विश्वास की छांव – मैथिली मिश्रा

 बुआ जी का हर एक शब्द मेरे सीने में लोहे की कील की तरह चुभ रहा था। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे शरीर से सारा खून निचोड़ लिया हो। मेरी मुट्ठियां भींच गईं, आंखें डबडबा आईं। सबसे ज्यादा डर मुझे इस बात का था कि भाभी क्या जवाब देंगी। आखिर बुआ की बात में … Read more

रिश्तों के घाव

“बाबूजी, आपसे कितनी बार कहा है कि डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाया कीजिए। बिस्तर पर फिर से दाल गिरा दी आपने। अब यह चादर कौन धोएगा? सुमन तो नौकरानी है नहीं, और मुझे ऑफिस से आकर इतनी फुर्सत नहीं कि आपकी गंध साफ करता रहूं।” रजत की आवाज़ में कड़वाहट थी, इतनी कड़वाहट कि … Read more

सच्चा साथी

“आज जब मेरे पास गाड़ियाँ हैं, बांग्ला है, शोहरत है, तो आप सब यहाँ गुलदस्ते लेकर खड़े हैं। आप कह रहे हैं कि आप मेरे साथ थे? नहीं। आप मेरे ‘वक्त’ के साथ हैं, मेरे साथ नहीं। जब मेरा वक्त बुरा था, तो मैं आपके लिए अजनबी था। आज मेरा वक्त अच्छा है, तो मैं … Read more

झूठी शान

“मुझे माफ़ कर दे बेटा,” दीवानचंद जी रो पड़े, “मैं चकाचौंध में अंधा हो गया था। मैंने तेरे पसीने की कमाई की कद्र नहीं की और उसके झूठ पर अपना सब कुछ लुटा दिया।” कमल ने पिता के आँसू पोंछे, “पापा, विमल भैया ने जो किया वो उनकी समझ थी। पर परिवार का मतलब ही … Read more

बुरी बहू

“रवि, अब बस बहुत हुआ। मुझसे तुम्हारी माँ की सेवा नहीं होती। आज के बाद मैं उनके कमरे में पानी का एक गिलास लेकर भी नहीं जाऊंगी।” स्नेहा ने यह बात इतने सपाट और ठंडे लहजे में कही कि डायनिंग टेबल पर बैठे रवि के हाथ से निवाला छूटकर प्लेट में गिर गया। कमरे में … Read more

संस्कारों की कमी 

अंजलि की आँखों में आँसू आ गए। वही गुस्सा जब रमन ने किया तो ‘काम का तनाव’ था। जब प्रिया ने किया तो ‘बचपन की आदत’ थी। लेकिन जब उसने अपनी जायज़ तकलीफ बताई, तो वह ‘बदतमीज़ी’ और ‘संस्कारों की कमी’ बन गई। तभी घर के मुखिया, शर्मा जी, जो चुपचाप अखबार पढ़ रहे थे, … Read more

दिल पर पड़े बोझ

सावित्री देवी के घर में आज कोहराम मचा हुआ था। शहर की प्रतिष्ठित ‘महिला समिति’ की मासिक बैठक आज उन्हीं के घर पर थी। यह सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि सावित्री देवी के लिए अपनी नाक का सवाल था। शहर की मेयर की पत्नी और कई बड़े अधिकारियों की पत्नियां आने वाली थीं। सावित्री देवी … Read more

दहलीज के पार का उजाला

“मुझे माफ़ कर दो सुप्रिया… मुझे माफ़ कर दो,” कुणाल की आवाज़ कांप रही थी। “आज तुमने जब वो दरवाज़ा छोड़ा, तब पहली बार मुझे अपनी कायरता का अहसास हुआ। मैं घर पर बैठा रहा, लेकिन मेरा दम घुट रहा था। मिस्टर मल्होत्रा घर आए, माँ ने सब इंतज़ाम किए, लेकिन मैं डाइनिंग टेबल पर … Read more

डाउन पेमेंट

“सुधा, अगले हफ्ते बिल्डर को डाउन पेमेंट का चेक देना है। पंद्रह लाख रुपये। एफडी मैच्योर हो गई है, और पीएफ का पैसा भी आ गया है। भगवान की दया से, इस बार दिवाली हम अपने नए फ्लैट ‘आशियाना’ में मनाएंगे,” राघव ने डायरी बंद करते हुए चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान के साथ … Read more

फर्ज की मशाल

कौशल्या देवी ने अवनि का हाथ थामा और उसे अपनी छाती से लगाते हुए गर्व से कहा, “लोग कहते हैं कि बेटा घर का नाम चलाता है, लेकिन मैं कहती हूँ कि औलाद का कोई लिंग नहीं होता, औलाद सिर्फ कर्म और प्रेम से पहचानी जाती है। समाज बेटे को कभी ‘बेटी’ कहकर नहीं पुकारता, … Read more

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