सच्ची अमीरी

लॉन में बैठी मालती देवी बुत बनकर यह पूरा नज़ारा देख रही थीं। उनके हाथों में पकड़ी हुई नीली रजाई अब उन्हें कांटों की तरह चुभने लगी थी। उनकी रईसी, उनका बड़ा घर, और उनके महँगे कपड़े—सब कुछ उस गरीब बंजारन के उस एक कृत्य के सामने बौने पड़ गए थे।  दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड … Read more

बहू भी इस घर का हिस्सा है

अंजलि जब लाल जोड़े में सजी-धजी इस घर की चौखट पर आई थी, तो उसकी सास सुमित्रा देवी ने आरती उतारते हुए बहुत ही मीठे स्वर में कहा था, “बहू, आज से यह घर तुम्हारा है। मेरी तो उम्र हो गई है, अब तुम्हें ही यह पूरी गृहस्थी संभालनी है।” उस दिन अंजलि की आँखों … Read more

एक माँ की दूरदर्शिता

दीनानाथ जी के जीवन का एक बहुत बड़ा अध्याय आज समाप्त हो गया था। आज उनकी सरकारी नौकरी का आखिरी दिन था और उनके सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) का एक छोटा सा समारोह घर पर ही रखा गया था। घर में रिश्तेदारों और परिचितों की चहल-पहल थी, लेकिन अब रात के दस बज चुके थे और लगभग … Read more

आँगन की नई धूप

सुमित्रा जी के हाथों में चाय की दो प्यालियां थीं, जिनसे उठती भाप सुबह की शांति में घुल रही थी। आज रविवार था, छुट्टी का दिन। सुमित्रा जी के कदमों की आहट बहुत धीमी थी, मानो वो इस शांत सुबह की लय को तोड़ना नहीं चाहती थीं। उनके चेहरे पर एक गहरी, अर्थपूर्ण मुस्कान थी, … Read more

पिता के हिस्से का आसमान

  मीरा कल ही अपने पति के साथ रोहन के नए घर को देखने और कुछ दिन साथ बिताने के लिए आई थी। “तूने बाबूजी को रामेश्वरम और तिरुपति के दर्शन करवा कर बहुत बड़ा पुण्य का काम किया है रोहन,” मीरा ने एल्बम का पन्ना पलटते हुए कहा, जिसमें दीनानाथ जी एक मंदिर के प्रांगण … Read more

“पछतावे का दर्द” – कमलेश आहूजा

नेहा किचन में काम कर रही अपनी नंद प्रिया के पास आई उसे लगा,घर में कोई नहीं है तो यही सही समय है प्रिया से बात करने का क्योंकि फिर उसके जेठ जेठानी आने वाले थे।नेहा की सास के पास ज्यादा तो कुछ था नहीं बस थोड़े बहुत जेवर थे,सो वो भी उन्होंने नेहा को … Read more

दर्द जब दवा बन जाए – शुभ्रा बैनर्जी

“अरे मम्मी,इतना बड़ा कट लग गया है चाकू से।खून भी बहुत बह रहा है।तुम छोड़ो ये सब।मैं कर लूंगी।बैन्ड एड लगा लो चलो।” रिद्धि(बेटी) लगभग चीखते हुए बोली।रमा ने हंसकर कहा”अरे,इतना भी गहरा घाव नहीं हुआ है रे।मैं चूना और हल्दी लगा लेती हूं,अभी खून रुक जाएगा।तू इतना घबरा मत।चिल्लाना बन्द कर।”  “अच्छा,घाव ज्यादा नहीं … Read more

दर्द – सुनीता मलिक सोलंकी

“तुमसे मिलना मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत दर्द है, कबीर।”आराधना  ने ये बात उस दिन कही थी, जिस दिन कबीर ने पहली बार उसका हाथ थामा था। मरीन ड्राइव पर समंदर की लहरें किनारे से टकरा रही थीं, और आराधना की आँखें कबीर के चेहरे पर टिकी थीं। कबीर हँस पड़ा था — “दर्द खूबसूरत … Read more

*दर्द* – तोषिका

ये जो तुमने मुझे *दर्द* दिया है ना, मैं इसको कभी भी नहीं भूलूंगी। रोती हुई स्नेहा ने अपने भाई विजय को बोला। *कुछ साल पहले* स्नेहा अपने पूरे परिवार के साथ रहती थी और बहुत ही संस्कारी भी थी, दूसरी तरफ उसका छोटा भाई विजय मस्तीखोर था लेकिन पढ़ाई में भी अच्छा था। दोनों … Read more

“भाई मैं तेरी तरह स्वार्थी नहीं हूं” – सुनीता मलिक सोलंकी 

बागपत  की एक तंग सी गली में दो भाई रहते थे — बड़ा भाई मुकेश और छोटा अनिल । उम्र में पाँच साल का फासला, पर सोच में ज़मीन-आसमान का। उनके पिता जी की परचून की दुकान थी । पिता के बाद  मुकेश ने दुकान संभाल ली। अनिल पढ़ने में तेज़ था, सो पढ़ाई कर  … Read more

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