दौलत के तराज़ू में ममता का मोल कहाँ तुलता है,
माँ के आँचल सा सुकून दुनिया में कहाँ मिलता है।
चुका सके जो माँ का कर्ज़, ऐसा कोई धन बना नहीं,
इस निस्वार्थ समर्पण की, सच में कोई कीमत नहीं।
शाम ढल रही थी। घर के आंगन में तुलसी के पौधे के पास दीया जलाते हुए सुजाता जी
की नज़रें बार-बार मुख्य द्वार की ओर उठ जाती थीं। आज उनकी बेटी निधि अपने मायके
आ रही थी। सुजाता जी के घुटनों में गठिया का पुराना दर्द रहता था, लेकिन बेटी के आने
की खुशी में आज वह दर्द न जाने कहाँ गायब हो गया था। रसोई से बेसन के लड्डुओं और
मठरियों की सोंधी महक पूरे घर में फैल रही थी। निधि को बचपन से ही अपनी माँ के हाथ
के बने ये लड्डू बेहद पसंद थे, इसलिए सुजाता जी सुबह से ही रसोई में जुटी हुई थीं।
माँ जी, आप क्यों इतनी तकलीफ कर रही हैं? डॉक्टर ने आपको ज़्यादा देर खड़े रहने
और आग के पास जाने से मना किया है ना रसोई के दरवाज़े पर खड़ी उनकी बहू, रचना
(निधि की भाभी) ने कुछ खीजते हुए कहा।
रचना स्वभाव से बुरी नहीं थी, लेकिन उसका नज़रिया बेहद व्यावहारिक और कुछ हद
तक भौतिकवादी था। वह घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ बखूबी निभाती थी, लेकिन उसे
लगता था कि हर चीज़, हर सेवा और हर रिश्ते में एक नपा-तुला हिसाब होना चाहिए। उसे
अक्सर यह शिकायत रहती थी कि जब भी ननद मायके आती है, तो सास का सारा ध्यान
और प्यार उधर ही केंद्रित हो जाता है।
सुजाता जी ने पसीने से भीगे अपने माथे को साड़ी के पल्लू से पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा,
अरे बहू, मेरी लाडो महीनों बाद आ रही है। उसके लिए इतना तो कर ही सकती हूँ। जब
वह अपने हाथों से चाव से खाती है ना, तो मेरी सारी थकान और बीमारी जैसे पल भर में
मिट जाती है।रचना ने हल्का सा मुंह बनाते हुए कहा,हाँ माँ जी, आपकी लाडो तो बस यहाँ आराम
फरमाने आती है। हम तो दिन रात खटते हैं, पर हमारी कोई खास कद्र नहीं। और अगर
आप बीमार पड़ गईं, तो अस्पताल के चक्कर भी मुझे और विकास (निधि के भाई) को ही
लगाने पड़ेंगे। यह कहकर रचना वहाँ से चली गई।
कुछ घंटों बाद दरवाजे की घंटी बजी और निधि घर में दाखिल हुई। सुजाता जी ने दौड़कर
अपनी बेटी को सीने से लगा लिया। माँ-बेटी का यह आत्मीय मिलन देखकर रचना ने एक
फीकी सी मुस्कान दी और औपचारिकता निभाते हुए निधि का सामान कमरे में रखवा
दिया। रात के खाने पर सुजाता जी ने निधि की पसंद के ढेरों व्यंजन परोसे। शहर की
भागदौड़ और कॉर्पोरेट दुनिया की कृत्रिम ज़िंदगी से दूर, निधि को अपनी माँ के हाथ का
खाना खाकर ऐसा लगा जैसे उसे दुनिया का सबसे बड़ा खजाना मिल गया हो।
अगले दिन सुबह, निधि जब नहाकर अपने कमरे से बाहर आ रही थी, तो उसने दालान में
रचना और अपने भाई विकास की धीमी आवाज़ में हो रही बातचीत सुन ली।
रचना कह रही थी,विकास, देखो माँ जी की तबीयत ठीक नहीं रहती, फिर भी जब देखो
तुम्हारी बहन के लिए रसोई में पिसती रहती हैं। निधि तो शहर में एक अच्छी कंपनी में
नौकरी करती है, मोटा पैकेज है उसका। अगर वह यहाँ आकर माँ जी से इतनी सेवा
करवाती है, तो कम से कम माँ जी के इलाज, उनकी दवाइयों या घर के खर्च के लिए कुछ
पैसे तो उसे देने ही चाहिए। आखिर मुफ्त में इतनी शाही सेवा आज के ज़माने में कहाँ
मिलती है? अगर बाहर कोई दाई भी रखो तो वह भी महीने के हजारों रुपये लेती है।
विकास ने पत्नी को समझाने की कोशिश की,;रचना, कैसी बातें कर रही हो? वह मेरी
बहन है, इस घर की बेटी है। माँ अपनी खुशी से, अपनी ममता की खातिर उसके लिए यह
सब करती है। इसमें पैसों का हिसाब कहाँ से आ गया?
लेकिन रचना अपनी बात पर अड़ी रही, ममता से पेट नहीं भरता विकास, और ना ही
दवाइयां आती हैं। व्यावहारिक बनो।
दरवाजे के बाहर खड़ी निधि के कानों में मुफ्त की सेवा दाई और पैसे जैसे शब्द पिघले
हुए सीसे की तरह चुभ गए। शहर की तेज़-तर्रार ज़िंदगी ने निधि को भी कुछ हद तक
प्रैक्टिकल बना दिया था जहाँ हर चीज़ का मोल चुकाया जाता है। उसे लगा कि शायद
भाभी सही कह रही है। वह सच में मायके आकर सिर्फ आराम करती है और माँ की मेहनत
का कोई मोल नहीं चुकाती। अपने स्वावलंबी होने के अहंकार और भाभी का मुंह बंद करने
की नीयत से, निधि ने एक बहुत ही बचकाना और कड़वा फैसला लिया।
शाम को जब सुजाता जी निधि के लिए उसकी पसंद की इलायची वाली चाय और मठरी
लेकर कमरे में आईं, तो निधि ने अपना पर्स खोला। उसने एक लिफाफा निकाला जिसमें
पचास हजार रुपये नकद थे। उसने वह लिफाफा माँ के हाथों में रख दिया।
यह क्या है बेटा सुजाता जी ने लिफाफे को भारीपन से महसूस करते हुए हैरानी से
पूछा।
निधि ने नज़रें चुराते हुए, एक सधे हुए स्वर में कहा, माँ, आप मेरे लिए इतना कुछ करती
हैं। आपके घुटनों में दर्द रहता है, फिर भी आप घंटों रसोई में खड़ी रहकर मेरी पसंद का
खाना बनाती हैं। मेरे आने से भाभी को भी घर के काम में दिक्कत होती है। यह पैसे रख
लीजिए, आपके इलाज और घर के खर्च में काम आएंगे। मुझे भी लगेगा कि मैंने आपकी
इस सेवा की कोई कीमत चुका दी है और भाभी पर भी मेरा बोझ नहीं पड़ेगा।
निधि की बात सुनकर सुजाता जी के हाथ कांपने लगे। उनके चेहरे की वह चमक, जो बेटी
के आने से आई थी, अचानक एक गहरे अवसाद में बदल गई। लिफाफा उनके कांपते हाथों
से छूटकर बिस्तर पर गिर पड़ा। कमरे में कुछ पल के लिए श्मशान जैसा भारी सन्नाटा छा
गया। दरवाजे के पास से गुज़र रही रचना के कदम भी यह संवाद सुनकर ठिठक गए। वह
वहीं रुक कर सब सुनने लगी।
सुजाता जी की बूढ़ी आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने रुंधे हुए, लेकिन एक दृढ़ गले से
कहा, कीमत? तू मेरी ममता की कीमत चुकाने आई है निधि? क्या इस दुनिया में कोई
ऐसा तराजू आज तक बना है जो एक माँ के प्यार को रुपयों में तौल सके?निधि घबरा गई, उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा था, नहीं माँ, मेरा वह मतलब
बिल्कुल नहीं था। मैं तो बस…
सुजाता जी ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा,जब तेरे पिता का साया बचपन में ही उठ
गया था, तब सिलाई-कढ़ाई करके, अपनी रातों की नींद बेचकर मैंने तुझे और विकास को
पाला था। जब तू मेरे गर्भ में थी, नौ महीने मैंने जो वजन उठाया, क्या उसकी कोई कीमत
है इस लिफाफे में? जब तू छोटी थी और निमोनिया से पीड़ित थी, तो रात-रात भर
जागकर मैंने जो तेरी सांसों की पहरेदारी की, उसकी क्या कीमत लगाएगी तू? तेरे पहले
कदम चलने से लेकर, तेरी विदाई तक, जो मेरे दिल के टुकड़े हुए, बता कितने हजार के
नोटों से तू उन टुकड़ों को जोड़ेगी? अगर तुझे कीमत ही चुकानी है, तो लौटा दे मुझे मेरी
वह जवानी जो मैंने तुम बच्चों के बचपन को संवारने में खर्च कर दी!
बाहर खड़ी रचना यह सब सुन रही थी। उसे अपनी उस ओछी सोच पर भयंकर पश्चाताप
होने लगा जो उसने सुबह विकास के सामने ज़ाहिर की थी।
सुजाता जी आगे बोलीं, बेटी, एक माँ अपने बच्चों के लिए जो करती है, वह कोई ड्यूटी या
सेवा नहीं है, वह उसका निस्वार्थ समर्पण होता है। जिस दिन एक माँ अपने बच्चों से अपने
प्यार का मोल मांगने लगेगी, उस दिन इस दुनिया से रिश्तों का वजूद ही खत्म हो जाएगा।
यह पैसे तू अपने पास रख। मुझे तेरी दौलत नहीं, सिर्फ तेरा वक्त और तेरा प्यार चाहिए।
निधि अब फूट-फूट कर रो रही थी। उसे अपने आधुनिक होने के अहंकार और भाभी की
बातों में आकर उठाए गए इस कदम पर गहरी ग्लानि हो रही थी। उसने वह लिफाफा
उठाया और कमरे के एक कोने में फेंक दिया। वह दौड़कर अपनी माँ के गले लग गई और
सिसकते हुए बोली, मुझे माफ़ कर दो माँ। मैं पैसों के इस अहंकार में अंधी हो गई थी। सच
में, आपकी ममता की कोई कीमत नहीं है।
तभी रचना धीरे से कमरे के अंदर आई। उसकी आँखों से भी आंसुओं की धार बह रही
थी। उसने आगे बढ़कर बिना कुछ कहे सुजाता जी के पैर छू लिए। रुंधे गले से वह बोली,
मुझे भी माफ़ कर दीजिए माँ जी। पैसों और व्यावहारिक होने के चश्मे से मैंने हमेशा रिश्तों
को तौला। मुझे लगता था कि आप निधि को ज़्यादा प्यार करती हैं। लेकिन आज मुझे
समझ आ गया कि घर की दीवारें ईंट, सीमेंट या पैसों से नहीं, बल्कि आपके इस अनमोल
और निस्वार्थ प्यार से खड़ी हैं। मेरी सोच बहुत छोटी थी।
सुजाता जी ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए अपनी बेटी और
बहू दोनों को एक साथ गले लगा लिया। आज उस घर में पैसों, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता
का झूठा आवरण हमेशा के लिए टूट चुका था। रसोई से आ रही उस शाम के खाने की
महक में अब सिर्फ मसालों का स्वाद ही नहीं, बल्कि उस अनमोल ममता की खुशबू भी
शामिल थी, जिसे दुनिया की कोई भी दौलत कभी नहीं खरीद सकती।
राहुल कुमार