सुमन के ये शब्द रिया के कानों में गूंजने लगे। अभी कल शाम ही तो उसने अपनी सास सुजाता जी से ठीक यही अल्फाज कहे थे। सुजाता जी ने तो सिर्फ सुई में धागा डालने को कहा था, बीमार भी नहीं थीं, फिर भी रिया ने उन्हें झिड़क दिया था। आज जब उसकी अपनी माँ तकलीफ में थीं, तो उसे सुमन का आराम करना ‘लापरवाही’ लग रहा था, लेकिन कल उसे अपना आराम करना ‘अधिकार’ लग रहा था।
रिया का गुस्सा पानी की तरह बह गया और उसकी जगह शर्मिंदगी ने ले ली। उसे सुमन का चेहरा आईने जैसा लगने लगा जिसमें उसे अपना ही अक्स दिख रहा था।
सुमन अभी भी कुछ बोल रही थी, लेकिन रिया ने उसे बीच में रोक दिया। उसकी आवाज अब धीमी और नरम थी, “सॉरी भाभी। मैं… मैं बस मम्मी को लेकर परेशान हो गई थी। आप जाइए, आराम कीजिए। मैं हूँ अभी यहाँ।”
“रिया, बेटा जरा सुई में धागा तो डाल दे। आँखें अब साथ नहीं देतीं और पूजा की चुनरी में थोड़ा सा टांका लगाना था,” सुजाता जी ने अपनी बहू रिया को आवाज लगाई जो अभी-अभी ऑफिस से लौटी थी।
रिया ने सोफे पर बैग पटकते हुए झुंझलाहट में कहा, “उफ्फ मम्मी जी! आप भी ना, जैसे ही मैं घुसती हूँ, काम बता देती हैं। सुबह से ऑफिस में फाइलों में सिर खपाकर आई हूँ, और यहाँ आते ही सुई-धागा? आप चश्मा लगाकर कोशिश कर लीजिए या फिर रहने दीजिए, मैं बाद में कभी देखूँगी। अभी मुझे चाय पीकर रेस्ट करना है।”
पास बैठे उसके पति, विवेक ने रिया को टोकना चाहा, “रिया, माँ बस छोटी सी मदद तो मांग रही थीं। दो सेकंड का काम है…”
“विवेक, प्लीज! तुम बीच में मत बोलो। तुम्हें नहीं पता दिन भर कितनी थकान होती है। घर आकर इंसान को थोड़ी शांति चाहिए होती है, न कि नई फरमाइशें,” रिया ने तमतमाते हुए कहा और अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।
सुजाता जी ने एक गहरी साँस ली, चश्मा ठीक किया और कांपते हाथों से खुद ही सुई में धागा डालने की कोशिश करने लगीं। विवेक ने उठकर माँ की मदद की, लेकिन घर के माहौल में एक अजीब सी खटास घुल गई थी। रिया अक्सर ऐसा ही करती थी। उसे अपनी सास की छोटी-छोटी बातें भी बोझ लगती थीं, जबकि सुजाता जी बहुत ही सरल स्वभाव की थीं।
अगले दिन सुबह रिया के फोन की घंटी बजी। उधर से उसकी छोटी बहन की घबराई हुई आवाज आई, “दीदी, जल्दी घर आ जाओ। मम्मी बाथरूम में फिसल गई हैं, उनके पैर में बहुत चोट आई है। डॉक्टर ने प्लास्टर बांधा है और उन्हें बेड रेस्ट के लिए कहा है।”
रिया के हाथ-पैर फूल गए। उसने तुरंत विवेक को बताया और ऑफिस से छुट्टी लेकर सीधे अपने मायके भागी।
वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि उसकी माँ, कमला जी, बिस्तर पर लेटी कराह रही थीं। पैर पर भारी प्लास्टर चढ़ा था। लेकिन जिस बात ने रिया का पारा चढ़ाया, वह यह थी कि पास की टेबल पर पानी का जग खाली पड़ा था और दवाइयाँ बिखरी हुई थीं।
रिया ने पानी भरा और माँ को दिया। फिर उसने गुस्से में आवाज लगाई, “भाभी! सुमन भाभी!”
सुमन, रिया के भाई की पत्नी, दूसरे कमरे से धीरे-धीरे बाहर आई। उसके हाथ में मोबाइल था और वह किसी से हँसकर बात कर रही थी।
“हाँ दीदी, क्या हुआ? कब आईं आप?” सुमन ने बेपरवाही से पूछा।
“भाभी, आपको दिख नहीं रहा कि मम्मी की हालत क्या है? उनका पानी का जग खाली पड़ा है, दवाइयाँ बिखरी हैं। और आप वहां फोन पर गप्पे लड़ा रही हैं? डॉक्टर ने उन्हें पूरा आराम बोला है, उनकी सेवा कौन करेगा?” रिया का गुस्सा फूट पड़ा।
सुमन के चेहरे का रंग बदल गया। उसने तीखे स्वर में जवाब दिया, “दीदी, सुबह से लगी हुई हूँ। नाश्ता बनाया, घर साफ किया, डॉक्टर के पास भी मैं ही लेकर गई थी। अब इंसान हूँ, रोबोट नहीं। मुझे भी तो थोड़ी देर आराम चाहिए या नहीं? अभी बस 10 मिनट के लिए बैठी थी कि आप शुरू हो गईं।”
“आराम?” रिया चिल्लाई। “मम्मी दर्द से कराह रही हैं और आपको आराम सूझ रहा है? बुढ़ापे में सास की सेवा करना बहू का फर्ज होता है। अगर आप इतनी सी जिम्मेदारी नहीं उठा सकतीं, तो फिर बहू किस बात की?”
तभी बिस्तर से कमला जी ने कराहते हुए कहा, “रिया… रहने दे बेटा। सुमन ने बहुत किया है। वो भी तो थक जाती है।”
“नहीं मम्मी, आप इसकी तरफदारी मत करो,” रिया ने कहा। “इसे समझना चाहिए कि आप इसकी जिम्मेदारी हैं। अगर कल को इसके साथ ऐसा हो तो…”
रिया बोलते-बोलते अचानक रुक गई। उसके शब्द उसके गले में अटक गए।
*इंसान हूँ, रोबोट नहीं… मुझे भी आराम चाहिए…*
सुमन के ये शब्द रिया के कानों में गूंजने लगे। अभी कल शाम ही तो उसने अपनी सास सुजाता जी से ठीक यही अल्फाज कहे थे। सुजाता जी ने तो सिर्फ सुई में धागा डालने को कहा था, बीमार भी नहीं थीं, फिर भी रिया ने उन्हें झिड़क दिया था। आज जब उसकी अपनी माँ तकलीफ में थीं, तो उसे सुमन का आराम करना ‘लापरवाही’ लग रहा था, लेकिन कल उसे अपना आराम करना ‘अधिकार’ लग रहा था।
रिया का गुस्सा पानी की तरह बह गया और उसकी जगह शर्मिंदगी ने ले ली। उसे सुमन का चेहरा आईने जैसा लगने लगा जिसमें उसे अपना ही अक्स दिख रहा था।
सुमन अभी भी कुछ बोल रही थी, लेकिन रिया ने उसे बीच में रोक दिया। उसकी आवाज अब धीमी और नरम थी, “सॉरी भाभी। मैं… मैं बस मम्मी को लेकर परेशान हो गई थी। आप जाइए, आराम कीजिए। मैं हूँ अभी यहाँ।”
शाम को जब रिया अपने ससुराल वापस लौटी, तो घर एकदम शांत था। सुजाता जी ड्राइंग रूम में टीवी देख रही थीं। रिया सीधे उनके पास गई और उनके पैरों के पास बैठ गई।
“मम्मी जी, आपके पैरों में दर्द था न? लाइए, मैं बाम लगा देती हूँ,” रिया ने कहा।
सुजाता जी चौंक गईं। “अरे नहीं बेटा, तुम थक कर आई होगी। रहने दे।”
“नहीं मम्मी जी,” रिया ने डिब्बी खोलते हुए कहा, “थकान तो मिट जाएगी, पर अगर मैंने आज यह नहीं किया, तो मेरी अंतरात्मा की थकान कभी नहीं मिटेगी। मैंने समझ लिया है कि दर्द अपनी माँ का हो या सास का, तकलीफ दोनों को बराबर होती है। और सेवा का हक भी दोनों का बराबर है।”
सुजाता जी ने स्नेह से बहू के सिर पर हाथ फेरा। रिया को आज समझ आ गया था कि रिश्ते सिर्फ खून के नहीं, एहसास के होते हैं। जो व्यवहार हम दूसरों से अपने माता-पिता के लिए चाहते हैं, वही व्यवहार हमें दूसरों के माता-पिता के साथ भी करना चाहिए।
लेखिका : सुजाता आहूजा