इंसानियत का भरोसा – गीता वाधवानी

 नंदिनी अपने दोनों बच्चों के साथ अपने घर की दीवारों को देखकर लगातार रो रही थी। दोनों बच्चे उदास थे और उसकी तरफ देख रहे थे। उसका बेटा अमित लगभग 16 साल का था और बेटी कनक 10 साल की। 

 तीनों मिलकर घर का सामान पैक कर रहे थे और उठाकर आंगन में रखते जा रहे थे। लगभग 18 साल पहले नंदिनी इस घर में ही आकाश की दुल्हन बनकर आई थी। 

 नंदिनी और आकाश की लव मैरिज हुई थी। आकाश के पिता मनोहर लाल इस विवाह से बहुत नाराज थे। उन्होंने कभी भी नंदिनी को अपने हृदय से बहू नहीं माना था। वह एक धनी परिवार की लड़की से आकाश का विवाह करवाना चाहते थे और नंदिनी गरीब परिवार से थी। उन्होंने आकाश से बात करना भी छोड़ दिया था। यह घर आकाश ने अपनी कमाई और मेहनत से बनाया था। 

    लगभग सारा सामान आंगन में रखा जा चुका था और नंदिनी के आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। आकाश की यादें उस घर से जुड़ी हुई थी और उसके बच्चों का बचपन भी वही बीता था। 

     वे तीनों आंगन में खड़े थे कि तभी वहां सामने सड़क पर एक कार आकर रुकी। कार में से सेठ दीनदयाल और उनकी पत्नी राधा बाहर उतरे। उन लोगों ने ही यह घर खरीदा था। आज नंदिनी को यह घर खाली करना था। 

 नंदिनी ने उन्हें नमस्कार किया और उसके आंसू टप टप गिरने लगे। नंदिनी को रोते देखकर और उसके बच्चों को उदास देखकर, सेठ दीनदयाल की आंखों में इंसानियत की परछाई दिखने लगी। 

 उन्होंने नंदिनी से कहा-” मैं और मेरी पत्नी राधा इस घर को वृद्ध आश्रम में बदलना चाहते हैं,पर मैं तुम्हें कुछ दिन और इस घर में रहने की इजाजत देता हूं। लेकिन सिर्फ तब तक,जब तक मैं जीवित हूं

और मैं शायद ज्यादा दिन तक जीवित न रहूं क्योंकि मुझे दो हार्ट अटैक आ चुके हैं। न जाने कब ईश्वर का बुलावा आ जाए, उसके बाद तुम इस घर की चाबियां मेरी पत्नी को सौंप देना। हमारे घर का पता और फोन नंबर तुम अपने पास लिख लो। हमें तुम पर पूरा भरोसा है। ”      गीता वाधवानी 

 फिर वे दोनों वहां से चले गए। अब नंदिनी की आंखों में आंसू तो थे लेकिन खुशी के। अब रोज सुबह उसका सबसे पहला काम ईश्वर से प्रार्थना करना होता था कि हे ईश्वर! सेठ दीनदयाल की लंबी उम्र करना, उन्हें सदा खुश रखना।” 

 देखते देखते 6 वर्ष बीत गए। नंदिनी के बेटे अमित  का कॉलेज पूरा हो चुका था और अब वह आगे की पढ़ाई के साथ-साथ एक नौकरी  भी कर रहा था। उसकी बेटी कनक भी दसवीं पास कर चुकी थी। 

     एक दिन अमित ने मोबाइल पर सेठ दीनदयाल की मृत्यु का समाचार देखा। नंदिनी को यह जानकर बहुत दुख हुआ और उसने राधा जी के पास जाकर अपना अफसोस जाहिर किया और उनसे कहा -” सेठ जी से किए गए वादे के मुताबिक अब हम यह घर खाली कर देंगे, आप दो-तीन दिन में आकर चाबियां ले लीजिएगा। ” 

 राधा दो-तीन दिन बाद वहां आई तो उसने देखा कि घर के बाहर एक बहुत सुंदर बोर्ड लगा हुआ था। जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था ” सेठ दीनदयाल वृद्ध आश्रम ” यह देखकर राधा की आंखें भर आई। 

 उसने नंदिनी से पूछा-” अब आप लोग कहां जाएंगे? ”      गीता वाधवानी 

 तब नंदिनी ने उन्हें अंदर बुलाकर बिठाया और पूरी बात बताई-” कुछ वर्ष पहले मेरे पति आकाश का एक बहुत भयानक एक्सीडेंट हो गया था। उनके सिर में बहुत गहरी चोट लगी थी। डॉक्टर साहब ने दो ऑपरेशन किये, उसके बाद आकाश कोमा में चले गए। पैसा पानी की तरह खर्च हो रहा था। मेरे सारे जेवर बिक चुके थे और मैं यह घर भी गिरवी रख चुकी थी। उसके बाद भी पैसे कम पड़ गए। मेरे ससुर जी हमारी लव मैरिज से नाराज थे, पर बेटे की एक्सीडेंट की खबर सुनकर उन्होंने हमारी मदद की, फिर भी आकाश हमें छोड़ कर चले गए। 

 तब मेरे ससुर जी ने घर के गिरवी पड़े कागज उस व्यक्ति से खरीद लिए। इस बात का मुझे पहले पता नहीं था। मैं जब उसे व्यक्ति के पास अपने गिरवी पड़े कागजों के बारे में बात करने गई तो उसने बताया कि मनोहर लाल ने वह कागज खरीद लिए हैं और उस घर को भी बेच दिया है, उसके बाद मुझे आप लोगों का संदेश आया कि घर खाली करना है।अभी कुछ दिन पहले मेरे ससुर जी बहुत बीमार हो गए थे। मैं उनसे मिलने गई तो वह बहुत पछता रहे थे। उन्होंने कहा कि तुमने मेरा बेटा मुझसे छीन लिया था यही सोच कर मैं तुमसे बदला लेना चाहता था। मैं चाहता था कि तुम दर-दर की ठोकरे खाओ। इसीलिए मैंने तुम्हारे घर के कागज खरीद कर उसे सेठ दीनदयाल को बेच दिया ताकि जब वह तुमसे घर खाली करवाएं, तो तुम बेघर हो जाओ। 

 लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नंदिनी मैंने तुम्हें कभी अपनी बहू नहीं माना। मुझे माफ कर दो बेटा और बच्चों सहित अपने घर रहने आ जाओ। लेकिन मेरे ससुर जी ठीक नहीं हुए और चल बसे। वे अपना सब कुछ हमारे नाम कर गए। अब आप हमारी चिंता ना करें। हमारे पास सब कुछ है और फिर अमित भी नौकरी कर रहा है। अब आप यहां वृद्ध आश्रम बनाइए और बेसहारों को सहारा दीजिए, जैसे एक दिन हमें दिया था। ” 

     राधा ने कहा-” नंदिनी, मैं जानती हूं कि तुमने अपनी प्रार्थनाओं और दुआओं में सेठ जी को हमेशा बनाए रखा, इसी कारण वह इतने वर्षों तक जीवित रह पाए, तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद। और साथ ही हमारे भरोसे को बनाए रखा उसके लिए भी धन्यवाद। ” 

 नंदिनी-” धन्यवाद तो मुझे आपका कहना चाहिए, वरना ना जाने हमारा क्या होता, कहां जाते हम। सेठ जी ने एक टूटती  हुई औरत को इंसानियत का भरोसा दिया था। आपका और सेठ जी का बहुत-बहुत धन्यवाद। ” 

 और फिर नंदिनी ने, राधा को चाबियां सौंप दी। 

 स्वरचित, अप्रकाशित गीता वाधवानी दिल्ली

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