सुधीर जी ने खन्ना के कंधे पर हाथ रखा। “खन्ना, गलती हम पिता की ही होती है। हम अक्सर अपनी बेटियों के लिए ‘सुरक्षा’ ढूंढते हैं और हमें लगता है कि सुरक्षा सिर्फ पैसों में है। हम भूल जाते हैं कि एक लड़की को एसी कमरे और नौकर-चाकर से ज्यादा एक ऐसे साथी की ज़रूरत होती है
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शहर के सबसे पॉश इलाके के एक आलीशान बंगले के लॉन में आज शाम एक भव्य पार्टी चल रही थी। यह पार्टी थी शहर के मशहूर बिल्डर मिस्टर खन्ना की इकलौती बेटी, तान्या की सगाई की। चारों तरफ विदेशी फूलों की सजावट, झूमर की रोशनी और महंगे इत्र की खुशबू फैली हुई थी। मेहमानों की गाड़ियाँ बता रही थीं कि शहर का हर रसूखदार इंसान वहाँ मौजूद है।
मिस्टर खन्ना के बचपन के दोस्त, सुधीर जी, एक कोने में खड़े होकर जूस का गिलास हाथ में लिए यह सब देख रहे थे। सुधीर जी एक साधारण सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे और अपने असूलों के पक्के थे।
तभी मिस्टर खन्ना, अपनी मखमली शेरवानी संवारते हुए सुधीर के पास आए और गर्व से बोले, “देख रहे हो सुधीर? लड़का खानदानी रईस है। रूहान नाम है। पिता का रियल एस्टेट का कारोबार है, खुद का इंपोर्ट-एक्सपोर्ट का बिज़नेस है। मेरी तान्या रानी बनकर राज करेगी। मैंने तो पहले ही दिन लड़के वालों से कह दिया था, दहेज की चिंता मत करना, मेरी बेटी के साथ वो सब जाएगा जो एक राजकुमारी को शोभा देता है। बस लड़का ऐसा हो कि दुनिया देखे।”
सुधीर ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “खन्ना, लड़का क्या करता है और कितना कमाता है, यह तो दिख रहा है। पर लड़का ‘कैसा’ है, यह पता किया? उसके संस्कारों के बारे में, उसके व्यवहार के बारे में कुछ तसल्ली की?”
खन्ना जोर से हंसे, “अरे सुधीर, तुम अभी भी पुराने जमाने में जी रहे हो। आज के जमाने में ‘पैकेज’ देखा जाता है, संस्कार नहीं। बैंक बैलेंस मज़बूत हो तो संस्कार अपने आप अच्छे लगने लगते हैं। तान्या ने भी लड़के की फोटो और इंस्टाग्राम प्रोफाइल देख कर ही हाँ कर दी थी। दोनों ही मॉडर्न हैं, खुश रहेंगे।”
उसी महीने सुधीर जी ने भी अपनी बेटी, स्नेहा की शादी तय की। लड़का, जिसका नाम मयंक था, एक साधारण प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था। घर छोटा था, पिता स्कूल टीचर थे और माँ गृहणी।
जब खन्ना को पता चला, तो वे सुधीर के घर आए और माथा पीट लिया। “यार सुधीर, तूने अपनी बेटी का जीवन खराब कर दिया। वो लड़का मयंक? उसके पास तो ढंग की गाड़ी भी नहीं है। किराये के मकान से अभी-अभी छोटे से फ्लैट में शिफ्ट हुए हैं। तेरी स्नेहा वहाँ एडजस्ट कैसे करेगी? मेरी मान, अभी भी वक्त है, रिश्ता तोड़ दे। मेरे पास तेरी बेटी के लिए भी कई बड़े घरानों के रिश्ते हैं।”
सुधीर जी ने शांति से चाय का कप मेज पर रखा और कहा, “खन्ना, मैंने घर की दीवारें नहीं, घर के लोगों के दिल देखे हैं। मयंक जब पहली बार मिलने आया था, तो उसने सबसे पहले मेरी माँ के पैर छुए थे। जब स्नेहा पानी लेकर आई, तो उसने नज़रें झुकाकर बात की। उसके पिता ने दहेज की बात नहीं की, बल्कि यह कहा कि ‘हमें बेटी दीजिये, लक्ष्मी तो हम खुद कमा लेंगे’। मुझे अपनी बेटी के लिए एटीएम मशीन नहीं, एक जीवनसाथी चाहिए था।”
दोनों शादियाँ हो गईं। तान्या की शादी शहर की सबसे बड़ी शादी थी, जिसकी चर्चा अखबारों में हुई। स्नेहा की शादी सादगी से हुई, जिसमें सिर्फ़ करीबी लोग शामिल थे।
वक्त का पहिया घूमा। दो साल बीत गए।
एक दिन अचानक सुधीर जी को दिल का दौरा पड़ा। उन्हें शहर के अस्पताल में भर्ती कराया गया। खबर मिलते ही स्नेहा और मयंक दौड़े चले आए। मयंक ने ऑफिस से छुट्टी ले ली। वह दिन-रात अस्पताल में सुधीर जी के सिरहाने बैठा रहता। दवाइयाँ लाना, डॉक्टर से बात करना, स्नेहा को ढाढस बंधाना—सब मयंक ने संभाल लिया था। यहाँ तक कि मयंक के माता-पिता भी अस्पताल आकर सुधीर जी की पत्नी को सहारा देने लगे।
स्नेहा के ससुराल वालों ने कहा, “समधी जी हमारे परिवार का हिस्सा हैं, जब तक वो ठीक नहीं होते, हम स्नेहा को घर नहीं ले जाएंगे, उसकी ज़रूरत यहाँ है।”
सुधीर जी ठीक होकर घर आ गए। मयंक और उसका परिवार उनकी सेवा में लगा रहा। उस छोटे से घर में जगह कम थी, लेकिन प्रेम इतना था कि कोई कोना खाली नहीं लगता था।
तभी एक शाम, मिस्टर खन्ना सुधीर जी से मिलने आए। वे काफी कमजोर और परेशान लग रहे थे। उनके चेहरे से वो पुरानी रईसी वाली चमक गायब थी।
सुधीर जी ने उठने की कोशिश की, “आओ खन्ना, कैसे हो? तान्या कैसी है? दामाद जी का कारोबार कैसा चल रहा है?”
खन्ना कुर्सी पर ढह से गए और उनकी आँखों से आँसू बह निकले। “सुधीर, मैं हार गया। मैं बहुत बुरी तरह हार गया।”
सुधीर जी ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ? सब ठीक तो है?”
खन्ना ने रुंधे गले से बताना शुरू किया। “तान्या… तान्या खुश नहीं है सुधीर। रूहान और उसके घर वालों ने उसका जीना हराम कर दिया है। शादी के छह महीने बाद ही रूहान के किसी और लड़की के साथ चक्कर की खबरें आने लगी थीं। जब तान्या ने विरोध किया, तो रूहान ने उसे साफ़ कह दिया कि ‘तुम मेरे स्टेटस के लिए थी, मेरे दिल के लिए नहीं’। वो उसे पार्टियों में सिर्फ़ सजावट की तरह ले जाता है और घर आकर उससे बात तक नहीं करता।”
सुधीर जी सन्न रह गए।
खन्ना आगे बोले, “और वो ससुराल वाले… जिन्हें मैंने मुँह माँगा दहेज दिया, लग्ज़री गाड़ियाँ दीं… वो आज भी तान्या को ताने मारते हैं कि ‘तुम्हारे बाप ने दिया ही क्या है’। तान्या डिप्रेशन में चली गई है। वो रोज मुझे फोन करके रोती है। जब मैं रूहान से बात करने गया, तो उसने मुझे मेरे ही घर से बेइज्जत करके निकाल दिया। उसने कहा, ‘हमने शादी नहीं की थी, हमने आपकी बेटी और आपके पैसे के साथ डील की थी। अब डील पूरी हो गई, तो ज्यादा दखलंदाजी मत कीजिये’।”
खन्ना का गला भर आया। “कल मुझे पता चला कि रूहान तान्या पर हाथ भी उठाता है। मैं अपनी फूल जैसी बच्ची को उस सोने के पिंजरे में तड़पते हुए देख रहा हूँ, पर कुछ कर नहीं पा रहा। क्योंकि समाज में बदनामी के डर से तान्या तलाक नहीं लेना चाहती।”
तभी मयंक कमरे में आया, हाथ में सुधीर जी के लिए सूप का कटोरा लिए। उसने खन्ना जी को देखा, पैर छुए और पूछा, “अंकल, आप पानी लेंगे या चाय?”
खन्ना ने मयंक को देखा। साधारण कपड़े, चेहरे पर विनम्रता और आँखों में बड़ों के लिए सम्मान। उन्हें दो साल पहले कही अपनी ही बात याद आ गई—”इसके पास तो ढंग की गाड़ी भी नहीं है।”
खन्ना जी ने मयंक का हाथ पकड़ लिया। “बेटा, तुम लखपति नहीं हो, पर तुम इंसान हो। और मैंने अपनी बेटी को एक जानवर के हवाले कर दिया, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वो जानवर सोने की जंजीर में बंधा था।”
मयंक के जाने के बाद खन्ना ने सुधीर से कहा, “सुधीर, उस दिन तुम सही थे और मैं गलत। मैंने ‘सौदा’ किया था, और तुमने ‘रिश्ता’ जोड़ा था। मैंने तान्या के ससुराल वालों की कोठी देखी, तुमने मयंक का किरदार देखा। मैंने बैंक बैलेंस देखा, तुमने संस्कार देखे।”
सुधीर जी ने खन्ना के कंधे पर हाथ रखा। “खन्ना, गलती हम पिता की ही होती है। हम अक्सर अपनी बेटियों के लिए ‘सुरक्षा’ ढूंढते हैं और हमें लगता है कि सुरक्षा सिर्फ पैसों में है। हम भूल जाते हैं कि एक लड़की को एसी कमरे और नौकर-चाकर से ज्यादा एक ऐसे साथी की ज़रूरत होती है जो उसकी इज़्ज़त करे, जो उसके बीमार पिता को अपना पिता समझे, और जो उसके आंसुओं को पोंछ सके।”
खन्ना ने आंसू पोंछे और दृढ़ता से बोले, “अब और नहीं सुधीर। मैं वो गलती सुधारूंगा। मैं आज ही जाऊंगा और तान्या को उस नर्क से वापस लाऊंगा। लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा… भाड़ में जाए सब। मैंने उसका सौदा किया था, अब मैं उसका पिता बनकर उसका हाथ थामूंगा।”
उस शाम, जब खन्ना जी अपने आलीशान लेकिन वीरान घर की ओर लौटे, तो उन्हें समझ आ चुका था कि मकान ईंटों से बनता है, लेकिन घर संस्कारों से। तान्या के ससुराल में सब कुछ था, बस ‘अपनापन’ नहीं था। और स्नेहा के ससुराल में शायद सुविधाओं की कमी थी, लेकिन वहां ‘सुकून’ था।
बाज़ार में चीज़ें खरीदी जाती हैं, और जो चीज़ें खरीदी जाती हैं, उनकी कीमत होती है, कद्र नहीं। खन्ना ने अपनी बेटी के लिए दूल्हा नहीं, बल्कि एक रईस खरीदार ढूंढा था। और खरीदार कभी वस्तु से प्रेम नहीं करता, वह सिर्फ़ उसका उपयोग करता है।
वहीं सुधीर जी ने रिश्ता जोड़ा था। एक ऐसा रिश्ता जहाँ दो परिवार मिले थे, दो चेकबुक नहीं।
उस रात खन्ना जी ने अपनी डायरी में लिखा— “विवाह दो आत्माओं का मिलन होना चाहिए, दो हैसियतों का नहीं। जब हम अपनी बेटियों के लिए वर ढूंढें, तो यह न देखें कि लड़का ‘क्या’ है, बल्कि यह देखें कि लड़का ‘कौन’ है। क्योंकि दौलत आज है, कल नहीं होगी… लेकिन चरित्र और संस्कार जीवन भर साथ निभाते हैं। जिस दिन हम यह समझ जाएंगे, उस दिन अदालत के दरवाज़ों पर तलाक की अर्ज़ियों की कतारें कम हो जाएंगी और घरों में खुशियाँ वापस लौट आएंगी।”
सच्चा रिश्ता वही है जो बुरे वक्त में ढाल बनकर खड़ा रहे, न कि वो जो अच्छे वक्त में सिर्फ़ सजावट बनकर रहे। तान्या और स्नेहा की कहानियाँ सिर्फ़ दो सहेलियों की कहानियाँ नहीं थीं, बल्कि आज के समाज के उस कड़वे सच का आईना थीं, जहाँ हम चमक-दमक के पीछे भागते हुए असली उजाले को पीछे छोड़ देते हैं।
मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश