ये कैसा बंधन – उमा वर्मा

आज सुबह सुबह खबर मिली कि तुम नहीं रहे ।यह तो होना ही था।कल  ही तो बेटे के साथ तुम्हे  देखने गयी थी ।बिस्तर पर पड़े असहाय सा मुझे देखते रहे तुम ।पलक भी नहीं झपका रहे थे ।न जाने क्या सोच रहे थे तुम ।पूरे शरीर पर मशीन लगी हुई थी ।डाक्टर ने तो … Read more

अटूट बंधन – संगीता श्रीवास्तव

‘कुछ नहीं कर पाएगा नालायक! जब भी पी टीएम में जाता हूं तो रिपोर्ट कार्ड देखकर मुंह लटकाए चला आता हूं। इस लड़के को तो शर्म नाम की कोई चीज ही नहीं !अब इन्हें बाइक चाहिए। जितनी मेरी तनख्वाह है ,उसी में ना अपनी गृहस्थी चलाऊंगा। तुम्हारे लिए चोरी- बाजारी तो नहीं करूंगा न! अरे … Read more

यह कैसा बंधन – लक्ष्मी कनोडिया ‘अनिका’

हवेली के आँगन में रखी वह पुरानी संदूकची पिछले पैंतीस वर्षों से बंद थी। उस पर जंग लगे पीतल का ताला था और ताले के ऊपर लाल रंग से किसी ने बहुत पहले लिख दिया था— “घर की मर्यादा।” नंदिनी ने बचपन से उस संदूकची को देखा था। घर की औरतों के लिए वह किसी … Read more

“ये कैसा बंधन” – कमलेश आहूजा

रमा के सामने वाले फ्लैट में सुबह से हलचल मची हुई थी। वह फ्लैट काफी समय से खाली पड़ा था। इस फ्लोर पर सिर्फ दो ही फ्लैट थे, इसलिए रमा बहुत खुश थी कि चलो, पड़ोसी आ जाने से उसका अकेलापन कुछ कम होगा। वह उत्सुक थी कि आखिर उसके नए पड़ोसी कौन हैं। उसने … Read more

ये कैसा बंधन – रेखा जैन

“मम्मी, आप ये ड्रेस ले लीजिए…” काव्या ने दुकान में रखी हल्के नीले रंग की खूबसूरत ड्रेस उठाकर अपनी सास रूपा की तरफ बढ़ा दी। रूपा ने ड्रेस को देखा और फिर अपनी बहू को प्यार भरी नजरों से देखते हुए बोलीं, “लेकिन बेटा, मैं तो सिर्फ साड़ी पहनती हूँ… ड्रेस नहीं।” “तो क्या हुआ … Read more

बंधन – खुशी

सिया और अमन की शादी को पांच साल हो गए थे।अमन एक आटोमोबाइल कंपनी में था।घर में माँ मनोरमा, पिता आदित्य और भाई रवि थे। सिया एक खुशमिजाज लड़की थी जिसने पूरे घर को अपना बना लिया। परन्तु शादी के पांच साल भी सिया की गोद नहीं भरी। डाक्टर कहते सब ठीक है ‌ पिछले … Read more

ये कैसा बंधन – सुदर्शन सचदेवा

“कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते, फिर भी वे उम्रभर साथ चलते हैं… और कुछ रिश्ते नाम के होकर भी मन से बहुत दूर होते हैं।” खिड़की के पास बैठी अनन्या बाहर हो रही बारिश को न जाने कितनी देर से देख रही थी। बारिश की हर बूँद जैसे उसके भीतर दबे किसी पुराने सवाल … Read more

ये कैसा बंधन – डॉ आभा माहेश्वरी

सुबह की पहली किरण खिड़की के पर्दों से छनकर कमरे में उतर रही थी। बाहर अमलतास के पीले फूल हवा के साथ झूम रहे थे। घर में सब कुछ वैसा ही था, जैसा पिछले कई वर्षों से था—वही आँगन, वही तुलसी का चौरा, वही बरामदे की पुरानी कुर्सी और दीवार पर टँगी एक तस्वीर। तस्वीर … Read more

यह कैसा बंधन – मधु वशिष्ठ

“देखो चाहे कुछ भी हो जाए, मुझसे कोई उम्मीद नहीं करना, इतना लंबा घूंघट मेरे से नहीं निकाला जाता| जाने यह कैसा बंधन है?    बाहर कुछ दिखता नहीं है, गर्मी बेहिसाब होती है| तुम्हें नहीं पता पिछली बार कितनी मुश्किलों से मैंने दिन काटे थे।” ट्रेन से उतरने के बाद टैक्सी में प्रिया का … Read more

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