झूठे रुतबे की बुनियाद

और फिर एक रात वह हुआ जिसने दोनों परिवारों की बची-खुची इज्जत को भी खाक में मिला दिया। विक्रम उस रात बहुत ज्यादा शराब पीकर घर आया था। किसी बिजनेस डील में उसे भारी नुकसान हुआ था और उसका सारा गुस्सा काव्या पर फूट पड़ा। काव्या भी उस वक्त अपने किसी दोस्त के साथ वीडियो कॉल पर हंस-हंस कर बातें कर रही थी। विक्रम ने उसका फोन छीनकर दीवार पर दे मारा। इसके बाद दोनों के बीच जो हाथापाई शुरू हुई, उसने भयानक रूप ले लिया।

शहर के सबसे महंगे और आलीशान फाइव स्टार होटल में आज चारों तरफ रोशनी की चकाचौंध थी। महंगी गाड़ियों की कतारें, विदेशी फूलों से सजा भव्य मंडप और मेहमानों के रेशमी लिबासों की चमक बता रही थी कि आज शहर के दो सबसे रसूखदार परिवारों का मिलन हो रहा है। जाने-माने उद्योगपति सेठ हरिकिशन बजाज के इकलौते बेटे विक्रम की शादी, शहर के सबसे बड़े बिल्डर राजनाथ सिंघानिया की इकलौती बेटी काव्या से हो रही थी। हर कोई इस जोड़े को देखकर वाह-वाह कर रहा था। स्टेज पर बैठे विक्रम और काव्या किसी फिल्मी सितारे से कम नहीं लग रहे थे। विक्रम ने विदेश से एमबीए किया था और काव्या एक मशहूर फैशन डिजाइनर थी। इस पूरे आयोजन में अगर कोई सबसे ज्यादा खुश था, तो वे थे शहर के पुराने और नामी रिश्ते करवाने वाले मध्यस्थ, पंडित दीनदयाल। उन्होंने ही इन दोनों परिवारों को मिलवाया था और आज उनकी खूब खातिरदारी हो रही थी। हरिकिशन बजाज ने तो पंडित जी को सोने की चेन भी उपहार में दी थी क्योंकि उन्हें वैसी ही बहू मिली थी, जैसी उन्होंने मांगी थी।

शादी के कुछ महीनों तक सब कुछ किसी खूबसूरत सपने जैसा चला। हनीमून की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाई रहीं, महंगे रेस्टोरेंट में डिनर और पार्टियों का सिलसिला चलता रहा। लेकिन जैसे ही चकाचौंध का यह पर्दा हटा, असलियत की खुरदरी दीवारें सामने आने लगीं। विक्रम और काव्या, दोनों ही बेहद जिद्दी और अपने-अपने अहंकार में चूर थे। विक्रम को लगता था कि वह एक बहुत बड़ा बिजनेसमैन है और पूरी दुनिया उसके इशारों पर नाचनी चाहिए। वह अक्सर शराब के नशे में धुत होकर देर रात घर लौटता। जब काव्या इस बात का विरोध करती, तो वह उसे उसकी हैसियत याद दिलाने लगता। दूसरी ओर, काव्या भी कोई आम लड़की नहीं थी जो खामोश रह जाती। उसे घर-परिवार, सास-ससुर या रिश्तों की कोई परवाह नहीं थी। सुबह ग्यारह बजे सोकर उठना, सारा दिन अपने दोस्तों के साथ फोन पर गपशप करना, किटी पार्टियों में पैसे उड़ाना और घर के नौकरों पर हुक्म चलाना ही उसकी दिनचर्या थी। सास-ससुर के बीमार होने पर उन्हें डॉक्टर के पास ले जाना तो दूर, वह उनके कमरे में झांकना भी अपनी शान के खिलाफ समझती थी।

धीरे-धीरे घर का माहौल नर्क बनने लगा। जिस बेडरूम को गुलाब के फूलों से सजाया गया था, वहां अब गालियों और टूटे हुए शीशों की आवाजें गूंजने लगीं। विक्रम का गुस्सा इस कदर बढ़ गया था कि वह अक्सर नशे की हालत में काव्या पर हाथ उठाने लगा था। वह उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता, उसके मायके वालों को नीचा दिखाता और उसे एक ‘खरीदी हुई ट्रॉफी’ से ज्यादा कुछ नहीं समझता। काव्या ने भी हार नहीं मानी। उसने अपने पति के इस व्यवहार का बदला अपनी आज़ादी से लेना शुरू किया। विक्रम के घर से निकलते ही वह अपने पुराने पुरुष मित्रों को घर बुला लेती या उनके साथ लंबी लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाती। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वह अब बजाज खानदान की बहू है। दोनों एक ही छत के नीचे रहते थे, लेकिन उनके बीच मीलों की दूरियां थीं। दोनों के दिलों में एक-दूसरे के लिए सिर्फ नफरत और जहर भरा था।

इन दोनों के माता-पिता ने जब यह सब देखा, तो बजाय अपने बच्चों को समझाने और उन्हें सही रास्ता दिखाने के, वे अपनी-अपनी झूठी शान को बचाने में लग गए। बजाज परिवार कहता कि उनकी बहू में कोई संस्कार नहीं हैं, वह तो बस पैसे उड़ाने की मशीन है। वहीं सिंघानिया परिवार का कहना था कि विक्रम एक शराबी और अय्याश इंसान है जो उनकी फूल सी बच्ची पर जुल्म कर रहा है। दोनों परिवारों का अहंकार इतना बड़ा था कि किसी ने भी झुककर रिश्ते को सुधारने की कोशिश नहीं की।

और फिर एक रात वह हुआ जिसने दोनों परिवारों की बची-खुची इज्जत को भी खाक में मिला दिया। विक्रम उस रात बहुत ज्यादा शराब पीकर घर आया था। किसी बिजनेस डील में उसे भारी नुकसान हुआ था और उसका सारा गुस्सा काव्या पर फूट पड़ा। काव्या भी उस वक्त अपने किसी दोस्त के साथ वीडियो कॉल पर हंस-हंस कर बातें कर रही थी। विक्रम ने उसका फोन छीनकर दीवार पर दे मारा। इसके बाद दोनों के बीच जो हाथापाई शुरू हुई, उसने भयानक रूप ले लिया। गालियों और चीख-पुकार के बीच, विक्रम ने काव्या को बुरी तरह पीटा। काव्या का अहंकार भी चरम पर था। शारीरिक पीड़ा और अपने घमंड के टूट जाने की हताशा में, उसने अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। गुस्से, नफरत और विक्रम को फंसाने की सनक में उसने अलमारी में रखी नींद की दर्जनों गोलियां एक साथ निगल लीं।

सुबह जब दरवाजा तोड़ा गया, तो काव्या फर्श पर बेसुध पड़ी थी। आनन-फानन में उसे शहर के सबसे बड़े अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया। मामला पुलिस तक पहुंच गया। सिंघानिया परिवार ने विक्रम और उसके पूरे परिवार पर दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और हत्या के प्रयास का संगीन मुकदमा दर्ज करा दिया। चंद घंटों के भीतर पुलिस ने विक्रम को हथकड़ी पहनाकर गिरफ्तार कर लिया। जो मीडिया कल तक उनकी शादी की भव्यता के गुण गा रहा था, आज वही उनके परिवार की इज्जत की धज्जियां उड़ा रहा था।

मामला जब अदालत की दहलीज तक पहुंचा, तो कोर्ट के बाहर एक अलग ही तमाशा चल रहा था। दोनों परिवारों के लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे। गालियां, धमकियां और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी था। इसी बीच, अदालत द्वारा नियुक्त किए गए परिवार परामर्शदाता (फैमिली काउंसलर) और रिटायर्ड जज, श्रीमान माथुर ने दोनों परिवारों को एक बंद कमरे में बुलाया। जज साहब ने पुलिस को आदेश देकर उस मध्यस्थ, पंडित दीनदयाल को भी वहां बुलवा लिया था, जिसने यह रिश्ता तय करवाया था।

पंडित दीनदयाल डरे-सहमे कमरे में दाखिल हुए। काव्या के पिता राजनाथ सिंघानिया ने पंडित को देखते ही उसका कॉलर पकड़ लिया और दहाड़ते हुए बोले, “यही है वो धोखेबाज! इसी ने कहा था कि लड़का बहुत संस्कारी है, हीरा है! आज मेरी बेटी अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रही है और इसका ये ‘हीरा’ जेल की हवा खा रहा है। तुमने हमारे घर बर्बाद कर दिए पंडित!” विक्रम के पिता हरिकिशन ने भी पंडित पर अपना गुस्सा उतारते हुए कहा, “और तुमने कहा था कि लड़की बहुत गुणी है! घर को स्वर्ग बना देगी। उसने तो मेरे बेटे को ही जेल भिजवा दिया, कुलटा कहीं की!”

जज साहब ने दोनों को शांत रहने का कड़वा आदेश दिया। फिर उन्होंने अपनी गंभीर नजरें पंडित दीनदयाल पर गड़ाईं और पूछा, “पंडित जी, आप समाज के एक सम्मानित व्यक्ति हैं। आपने इतने वर्षों तक लोगों के घर बसाए हैं। फिर इस रिश्ते में इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? क्या आपको इन दोनों के स्वभाव के बारे में कुछ भी पता नहीं था? क्या आपको नहीं पता था कि आप दो परिवारों को नहीं, बल्कि दो टाइम-बमों को एक साथ जोड़ रहे हैं?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। पंडित दीनदयाल ने गहरी सांस ली, अपने कपड़े ठीक किए और हाथ जोड़कर जज साहब की ओर देखते हुए एक ऐसी बात कही, जिसने वहां मौजूद हर इंसान की रूह को झकझोर कर रख दिया।

“माफी चाहता हूँ जज साहब,” पंडित जी की आवाज में अब डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी पीड़ा थी। “लेकिन मैंने कोई रिश्ता नहीं करवाया था। मैंने तो बस एक ‘सौदा’ करवाया था, एक बिजनेस डील! और इस डील के ब्रोकर ये दोनों पिता थे, जो आज मुझ पर आरोप लगा रहे हैं।”

पंडित जी की बात सुनकर दोनों पिता आगबबूला हो गए, लेकिन जज साहब ने उन्हें खामोश रहने का इशारा किया और पंडित जी से अपनी बात पूरी करने को कहा।

पंडित जी ने हरिकिशन बजाज (लड़के के पिता) की तरफ देखते हुए कहा, “जज साहब, जब बजाज जी मेरे पास आए थे, तो इन्होंने मुझसे क्या कहा था, जरा इनसे पूछिए। इन्होंने कहा था, ‘पंडित जी, लड़के के लिए ऐसी लड़की ढूँढना जो शहर के सबसे अमीर घराने की हो। लड़की इकलौती हो तो और भी अच्छा, ताकि ससुर की सारी जायदाद मेरे बेटे को मिल सके। लड़की खूबसूरत होनी चाहिए ताकि सोसाइटी में हमारा रुतबा बढ़े। उसे घर का काम आए या न आए, कोई फर्क नहीं पड़ता, हमारे यहाँ नौकरों की फौज है।’ इन्होंने मुझसे एक बार भी नहीं कहा कि लड़की संस्कारी होनी चाहिए या उसमें बड़ों का आदर करने का गुण होना चाहिए।”

फिर पंडित जी राजनाथ सिंघानिया (लड़की के पिता) की तरफ मुड़े और बोले, “और सिंघानिया जी की मांगें तो इससे भी बड़ी थीं। इन्होंने मुझसे कहा था, ‘पंडित जी, लड़का ऐसा हो जिसका सालाना टर्नओवर करोड़ों में हो। लड़के के पास अपनी कोठी और लग्जरी गाड़ियां होनी चाहिए। अगर लड़का अपने माँ-बाप से अलग रहता हो, तो सबसे बढ़िया, क्योंकि मेरी बेटी किसी की रोक-टोक बर्दाश्त नहीं कर सकती।’ जज साहब, इन्होंने भी मुझसे कभी नहीं कहा कि लड़का चरित्रवान होना चाहिए, उसकी आदतें अच्छी होनी चाहिए, या वो मेरी बेटी को इज्जत दे सके।”

पंडित जी की आँखों में अब आँसू थे। उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “साहब, जब बाजार में जाकर आप सिर्फ चमक-दमक और ब्रांड देखकर कोई चीज खरीदते हैं, तो आप उसकी मजबूती की गारंटी कैसे मांग सकते हैं? इन दोनों परिवारों ने एक-दूसरे की दौलत, हैसियत और बाहरी खूबसूरती का सौदा किया था। लड़के वालों को एक ऐसी ट्रॉफी चाहिए थी जिसे वे अपनी अमीरी के शोकेस में सजा सकें, और लड़की वालों को एक ऐसा एटीएम मशीन चाहिए था जो उनकी बेटी के हर शौक को पूरा कर सके। मैंने तो बस वही किया जो इन्होंने मुझसे करने को कहा। मैंने एक अमीर शराबी की शादी, एक घमंडी और बेलगाम अमीरजादी से करवा दी। इसमें रिश्तेदारी कहाँ थी साहब? इसमें प्यार, त्याग, और समर्पण कहाँ था? कृपया इसे ‘रिश्ता’ कहकर, रिश्ते जैसे पवित्र शब्द को कलंकित न करें।”

कमरे में अब मौत सा सन्नाटा था। विक्रम और काव्या के माता-पिता की नजरें शर्म से झुकी हुई थीं। उनके पास पंडित जी की बातों का कोई जवाब नहीं था।

पंडित जी ने अपनी रुंधी हुई आवाज में आगे कहा, “अगर सच में इन्हें रिश्ता जोड़ना होता, तो बजाज जी मुझसे कहते, ‘पंडित जी, लड़की भले ही किसी साधारण परिवार से हो, मगर उसमें ऐसे संस्कार हों कि वह मेरे घर को अपना समझे। वह मेरे बेटे के सुख-दुःख की साथी बने। हमें दहेज की एक फूटी कौड़ी नहीं चाहिए, बस घर में एक लक्ष्मी चाहिए जो अपनी मुस्कान से घर को रोशन रखे।’ और सिंघानिया जी मुझसे कहते, ‘पंडित जी, लड़का भले ही साइकिल पर चलता हो, लेकिन वो मेहनती और ईमानदार हो। वो मेरी बेटी की आँखों में कभी आँसू न आने दे। उसे एक ऐसा परिवार मिले जहाँ उसे बेटी का प्यार मिले।’ अगर ये ऐसी बातें करते जज साहब, तो मैं पूरी दुनिया छान मारता इनके लिए एक असली रिश्ता ढूँढने में। लेकिन आज के दौर में रिश्ते कम और सौदे ज्यादा होते हैं। इन बच्चों की इस हालत के लिए जितने ये बच्चे जिम्मेदार हैं, उससे कहीं ज्यादा इनके ये माता-पिता और इनकी यह खोखली मानसिकता जिम्मेदार है।”

जज साहब गहरी सोच में पड़ गए। पंडित जी के एक-एक शब्द उनके भी दिल में तीर की तरह चुभ रहे थे। उन्हें अचानक अपना खुद का परिवार याद आ गया। उन्होंने भी तो अपने बच्चों को बेहतरीन स्कूल, महंगी गाड़ियां और हर आधुनिक सुख-सुविधा दी थी, लेकिन क्या वे उन्हें वह नैतिक शिक्षा और संस्कार दे पाए थे जो जीवन के कठिन समय में उन्हें टूटने से बचाते?

जज साहब ने एक लंबी सांस ली और दोनों पिताओं की तरफ देखते हुए कहा, “पंडित जी ने आज वो कड़वा सच बोला है, जिसे हम सभी पढ़े-लिखे और आधुनिक लोग स्वीकार करने से डरते हैं। आप लोगों ने अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के नाम पर उनका जीवन तबाह कर दिया है। अब अदालत जो भी फैसला सुनाएगी, वह कानूनी होगा। लेकिन असली सजा तो आप लोग हर दिन भुगतेंगे, जब अपनी बेटी को अस्पताल के बिस्तर पर बेजान देखेंगे और अपने बेटे को जेल की सलाखों के पीछे। काश! आपने दौलत की जगह इंसानियत को चुना होता।”

दोनों परिवार अब फूट-फूट कर रो रहे थे। उन्हें अपनी गलती का एहसास हो चुका था, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। समय का पहिया अब वापस नहीं घूम सकता था। लालच और झूठे रुतबे की बुनियाद पर खड़ा वह महल अब पूरी तरह से ढह चुका था, और उसके मलबे में दबकर दो जिंदगियां और दो परिवार हमेशा के लिए तबाह हो गए थे।

पाठकों से एक सवाल:

क्या आपको भी लगता है कि आज के समाज में शादियां दो दिलों का मिलन न होकर, सिर्फ बैंक बैलेंस और हैसियत का प्रदर्शन बनकर रह गई हैं? हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुख-सुविधाएं तो दे रहे हैं, लेकिन क्या हम उन्हें सही संस्कार दे पा रहे हैं? अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताएं!

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