ये कैसा बंधन – डॉ आभा माहेश्वरी
सुबह की पहली किरण खिड़की के पर्दों से छनकर कमरे में उतर रही थी। बाहर अमलतास के पीले फूल हवा के साथ झूम रहे थे। घर में सब कुछ वैसा ही था, जैसा पिछले कई वर्षों से था—वही आँगन, वही तुलसी का चौरा, वही बरामदे की पुरानी कुर्सी और दीवार पर टँगी एक तस्वीर। तस्वीर … Read more