ममता की कोई कीमत नहीं होती ! – सुदर्शन सचदेवा

ममता की कोई कीमत नहीं होती मदर्स-डे का दिन था। पूरा शहर रंग-बिरंगे पोस्टरों, फूलों और ऑफरों से सजा हुआ था। “मां के लिए यह गिफ्ट खरीदिए…” “मां को स्पेशल महसूस कराइए…” हर दुकान पर भीड़ थी। उधर, राहुल भी ऑफिस से लौटते हुए सोच रहा था कि इस बार मां को क्या दूं। पिछले … Read more

इंसानियत का भरोसा – गीता वाधवानी

 नंदिनी अपने दोनों बच्चों के साथ अपने घर की दीवारों को देखकर लगातार रो रही थी। दोनों बच्चे उदास थे और उसकी तरफ देख रहे थे। उसका बेटा अमित लगभग 16 साल का था और बेटी कनक 10 साल की।   तीनों मिलकर घर का सामान पैक कर रहे थे और उठाकर आंगन में रखते जा … Read more

ममता की कोई कीमत नहीं – राहुल कुमार

दौलत के तराज़ू में ममता का मोल कहाँ तुलता है, माँ के आँचल सा सुकून दुनिया में कहाँ मिलता है। चुका सके जो माँ का कर्ज़, ऐसा कोई धन बना नहीं, इस निस्वार्थ समर्पण की, सच में कोई कीमत नहीं। ​शाम ढल रही थी। घर के आंगन में तुलसी के पौधे के पास दीया जलाते … Read more

ममता की क़ीमत नहीं होती – रश्मि वैभव गर्ग

कृष्णकली नाम था उसका ..प्यार से सब कली ही बुलाते थे। ग़रीबी के साये में ही आँख खोली थी उसने। कली अपने माँ बाप की सबसे बड़ी संतान थी।उससे छोटी तीन बहिनें और थी। जीवन की कठिनाइयों में शिक्षा प्रायः गौण ही हो जाती है। दसवीं की परीक्षा में कली पूरक आई थी। पिता पर … Read more

रिश्तों की कीमत – तृप्ति देव 

कहते हैं कि घर तब तक घर नहीं बनता जब तक उसमें निस्वार्थ प्रेम की सांसें न गूंजें।  गाँव के आखिरी छोर पर बनी एक जर्जर मिट्टी की झोपड़ी सिर्फ एक ढहती हुई छत नहीं, बल्कि एक अटूट रिश्ते की गवाह थी। उस आंगन में नीम के पेड़ के नीचे बंधी रहती थी— “गौरी”। सफेद … Read more

भरोसा – विनीता सिंह

गाँव के किनारे एक छोटा-सा घर था, जहाँ 14 साल की अनाया अपनी माँ के साथ रहती थी। उसके पिता कई साल पहले शहर कमाने गए थे,  फिर कभी लौटकर नहीं आए। माँ सिलाई करके घर चलाती थीं और अनाया पास के सरकारी स्कूल में पढ़ती थी। , माँ-बेटी के बीच बहुत प्यार और भरोसा … Read more

जो बोया है वही तो काटना पड़ता है – मंजू ओमर

नीता ओ नीता अवनि और आकाश आ गए क्या, उनसे कह दो थोड़ी देर मेरे पास आकर  बैठे। और तुम भी नहीं बैठती मेरे पास बस दिनभर काम का बहाना बना कर मुझसे दूर दूर रहती हो, अमित आवाजें दे रहा था, लेकिन कोई सुन नहीं रहा था। ये रोज का हो गया था अमित … Read more

पड़ाव – डॉ बीना कुण्डलिया

आँगन के पीछे बगीचे में बिछें फोल्डिंग बैड पर पड़े पड़े हरीश बाबू लम्बी लम्बी सांसें ले रहे। अब तो जोरों से खांसने भर की भी ताकत नहीं बची थी उनके शरीर में, शरीर सूखकर मात्र लकड़ी का ढांचा सा रह गया था । कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं जो चीखते चिल्लाते नहीं बस … Read more

अमावस  का सच – एम. पी. सिंह

बाबूलाल कें खेत की मुंडेर पर एक बरगद का पेड़ था ओर उसकें पास एक झोपडी मैं एक ब्रम्चारी साघु बाबा रहता था. आसपास कें सब गाँव मैं मशहूर था कि पेड़ पर भूत रहता हैं. बाबा सुबह शाम पेड़ कें नीचे पूजा पाठ करता जिससे गावं कें लोग भूत कें प्रकोप से बचें रहते. … Read more

जिन्दगी की दूसरी पारी – बीना शुक्ला अवस्थी

आज हरिद्वार के इस होटल में काम करते महेन्द्र को पूरे पॉच साल हो गये। आज से पॉच साल पहले वह सेवा निवृत्त हुआ था। बहुत खुश था वह जिन्दगी की दूसरी पारी अपने परिवार के साथ बितायेगा।‌ जिन्दगी भर नौकरी के कारण न घर परिवार को समय दे पाया और न खुद को। माता … Read more

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