पड़ाव – डॉ बीना कुण्डलिया

आँगन के पीछे बगीचे में बिछें फोल्डिंग बैड पर पड़े पड़े हरीश बाबू लम्बी लम्बी सांसें ले रहे। अब तो जोरों से खांसने भर की भी ताकत नहीं बची थी उनके शरीर में, शरीर सूखकर मात्र लकड़ी का ढांचा सा रह गया था । कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं जो चीखते चिल्लाते नहीं बस इंसान को भीतर ही भीतर तोड़कर रख देते हैं ।

घर का पुराना नौकर रमिया कभी कभी घर बार के काम से फुर्सत मिलने पर आकर झांक जाता। एक वही था हमदर्द जाने किस जन्म का कोई रिश्ता रहा होगा उससे जो निभा रहा बेचारा । वरना तो आजकल के नौकर…हरीश बाबू के पास आकर कभी पानी पिला देता, कभी चाय पिला जाता।

और तो घर में किसी के पास पलभर का भी समय नहीं था,जो हरीश बाबू का हालचाल पूछ लें। ऐसा नहीं की घर भर में प्राणियों की कमी हो तीन बेटे, तीन बहुएं, पोते पोतियों से भरा-पूरा हरा भरा हरीश बाबू का परिवार। बस धर्मपत्नी छोड़कर चली गई ईश्वर को प्यारी हो गई।

वो भी जिन्दगी के उस पड़ाव में जब इंसान को जीवन साथी की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है। ऊपर वाले ने बेटी तो नसीब में लिखी ही नहीं, पत्नी भी जब तक जिंदा रही इसी बात का रोना रोती रही। खटिया पर पड़े हुए हरीश बाबू ज़िन्दगी के उन पुराने लम्हों को सोचने लगे ….सच ये जिंदगी भी कैसे कैसे रंग दिखाती है ? 

एक वो भी समय था जब पोस्ट ऑफिस में बड़े बाबू रहे हैं वो, घर बार जमीन जायदाद सब ही विरासत में मिले । कोई कमी नहीं खुद भी अच्छा कमाया खूब खर्च किया बच्चों पर, पढ़ाया लिखाया उच्च शिक्षा दिलवाई, स्कूटर बाईक जो कहा सब ही तो दिया। कस्बे नुमा शहर में अच्छी पहचान रही उनकी, घर पर मिलने जुलने वालों का ताता लगा रहता ऐसा भी समय देखा है

उन्होंने। हरीश बाबू ये हरीश बाबू वो चिल्लाते रहने वाले कहां गुम हो गये सभी, कोई भी हाल नहीं पूछता अब तो आकर‌। बस जब तक जरूरत पूरी करते रहो तब तक ही सब अपने बने रहते,जब जरूरत पूरी हो गई इंसान को भी मक्खी की तरफ फैंक दिया जाता।आज बहुत ज्यादा परेशान सा महसूस कर रहे हरीश बाबू इसलिए धीरे धीरे बड़बड़ाते जा रहे…!!

 अरे ऽऽ अब क्यों आयेंगे वो सब ? अब मैं उनके लायक जो नहीं रहा ।

अब उनकी आवश्यकता की पूर्ति जो नहीं कर सकता कितना काम किया सबके लिए जो कहा सभी किया कभी जमा करा दो कभी निकलवा दो और भी जाने क्या, क्या ? अब तो बिस्तर पर ही पड़ा रहता हूँ । 

बिना सहारे तो खुद उठ भी नहीं सकता किसी के क्या काम आऊंगा ? लेटे लेटे अपने अकड़ते पैरों को सीधा करते बडबडाये-

वाह री किस्मत…. वाह तेरे भी अजीब चौंचले । फिर खुद से ही बड़बड़ाये… “अरे ऽऽ अब किस्मत या बहार वालों को भी क्या दोष दें ? जब घर वाले ही नहीं पूछते। घर वालों को कौन सी

चिन्ता मेरी, फालतू इंसान ही तो हूँ उनकी नजर में अब तो मैं..लेटे लेटे सोचते सोचते हरीश बाबू की आँखें अनायास ही आँसूओं से भरभरा जाती है। भीतर एक टीस सी उठती है। और दिल करूण पुकार कर उठता है। मगर सोचना फिर भी जारी रहता है”….!!

 एक एक कर तीन बहुएं आई घर में तब तक पत्नी भी जिंदा थी और उनकी नौकरी भी। शाम को घर आते तो कभी खाली हाथ लौटना उनको मंजूर ही नही था । कभी फल फ़ूड कभी नथ्थू हलवाई के यहां से गर्म गर्म समोसे, कचोंड़िया जलेबी ले आते पत्नी को गर्म गर्म गुलाब जामुन बहुत भाते थे ।

तो कभी उसके नाम पर ही घर भर के सभी सदस्यों की गुलाबजामुन की पार्टी हो जाती। कितना आदर सम्मान करते बेटे, बहुएं सभी उनका, पोते पोतियों की किलकारियों से घर भर में रौनक रहती थी। फिर अचानक एक दिन पत्नी के सीने में दर्द उठा फिर क्या था ? आज ठीक होगा कल ठीक होगा सोचते सोचते वो दर्द तो ठीक नहीं हुआ,

मगर महिने भर में पत्नी परलोक सिधार गई। बड़े डाक्टर के पास करवाया था इलाज कह रहा था डबल निमोनिया हो गया। एक तो सुनती भी नहीं थी किसी की, न वक्त पर दवाई ही खाती । न ही खाने पीने का परहेज ही करती । आइसक्रीम तो इतनी पसंद थी बच्चों के बहाने खुद ही ढेर सारी चटका लिया करती थी।

जब गुजर गई , छोड़कर चली गई तब शुरू शुरू में तो सब बहुएं बेटे, पड़ोसी, रिश्तेदार,अड़ोस-पड़ोस हमदर्द बने रहे तब इतना अकेला पन महसूस भी तो नहीं हुआ था ।

लेकिन रिटायरमेंट मिलते ही मेरी (हरीश बाबू की) जिंदगी ने उनको कहां से कहां पटक दिया। पहले तो सोचते रिटायरमेंट मिलते ही सारा घन सम्पत्ति बच्चों बहुओं के हवाले कर पोते पोतियों के साथ आराम से ज़िन्दगी काटूंगा । लेकिन वाह री किस्मत सब पलट गया।

रिटायरमेंट में जो पैसा मिला सभी बच्चों में बराबर बांट दिया सोचा था, अपना फर्ज पूरा हुआ। बेटे बहुएं खुश हो जायेंगे। उसकी अच्छी सी खातिर करेंगे दो वक्त गरम गर्म खिला ही देंगे और क्या चाहिए बुढ़ापे में एक अकेले इंसान को ?

मगर ये क्या ? कुछ ही दिनों में घर में पड़े पड़े वो उकताने लगे। शरीर भी बीमारियों का घर बनने लगा । बुढ़ापे की बीमारियों ने तो इतनी जल्दी ही उनको घेर लिया। दवाई तक लाने के लिए वो बेटों बहुओं पर आश्रित से हो गये ‌। पैसा तो पास था नहीं ग्रामीण डाकसेवक होने के नाते सीधी पेंशन तो नहीं ग्रेच्युटी वगैरह जो बेटो के हाथों में दे दी सब, तो अब सब वो उनकी दया पर ही निर्भर होकर रह गये । 

अब तो हमेशा बैठे रहने से उनके घुटने भी जवाब देने लगे थे। अनेक बार सोचते बाहर घूम आयें जाकर, मगर अब अकेले जाने की हिम्मत नहीं रही मन घबराता पोते पोतियों का समूह तो पास भी नहीं फटकता कोई झांकने भर को भी नहीं आता। सब अपनी दुनिया में मस्त होकर रह गये । पहले कैसे सभी समूह बनाकर आ जाते कहते थे ? चलो दादाजी घूमने चलते हैं। आइसक्रीम खाने चलते है । चलो बगीचे में फूटबाल खेलते हैं। और वो भी सभी के साथ कितना आनंद लिया करते थे। इसी सोच के सहारे तो उन्होंने रिटायर मेंट की सारी दौलत परिवार को सौप दी सोचा था “ कितना आनंद आयेगा, जब घन दौलत के झमेलों से अलग होकर वो बच्चों के साथ अपनी मस्त जिंदगी जीयेंगे “।

मगर जैसा सोचो जरूरी नहीं की वैसा ही हो इस ज़िन्दगी में। ठीक वैसा ही हरीश बाबू के साथ भी हुआ। जब तक घन दौलत साथ थी। एक अच्छी नौकरी थी। सबकी आवश्यकता पूर्ति करते थे, ,तब तक सभी साथ थे।और जब वो किसी के लायक नहीं रहे घर वालों की नजर में एक महत्वहीन, बेजान बेकार लापरवाह इंसान बन कर रह गये । आज उनकी सोच ने उनको कहां से कहां लाकर पटक दिया।  वो सोचते हैं…काश वो रिटायरमेंट के बाद अपनी दैनिक दिनचर्या चालू रखते। अपने को कहीं व्यस्त रखते तो कुछ रूपए पैसों को अपने हाथों में रखते तो घर भर मे उनकी भी इज्जत होती सभी सदस्यों के लिए वो महत्वपूर्ण रहते। बड़ों को इज्जत करता देख तभी तो घर के बच्चे भी उनको महत्व देते। 

अभी वो सोच में डूबे हुए तभी घर का पुराना पुस्तैनी नौकर रमिया आया बोला बाबूजी, बाबूजी 

हरीश बाबू चौक पड़े लड़खड़ाती धीमी बुझी सी आवाज में बोले- अरे रमिया क्या हुआ ?

कुछ नहीं बाबूजी ताप है आज हमको बहुत ज्यादा, मुश्किल से चल फिर पा रहे हैं , सोचा आपको कुछ खिला दें कहीं हम बिस्तर में लेट गये तो आप तो भूखे ही रह जायेंगे। लो बाबूजी आप खाना खाइलो ।

हरीश बाबू बोले ना रे रमिया मन नहीं आज बिल्कुल भी खाने पीने का कुछ भारी भारी महसूस हो रहा सीने में।

अच्छा बाबूजी हमने काम निपटा दिया तनिक कमरे में आराम करने जा रहे। आप कहो तो आपको भी कमरे में पहुंचा आयें ।

अरे नहीं रे रमिया अन्दर दम घुटता अभी चांदना है बाहर काफी रात को ही ले जाना अन्दर ।

फिर आह भरते हुए बोले – तू मेरा कितना ख्याल रखता है रे और किसी को तो कोई फ़िक्र नहीं मेरी। उनके लिए तो मैं मरू या जिऊं….हरीश बाबू खींचती हुई आवाज में बोले । जरा सुन पास आ मेरे, पता नहीं फिर बात कर पाऊं तुझसे या नहीं ऐसा कहकर सिरहाने से एक डब्बी निकाल रमिया के हाथ में रख दी ।

रमिया ने खोला एक अंगूठी थी उसमें, अरे बाबूजी ये तो बड़े बाबूजी की निशानी है।

हरीश बाबू लड़खड़ाती आवाज में बोले -हां रे अब और नहीं सम्भाल पाऊंगा ये तेरी सेवा का इनाम है जो तू मेरे लिए कर रहा है। रख ले इसे बड़े यत्न से संभाल रखा है इसे मैंने अब तो  इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकता मैं तुझको ।

रमिया बोला-” कैसी बातें करते हैं ? बाबूजी आप, बहुत दिया आपने, और फिर ये तो हमारा फर्ज है नमक खाये रहे हमारे बाप दादा आपन लोगों का, माई बाप है आप लोग हमारे”।

नहीं रे रमिया, बहुत सेवा की तुमने हमारी, मेरे घर के लोगों से तो तू ही भला मेरा सगा अपना। बड़ा छुपा कर रखा इसे मैंने ले पकड़ रख ले इसे देख मना नहीं करना… मेरा हुक्म समझ कर रख ले इसे ।

तभी रमिया को घर के अन्दर से बड़ी बहु की पुकार सुनाई देती है। अरे रे रमिया जरा सुनो तो ।

रमिया हड़बड़ी में बोला आया बड़ी बीबी… फिर वो अंगूठी ले भरी आँखों से हरीश बाबू को देखते हुए घर के अन्दर चला जाता है।

आज रमिया की तबीयत कुछ ज्यादा खराब ताप जो था उसे शायद इसी वजह से रात हरीश बाबू को कमरे में ले जाने न आ सका । अपनी ही सुध नहीं रही होगी उसे, और हरीश बाबू ज़िन्दगी का आखिरी पड़ाव… वो हार गये अकेले पन से, अपनों के अपने पन से, बेरूखी से और आज मौत जीत गई अन्तिम समय में तो आवाज ने भी साथ नहीं दिया आवाज ही नहीं निकल रही थी गले से चाहकर भी नहीं चीख सके। वैसे भी पुकारते तो भला कौन सुनने वाला था ?  हरीश बाबू अपने एक हाथ से सीना पकड़े- पकड़े वही ढेर हो गये। और फिर रात ऐसे ही बीत गई घर वालों ने तो भोर सवेरे देखा किसी को फुर्सत नहीं रात यह जानने की हरीश बाबू कहां है। कमरे में हैं या लॉन में ही पड़े हैं।

उनकी मौत की खबर से कुछ ही देर में घर भर में मेहमान, रिश्तेदार अड़ोस-पड़ोस मिलने जुलने वालों की पल भर में भीड़ इकट्ठी हो गई। जिनसे मिलने के लिए बरसों से हरीश बाबू तड़फ रहे इन्तजार कर रहे थे। सभी अन्तिम दर्शन को कैसे दौड़े आये ? मानों इसी पल का इन्तजार कर रहे थे!!!

 दोपहर तक घर वालों ने उनका अन्तिम संस्कार कर दिया। हर की जुबान पर एक ही शब्द सुनने को मिल रहा बड़े ही भले इंसान थे हरीश बाबू । भरा-पूरा परिवार छोड़ गये। चलो सुख चैन की जिंदगी जी गये । फिर पंडित, पूजा मंत्र उच्चारण, ब्रह्म ब्राह्मण भोज सब निपटा दिए गये। तीनों बेटे दौड़ दौड़ कर निपटा रहे कर्मकांड कुछ कमी न रह जाए पिता को स्वर्ग की प्राप्ति होनी चाहिए। पोते पोतियां तो मस्त खा पी रहे जैसे घर में कुछ घटित ही नहीं हुआ हो । बस एक तरफ बैठा रमिया बड़बड़ा रहा हमें भी अभी ही बीमार पड़ना था । काश हरीश बाबू के जीते जी ठीक से कर लेते ये घर वाले सेवा टहल तो कम से कम बाबू सब देख चैन,शान्ति से तो मरते । आशीर्वाद ही देकर जाते। भूखे ही मर गये मेरे बाबू… कल तो सारा दिन कुछ भी नहीं खाया था उन्होंने । और ये बेटे मृत भोज में पकवान मिठाईयां बांट रहे खा रहे…अब मरने के बाद किसने देखा ? जो से सब नाटक कर रहे ये घर वाले, कौन सा बाबू जी देखने आ रहे भला, मेरे लिए क्या क्या कर रहे ? क्या नहीं, चले गए मेरे बाबूजी, कहकर फूट-फूटकर बिलखने लगा, उसका ही करूण रूदन सन्नाटे को वेदता जा रहा था!!!

साथियों… ये जिंदगी है जो अनेक पड़ावों से होकर गुजरती है। जब तक इंसान के हाथ पैर चलते रहते हैं। उसके पास अर्थ अर्जन का विकल्प रहता है। उसको छोडना नहीं चाहिए। अर्जन करते रहना चाहिए। पैसा पास होगा तो घर परिवार समाज में रूतबा भी कायम रहेगा ही । नौकरी से रिटायर मेंट का यह मतलब नहीं कि हाथ-पैर दिमाग अचेतन अवस्था में डाल दिया जाये। अपनी सुध-बुध ही खो दी जाये । ठीक है आराम जरूरी है लेकिन शरीर को निष्क्रिय न होने दें। क्योंकि चलते रहने का नाम ही तो जिंदगी है।

लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया 

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