यह कैसा बंधन – मधु वशिष्ठ

“देखो चाहे कुछ भी हो जाए, मुझसे कोई उम्मीद नहीं करना, इतना लंबा घूंघट मेरे से नहीं निकाला जाता| जाने यह कैसा बंधन है?    बाहर कुछ दिखता नहीं है, गर्मी बेहिसाब होती है| तुम्हें नहीं पता पिछली बार कितनी मुश्किलों से मैंने दिन काटे थे।” ट्रेन से उतरने के बाद टैक्सी में प्रिया का … Read more

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