ममता की कोई कीमत नहीं होती
मदर्स-डे का दिन था। पूरा शहर रंग-बिरंगे पोस्टरों, फूलों और ऑफरों से सजा हुआ था।
“मां के लिए यह गिफ्ट खरीदिए…”
“मां को स्पेशल महसूस कराइए…”
हर दुकान पर भीड़ थी।
उधर, राहुल भी ऑफिस से लौटते हुए सोच रहा था कि इस बार मां को क्या दूं। पिछले साल उसने महंगी साड़ी दी थी, उससे पहले मोबाइल। मगर इस बार प्रमोशन के बाद उसके पास पैसे भी ज्यादा थे और दिखाने की चाहत भी।
उसने एक बेहद महंगा सोने का पेंडेंट खरीदा। दुकानदार ने मुस्कुराकर कहा,
“सर, आपकी मां बहुत खुश हो जाएंगी।”
राहुल भी खुश था। उसे लग रहा था जैसे उसने दुनिया का सबसे बड़ा फर्ज निभा दिया हो।
घर पहुंचा तो मां रसोई में बैठी चुपचाप उसकी पसंद की खीर बना रही थीं। माथे पर पसीना था, मगर चेहरे पर वही पुरानी सुकून भरी मुस्कान।
राहुल ने आते ही बड़ा सा गिफ्ट बॉक्स मां के सामने रख दिया।
“हैप्पी मदर्स-डे, मां!”
मां ने धीरे से डिब्बा खोला। आंखें चमक उठीं।
“बहुत सुंदर है बेटा…”
राहुल गर्व से बोला,
“पूरा पचहत्तर हजार का है।”
मां बस मुस्कुरा दीं।
फिर बोलीं,
“अच्छा है… बहुत अच्छा है।”
लेकिन राहुल को न जाने क्यों वो खुशी नहीं दिखी जिसकी उसे उम्मीद थी। उसने पूछा,
“मां, आपको पसंद नहीं आया क्या?”
मां ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“पसंद तो बहुत आया बेटा… मगर एक बात पूछूं?”
“हां मां।”
“आज कितने दिनों बाद तू मेरे साथ बैठकर खाना खाएगा?”
राहुल चुप हो गया।
मां आगे बोलीं,
“तुझे याद है बचपन में तू बिना मेरी गोद में सिर रखे सोता नहीं था? तू बीमार पड़ता था तो मैं पूरी रात तेरे माथे पर पानी की पट्टी रखती रहती थी। तब मैंने कभी नहीं सोचा कि मेरी ममता की कीमत क्या है।”
राहुल की आंखें झुक गईं।
मां अलमारी से एक पुराना डिब्बा निकाल लाईं। उसमें टूटी हुई छोटी कार, पुरानी ड्रॉइंग्स, स्कूल का पहला बैज और बचपन का रुमाल रखा था।
“जानता है, ये सब मैंने क्यों संभालकर रखा?”
मां बोलीं,
“क्योंकि मां के लिए बच्चे की हर छोटी चीज अनमोल होती है। उसे महंगे गिफ्ट नहीं चाहिए होते… उसे बस अपने बच्चों का थोड़ा समय, थोड़ा अपनापन चाहिए।”
इतना कहते-कहते मां की आवाज भर्रा गई।
राहुल को अचानक याद आया — पिछले तीन सालों से उसने मां के साथ बैठकर ढंग से चाय तक नहीं पी थी। ऑफिस, मीटिंग, दोस्तों और मोबाइल में इतना उलझ गया था कि मां की आंखों का अकेलापन देख ही नहीं पाया।
उस रात पहली बार राहुल ने अपना फोन बंद किया।
रसोई में जाकर मां के साथ बैठा। अपने हाथों से खाना परोसा। फिर मां की गोद में सिर रखकर बोला,
“मां… मैं शायद बहुत देर से समझ पाया कि आपकी ममता की कोई कीमत नहीं होती।”
मां मुस्कुराईं।
उनकी उंगलियां फिर से वैसे ही राहुल के बाल सहला रही थीं जैसे बचपन में सहलाती थीं।
बाहर मदर्स-डे के विज्ञापन अब भी चमक रहे थे…
लेकिन उस छोटे से घर में, एक बेटा पहली बार समझ चुका था कि मां को खरीदा नहीं जा सकता, मां को सिर्फ महसूस किया जाता है।
मां तो बच्चों के खुश होने पर ही खुश हो जाती है , उन्हें थोड़ा सा वक्त और अपनापन चाहिए |
सुदर्शन सचदेवा