बहू भी इस घर का हिस्सा है

अंजलि जब लाल जोड़े में सजी-धजी इस घर की चौखट पर आई थी, तो उसकी सास सुमित्रा देवी ने आरती उतारते हुए बहुत ही मीठे स्वर में कहा था, “बहू, आज से यह घर तुम्हारा है। मेरी तो उम्र हो गई है, अब तुम्हें ही यह पूरी गृहस्थी संभालनी है।” उस दिन अंजलि की आँखों में खुशी के आँसू थे। उसे लगा था कि मायके छूटने का जो दर्द वह दिल में लेकर आई है, वह इस नए घर के अपनेपन से भर जाएगा। उसने पूरे मन से सुमित्रा देवी की बात को सच मान लिया और खुद को उस घर की हर ईंट, हर कोने में झोंक दिया।

लेकिन समय के साथ अंजलि को समझ में आने लगा कि ‘गृहस्थी संभालना’ और ‘गृहस्थी पर अधिकार होना’ दो बिल्कुल अलग बातें हैं। शादी के बारह साल बीत जाने के बाद भी अंजलि की स्थिति उस घर में एक बिना पगार वाली मैनेजर जैसी ही थी, जिसके पास काम तो सारे थे, लेकिन फैसले लेने का अधिकार एक भी नहीं।

सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, घर का हर काम अंजलि के हाथों से होता था। रसोई में क्या बनेगा, यह सुमित्रा देवी तय करती थीं। ड्राइंग रूम के पर्दे किस रंग के होंगे, यह सुमित्रा देवी की पसंद से आता था। यहाँ तक कि अंजलि के अपने बेडरूम में चादर कौन सी बिछेगी, इस पर भी सास की बारीक नज़र रहती थी। शुरुआत में अंजलि को लगा कि शायद बड़े-बुजुर्ग हैं, उनका सम्मान रखना चाहिए। लेकिन धीरे-धीरे यह सम्मान एक अदृश्य बेड़ियों में बदल गया। अंजलि अगर रसोई में मसालदानी की जगह भी अपनी सुविधा के अनुसार बदल देती, तो सुमित्रा देवी तुरंत टोक देतीं, “मेरे घर में चीजें जहाँ सालों से रखी हैं, वहीं अच्छी लगती हैं।”

‘मेरे घर में’… यह वाक्य अंजलि के दिल में किसी सुई की तरह चुभता था। जब काम करना होता था, तब घर अंजलि का हो जाता था, और जब कोई बदलाव या फैसला लेना होता था, तो घर सुमित्रा देवी का हो जाता था।

अंजलि का पति विकास एक सीधा और शांत स्वभाव का इंसान था। वह अपनी माँ का बहुत आदर करता था और अपनी पत्नी से भी प्यार करता था। शुरुआत के सालों में जब अंजलि ने विकास से अपनी घुटन का ज़िक्र किया था, तो विकास ने हिम्मत करके एक दिन डाइनिंग टेबल पर अपनी माँ से कह दिया था, “माँ, अंजलि भी अब इस घर का हिस्सा है। अगर वह अपनी पसंद से कुछ करना चाहती है, तो आप उसे करने दिया कीजिए। हर बात में उसे टोकना ठीक नहीं है।”

बस इतना कहना था कि घर में जैसे भूचाल आ गया। सुमित्रा देवी ने खाना छोड़ दिया और रोते हुए बोलीं, “मुझे तो पहले ही पता था कि कल की आई लड़की मेरे बेटे को मुझसे छीन लेगी। अभी से इसे जोरू का गुलाम बना दिया है। मेरी तो अब इस घर में कोई अहमियत ही नहीं रही, मैं तो बस एक बोझ हूँ।”

माँ के इन तीखे शब्दों ने विकास को अंदर तक हिला दिया। उसे लगा कि शायद उसने वाकई अपनी माँ का दिल दुखा दिया है। उस दिन के बाद से विकास ने कभी भी अपनी माँ और अंजलि के बीच में न बोलने की कसम खा ली। जब भी कोई बात होती, वह चुपचाप वहाँ से उठकर चला जाता। पति की इस चुप्पी ने अंजलि को और भी अकेला कर दिया। उसे लगने लगा कि वह सच में एक बिना दिल-दिमाग की कठपुतली है, जिसकी डोर सुमित्रा देवी के हाथों में है।

एक दिन अंजलि का छोटा भाई शहर में किसी काम से आया और उसने कहा कि वह दोपहर का खाना अपनी दीदी के घर खाएगा। अंजलि बहुत खुश थी। उसने सोचा कि वह अपने भाई की पसंद का शाही पनीर और पुलाव बनाएगी। वह सुबह से ही रसोई में तैयारियों में जुट गई।

तभी सुमित्रा देवी रसोई में आईं और कटा हुआ पनीर देखकर बोलीं, “ये क्या बन रहा है? आज तो मंगलवार है, हमारे घर में मंगलवार को सादा खाना और लौकी की सब्जी बनती है। तुम्हारे भाई को खाना है तो वो भी यही खाएगा। मेरे घर के नियम मैं किसी के लिए नहीं बदल सकती।”

अंजलि के हाथों से चाकू छूट गया। बारह सालों का दबा हुआ दर्द, घुटन और अंसतोष आज उसकी आँखों से आँसू बनकर बहने लगा। वह पलटी और बहुत ही शांत लेकिन कांपती हुई आवाज़ में बोली, “माँ जी, एक बात पूछूँ? जब मैं इस घर में आई थी, तो आपने कहा था कि ये घर मेरा है। मैं पिछले बारह सालों से सुबह से रात तक इस घर को अपना मानकर ही संवार रही हूँ। लेकिन आज तक मुझे यह समझ नहीं आया कि मेरा घर आखिर है कहाँ?”

सुमित्रा देवी एकदम से अवाक रह गईं।

अंजलि ने आगे कहा, “अगर मैं अपनी मर्जी से अपने भाई को एक वक्त का खाना नहीं खिला सकती, अपनी मर्जी से इस घर का एक कोना नहीं सजा सकती, तो फिर यह घर मेरा कैसे हुआ? आपने मुझे इस घर की मालकिन नहीं, बल्कि एक ऐसी मशीन बना दिया है जिसे सिर्फ आपके आदेशों पर चलना है। और विकास… वो तो जैसे इस घर में रहते ही नहीं हैं। रिश्तों में संतुलन बनाना उनका भी काम था, लेकिन उन्होंने चुप रहकर मेरे वजूद को ही खत्म कर दिया।”

उसी वक्त विकास भी कमरे से बाहर आ गया था और उसने अंजलि की सारी बातें सुन ली थीं। अंजलि के चेहरे पर आज कोई डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी सच्चाई थी जिसने विकास और सुमित्रा देवी, दोनों को आईना दिखा दिया था। अंजलि ने अपनी बात खत्म की और अपने भाई के लिए खाना बनाने लगी। आज उसने तय कर लिया था कि वह रिश्ते निभाएगी, लेकिन अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को खोकर नहीं। उस दिन के बाद से घर का माहौल तुरंत तो नहीं बदला, लेकिन विकास को अपनी गलती का एहसास हो गया था और सुमित्रा देवी को भी समझ आ गया था कि ‘कठपुतली’ के भी धागे अगर बहुत ज्यादा खींचे जाएँ, तो वो टूट जाते हैं। अंजलि ने अब अपने लिए जीना और बोलना सीख लिया था।

आपको क्या लगता है? क्या शादी के बाद महिलाओं को वास्तव में उनके अधिकार मिल पाते हैं, या उन्हें सिर्फ जिम्मेदारियों के नाम पर छला जाता है? अपनी राय हमें ज़रूर बताएँ।

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