भी नहीं बचता।”
रामदीन जी ने गुस्से में अपना माथा पीट लिया। “हे भगवान! किस जनम का बदला ले रहा है ये लड़का हमसे। रोज-रोज का यही नाटक है। कभी शराब पीकर मोहल्ले में तमाशा करता है, तो कभी जुए में घर का सामान हार आता है। मेरी तो नाक कटवा दी है इसने पूरे समाज में।”
रात का हंगामा सुनकर पड़ोस की दो महिलाएं, सुशीला और प्रभावती, जो रामदीन जी के परिवार के काफी करीब थीं, अगले दिन सुबह-सुबह उनके घर आ धमकीं। साथ में विक्रम की बुआ, सरला जी भी आ गईं, जिन्हें रात की घटना की भनक लग चुकी थी। बैठक में एक अजीब सा मातम पसरा हुआ था। सुमित अंदर अपने कमरे में बेहोश पड़ा था और बाहर कौशल्या आँसू बहा रही थीं।
सरला बुआ ने कौशल्या के कंधे पर हाथ रखते हुए सांत्वना के स्वर में कहा, “अरे भाभी, तुम इतना दिल क्यों छोटा कर रही हो? लड़के हैं, जवानी की दहलीज पर कदम रखते हैं तो थोड़ी बहुत हवा लग ही जाती है। मेरा भतीजा कोई पैदाइशी खराब थोड़ी है, बस संगत का असर है।”
सुशीला ने बुआ की बात में हामी भरते हुए अपना ज्ञान बघारना शुरू किया, “बिल्कुल सही कह रही हैं सरला जी। अरे रामदीन भाई साहब, आप लोग ख्वामख्वाह इतना परेशान हो रहे हैं। इस उम्र के लड़कों का दिमाग ऐसे ही भटकता है। इसका एक ही पक्का और रामबाण इलाज है… इसकी शादी कर दो!”
प्रभावती ने भी तुरंत सुर में सुर मिलाया, “हाँ-हाँ, और नहीं तो क्या! जैसे ही इसके गले में गृहस्थी की चक्की पड़ेगी, घोड़े की तरह सीधा चलने लगेगा। जब बीवी घर में आएगी, जिम्मेदारी का अहसास होगा, तो ये जुआ-शराब सब अपने आप छूट जाएगा। मैंने तो अपने देवर के बेटे को भी ऐसे ही सुधरते देखा है। एक संस्कारी सी लड़की लाओ, जो इसे अपने प्यार से बांध कर रखे। सब ठीक हो जाएगा।”
कौशल्या की आँखों में एक उम्मीद की किरण जाग उठी। एक माँ का स्वार्थ जाग गया था। उन्होंने तुरंत कहा, “क्या सच में ऐसा हो सकता है? सुशीला बहन, तुम्हारी नजर में कोई ऐसी सीधी-सादी और घरेलू लड़की है क्या, जो मेरे सुमित को संभाल सके? हम दहेज में एक पैसा नहीं मांगेंगे, बस लड़की हमारे बेटे को सुधार दे।”
सुशीला तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए चहक उठी, “अरे मेरे मायके के पड़ोस में एक बहुत ही गरीब लेकिन संस्कारी परिवार है। उनकी बेटी है अंजलि। बिल्कुल गाय जैसी सीधी है। रंग-रूप भी अच्छा है। गरीब बाप है तो वो लोग ज्यादा पूछताछ भी नहीं करेंगे। आप कहो तो मैं आज ही बात चलाऊं? बस उन्हें सुमित की इन छोटी-मोटी आदतों के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। कह देंगे कि लड़का अपना कुछ काम-धंधा देखता है।”
सरला बुआ ने भी ताली बजाते हुए कहा, “लो, हो गया काम! भाभी, तुम बस अब शादी की तैयारी करो। देखना, बहू के कदम पड़ते ही सुमित कैसे सुधरता है।”
यह सब बातचीत बैठक में चल रही थी और विक्रम, जो अपने ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर कमरे से निकल रहा था, दरवाजे के पीछे खड़ा सब कुछ सुन रहा था। जब उससे और नहीं रहा गया, तो वह तेज कदमों से बैठक में आकर खड़ा हो गया। उसकी आँखों में एक दहकता हुआ गुस्सा था। विक्रम यूं तो हमेशा बड़ों का लिहाज करता था और उनके बीच कम ही बोलता था, लेकिन आज का मुद्दा उसकी बर्दाश्त से बाहर था।
“वाह! क्या शानदार योजना बनाई है आप लोगों ने,” विक्रम की आवाज में एक गहरा तंज था। उसकी आवाज सुनकर बैठक में अचानक सन्नाटा छा गया। सब उसे हैरानी से देखने लगे।
विक्रम ने अपनी बुआ और दोनों पड़ोसनों की तरफ देखते हुए कहा, “बुआ जी, सुशीला आंटी, आप लोगों को ये सब बोलते हुए जरा भी शर्म नहीं आई? आप लोग औरत होकर एक दूसरी औरत की जिंदगी बर्बाद करने की साजिश रच रही हैं? सुमित एक शराबी, जुआरी और गैर-जिम्मेदार इंसान है। वो एक नंबर का बिगड़ा हुआ लड़का है, और आप लोग उसका इलाज एक मासूम लड़की की जिंदगी दांव पर लगाकर करना चाहती हैं?”
सरला बुआ ने थोड़ा नाराज होते हुए कहा, “अरे विक्रम, तू ये कैसी बातें कर रहा है? हम तो तेरे भाई का ही भला सोच रहे हैं। इसमें साजिश कैसी? शादी के बाद बड़े-बड़े बिगड़ैल सुधर जाते हैं। घर-गृहस्थी का बोझ पड़ता है तो आदमी अपने आप लाइन पर आ जाता है।”
विक्रम ने बुआ की आँखों में सीधे देखते हुए पूछा, “अच्छा बुआ जी? अगर शादी ही हर बिगड़े हुए लड़के का सुधारगृह है, तो क्या आप अपनी बेटी शिखा की शादी सुमित जैसे लड़के से करेंगी? बोलिए! आप जानती हैं कि लड़का जुआ खेलता है, मार खाता है, शराब पीकर गालियां देता है। क्या आप शिखा का हाथ ऐसे इंसान के हाथ में सौंपेंगी इस उम्मीद में कि वो शादी के बाद सुधर जाएगा?”
सरला बुआ का चेहरा फक्क पड़ गया। वो हकलाते हुए बोलीं, “य..ये तू कैसी बात कर रहा है विक्रम? सुमित तो मेरे भतीजे जैसा है, लेकिन शिखा… शिखा तो मेरी फूल जैसी बच्ची है। मैं उसे किसी ऐसे-वैसे घर में कैसे दे सकती हूँ? मैं तो अपनी बच्ची के लिए कोई पढ़ा-लिखा और समझदार लड़का ही ढूँढूंगी ना।”
विक्रम ने एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा, “यही तो बात है बुआ जी! अपनी बेटी के लिए आपको एक आदर्श, समझदार और संस्कारी लड़का चाहिए। लेकिन किसी दूसरे की बेटी के लिए, उस गरीब अंजलि के लिए, आपको सुमित जैसा शराबी और जुआरी लड़का मंजूर है? क्यों? क्योंकि वो गरीब है? क्योंकि वो दूसरे की बेटी है? क्या अंजलि के माता-पिता ने उसे प्यार से नहीं पाला होगा? क्या उसके सीने में दिल नहीं है?”
सुशीला ने बीच में बचाव करते हुए कहा, “बेटा विक्रम, तू बात का बतंगड़ बना रहा है। हम लड़के वालों को थोड़ी बहुत बातें छुपानी ही पड़ती हैं। और फिर, औरत का तो काम ही होता है अपने पति को सुधारना, घर को स्वर्ग बनाना।”
विक्रम का गुस्सा अब फूट पड़ा। “सुशीला आंटी, औरत कोई रिहैब सेंटर (सुधारगृह) है क्या? या कोई जादूगरनी है जो छड़ी घुमाएगी और एक शराबी इंसान रातों-रात राम बन जाएगा? और झूठ बोलकर शादी करना तो बहुत बड़ा धोखा है। जब कल को अंजलि को सच्चाई पता चलेगी, जब सुमित शराब पीकर उसे पीटेगा, या घर के जेवर जुए में हार जाएगा, तब क्या आप लोग अंजलि के आँसू पोंछने जाएंगे? नहीं! तब आप ही लोग कहेंगे कि ‘अब तो शादी हो गई, निभाना तो पड़ेगा, औरत को थोड़ा समझौता करना ही पड़ता है’।”
विक्रम अपने माता-पिता की तरफ मुड़ा। उसकी आँखों में निराशा और दर्द था। “माँ, पिताजी, आप लोग कैसे इस पाप के लिए राजी हो गए? क्या सुमित की गलतियों की सजा उस अनजान अंजलि को मिलनी चाहिए? शादी दो लोगों का पवित्र रिश्ता है, ये कोई अस्पताल नहीं है जहाँ आप अपने बीमार बेटे का इलाज किसी लड़की की खुशियों की बलि चढ़ाकर करें। अगर सुमित को सुधारना ही है, तो उसे उसकी गलतियों का अहसास दिलाइए। उसे धक्के खाने दीजिए, उसे खुद मेहनत करके अपना कर्ज चुकाने दीजिए। उसे किसी नशा मुक्ति केंद्र में डालिए। लेकिन मैं अपने घर में किसी भी लड़की की जिंदगी इस तरह नर्क नहीं बनने दूंगा।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया था। विक्रम की एक-एक बात जैसे तीर की तरह सबको चुभ रही थी, लेकिन कोई भी उसकी बातों को काट नहीं सकता था क्योंकि वह सौ फीसदी सच बोल रहा था।
कौशल्या की आँखों से अब पश्चाताप के आँसू बहने लगे थे। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया था कि अपने बेटे के मोह में वह कितनी स्वार्थी हो गई थीं। उन्होंने विक्रम का हाथ पकड़ते हुए रोते हुए कहा, “तू सही कह रहा है बेटा। मुझे माफ कर दे। मैं एक माँ होने के नाते अंधी हो गई थी। मुझे लगा कि शायद शादी से मेरा सुमित सुधर जाएगा, लेकिन मैंने उस गरीब लड़की के बारे में एक पल के लिए भी नहीं सोचा। मैं नहीं चाहूंगी कि जो दर्द हम आज सह रहे हैं, वो कल को कोई दूसरी माँ अपनी बेटी के लिए सहे।”
रामदीन जी ने भी भारी मन से कहा, “विक्रम बिल्कुल ठीक कह रहा है। आज से सुमित का सारा खर्च बंद। जब तक वो खुद कमाकर अपने जुए का कर्ज नहीं उतारता और अपनी शराब की लत नहीं छोड़ता, इस घर में उसकी शादी की कोई बात नहीं होगी। मैं आज ही डॉक्टर से बात करके उसे नशा मुक्ति केंद्र भेजने का इंतजाम करता हूँ।”
सरला बुआ और दोनों पड़ोसनों ने शर्म से सिर झुका लिया था। उन्हें समझ आ गया था कि उनकी दकियानूसी सोच समाज के लिए कितनी खतरनाक थी। विक्रम ने समाज की उस कड़वी सच्चाई का पर्दाफाश कर दिया था जिसे लोग सदियों से ‘परंपरा’ या ‘समझौते’ का नाम देकर छुपाते आ रहे थे।
दोस्तों, हमारे समाज में आज भी कई लोग यही सोचते हैं कि लड़के की शादी करवा दो, शादी के बाद जिम्मेदारी आएगी तो वह अपने आप सुधर जाएगा। इस सोच के चक्कर में न जाने कितनी लड़कियों की जिंदगी, उनके सपने और उनका भविष्य एक अंधे कुएं में धकेल दिया जाता है। किसी भी इंसान को सुधारने की जिम्मेदारी किसी दूसरी मासूम लड़की पर डालना सरासर अन्याय है। विवाह एक साझेदारी है, न कि कोई सुधारगृह। अगर कोई लड़का गलत रास्ते पर है, तो उसे सही रास्ते पर लाने की जिम्मेदारी उसके परिवार की है, न कि किसी पराई बेटी की।
आशा है कि आपको इस कहानी का वास्तविक और गहरा अर्थ समझ आ गया होगा।
क्या आपको लगता है कि समाज की यह धारणा आज भी प्रासंगिक है? क्या आपने भी कभी अपने आस-पास ऐसी घटना होते देखी है जहाँ किसी लड़की की जिंदगी सिर्फ लड़के को सुधारने के लिए दांव पर लगा दी गई हो? कहानी पढ़ने के बाद अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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