मीरा कल ही अपने पति के साथ रोहन के नए घर को देखने और कुछ दिन साथ बिताने के लिए आई थी।
“तूने बाबूजी को रामेश्वरम और तिरुपति के दर्शन करवा कर बहुत बड़ा पुण्य का काम किया है रोहन,” मीरा ने एल्बम का पन्ना पलटते हुए कहा, जिसमें दीनानाथ जी एक मंदिर के प्रांगण में खड़े मुस्कुरा रहे थे। “उनका चेहरा देख, कितनी तृप्ति है इन आँखों में।”
रोहन ने एक गहरी सांस ली और मुस्कुराकर बोला, “दीदी, इसमें पुण्य कैसा? ये तो हर बेटे का फर्ज़ है। मुझे कुछ दिन की छुट्टी मिली थी, सोचा इसी बहाने बाबूजी को भी घुमा लाऊँ। उन्होंने पूरी जिंदगी हमारे लिए सिर्फ खटकर ही तो गुजारी है। अब अगर मेरे पैसे कमाने के बाद भी वो घर की चारदीवारी में कैद रहें, तो मेरी इस तरक्की का क्या फायदा?”
मीरा ने तस्वीर पर उंगलियाँ फेरीं और उसकी आँखें छलछला आईं। “तेरी बात बिल्कुल सही है मेरे भाई, लेकिन बाबूजी का इस तरह घर से बाहर निकलकर अपनी खुशी के लिए कहीं जाना, सचमुच किसी चमत्कार से कम नहीं है। तू हम तीनों बहनों में सबसे छोटा है। जब तेरा जन्म हुआ, तब तक घर के हालात इतने खराब हो चुके थे कि बाबूजी दिन-रात बस कोल्हू के बैल की तरह काम करते रहते थे। तू अपनी पढ़ाई के लिए नवोदय विद्यालय के हॉस्टल चला गया था। तूने बचपन से वो घुटन और वो अभाव उस तरह से नहीं देखे, जिन्हें हमने जिया है। इसीलिए शायद तू पूरी तरह से नहीं समझ सकता कि बाबूजी का इस तरह मुस्कुराना हमारे लिए कितनी बड़ी बात है।”
रोहन के चेहरे की मुस्कान थोड़ी धीमी पड़ गई। वह गंभीरता से अपनी बड़ी बहन की तरफ देखने लगा। मीरा का गला भर आया था, लेकिन वह बोलती रही, “तुझे पता है रोहन, जब हम तीनों बहनें बड़ी हो रही थीं, तो हम अक्सर खुद को एक बोझ की तरह महसूस करते थे। बाबूजी एक मामूली सी सरकारी नौकरी करते थे। तनख्वाह इतनी कम थी कि महीने की पच्चीस तारीख तक घर का राशन भी खत्म होने लगता था। समाज के लोग, पड़ोसी और यहां तक कि हमारे कुछ अपने रिश्तेदार भी माँ को ताने मारने से नहीं चूकते थे। ‘अरे दीनानाथ, तीन-तीन बेटियां हैं, इनके हाथ पीले करते-करते तुम्हारी तो कमर ही टूट जाएगी,’ ये वाक्य तो जैसे बाबूजी की नियति बन गया था। ऐसे माहौल में माँ हमेशा एक बेटा चाहती थी, सिर्फ इसलिए नहीं कि उन्हें बेटियों से प्यार नहीं था, बल्कि इसलिए ताकि बाबूजी के बुढ़ापे का कोई सहारा बन सके और समाज के ताने बंद हो सकें।”
मीरा ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीं, जैसे वो अतीत के उन कड़वे पलों को फिर से महसूस कर रही हो। “बाबूजी ने कभी हमारे सामने अपनी परेशानी जाहिर नहीं की, लेकिन उनकी फटी हुई बनियान और उनके जूतों के घिसे हुए तलवे उनकी खामोश कहानी कह देते थे। हम बहनों की पढ़ाई, हमारे कपड़े और फिर हमारी शादियों की चिंता ने उन्हें समय से पहले ही बूढ़ा कर दिया था। मुझे आज भी याद है, जब मेरी शादी तय हुई थी, तो बाबूजी ने अपना पुश्तैनी खेत गिरवी रख दिया था। माँ ने अपनी शादी के गहने तक बेच दिए थे। माँ बेचारी सालों-साल उन पुरानी सूती साड़ियों में गुज़ारा करती रही, जो धुल-धुल कर इतनी पतली हो गई थीं कि आर-पार दिखता था। बाबूजी के लिए तो जैसे अपने लिए कुछ सोचना एक बहुत बड़ा गुनाह था। ऐसे में ‘घूमने जाना’ या ‘अपनी इच्छाएं पूरी करना’ तो उनके लिए किसी दूसरी दुनिया की बातें थीं। पैसे को मुट्ठी में इस तरह भींच कर रखते थे जैसे अगर एक रुपया भी फालतू खर्च हो गया तो कोई पहाड़ टूट पड़ेगा। बस, बेटियों के पिता होने की कीमत अपनी हर छोटी-बड़ी खुशी का गला घोंट कर चुकाते रहे।”
मीरा की आँखों से अब आँसू बहकर उसके गालों तक आ गए थे। रोहन ने आगे बढ़कर अपनी बहन के हाथ थाम लिए। “जब तू हॉस्टल में था और बाद में स्कॉलरशिप पर इंजीनियरिंग करने शहर चला गया, तब तक हम तीनों बहनों की शादियां हो चुकी थीं। उन तीन शादियों ने बाबूजी के कंधों को हमेशा के लिए झुका दिया था। माँ तो उन चिंताओं के बोझ तले ही दब कर चली गईं। माँ ने तेरे अफसर बनने का जो सपना देखा था, वो तो पूरा हुआ, लेकिन उसे देखने के लिए वो खुद नहीं रहीं।”
रोहन की आँखों में भी अब नमी तैरने लगी थी। उसने भारी आवाज़ में कहा, “मैं सब जानता हूँ दीदी। हॉस्टल में रहते हुए भी मैं घर की स्थिति से अनजान नहीं था। जब भी मैं घर आता था, मैं देखता था कि बाबूजी कैसे पाई-पाई का हिसाब रखते थे। वो कभी मेरे सामने नहीं कहते थे, लेकिन मुझे पता था कि वो खुद भूखे रहकर मेरे लिए हॉस्टल की फीस भेजते थे। मैंने वो दौर देखा है जब वो रात की पाली में ओवरटाइम किया करते थे ताकि मेरी किताबें आ सकें। जब मैं अकेला होता था, तो बाबूजी के वो घिसे हुए जूते और उनका थका हुआ चेहरा मुझे सोने नहीं देता था। उसी चेहरे ने मुझे ज़िंदगी में कुछ बड़ा करने की ज़िद दी थी। मैंने उसी दिन कसम खाई थी कि जिस दिन मैं अपने पैरों पर खड़ा होऊंगा, मैं बाबूजी के सारे दुख खरीद लूंगा।”
रोहन ने एक गहरी सांस ली और बालकनी की तरफ देखा जहां दीनानाथ जी अभी भी बैठे हुए थे। “आज मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट हूँ दीदी। मेरे पास पैसा है, रुतबा है, लेकिन मुझे सबसे ज्यादा दर्द इस बात का होता है कि माँ ये सब देखने के लिए हमारे बीच नहीं हैं। वो बाबूजी को अकेला छोड़ गईं। दीदी, मैं जानता हूँ कि जो वक्त बीत गया, वो वापस नहीं आ सकता। मैं बाबूजी की जवानी के वो संघर्ष भरे दिन उन्हें वापस नहीं लौटा सकता, लेकिन मैं उनकी बाकी बची हुई ज़िंदगी को इतना खुशहाल बनाना चाहता हूँ कि वो अपने अतीत के सारे दर्द भूल जाएं। मैं उन्हें दुनिया का हर वो सुख देना चाहता हूँ, जिसके वो हक़दार हैं। वो रामेश्वरम की यात्रा सिर्फ एक शुरुआत थी। मैं चाहता हूँ कि वो अब बिना किसी चिंता के जिएं।”
मीरा ने रोहन के माथे को प्यार से चूमा। “तू बहुत अच्छा बेटा है रोहन। मुझे तुझ पर गर्व है। सच में, हम बच्चे ही माता-पिता की सबसे बड़ी खुशी होते हैं, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि वो एक इंसान के तौर पर अपनी खुशियों को ही मार दें। उन्हें भी हक़ है कि वो अपने लिए जिएं, अपने शौक पूरे करें। बस तू बाबूजी का ऐसे ही ध्यान रखना।”
तभी बालकनी के दरवाजे से दीनानाथ जी अंदर आए। उनके हाथ में खाली कप था। रोहन और मीरा को भावुक देखकर वो थोड़ा ठिठके, फिर मुस्कुरा कर बोले, “क्या बात हो रही है भाई-बहन में? जरूर मेरे ही बारे में कुछ शिकायतें चल रही होंगी।”
दीनानाथ जी सोफे पर बैठते हुए बोले, “अरे मीरा, तू ही समझा अपने इस लाड़ले भाई को। पैसों को तो पानी की तरह बहाता है। कल मैं सब्जी लेने गया, तो मुझे कहता है कि कार लेकर जाओ और ड्राइवर को साथ ले जाओ। अरे भाई, दो कदम पर मंडी है, मैं पैदल ही चला जाऊंगा। और तो और, रामेश्वरम ले गया तो हवाई जहाज से! मैंने इसे कितना कहा कि ट्रेन का टिकट ले ले, पैसे बचेंगे, पर मेरी सुनता कहाँ है! बात-बात पर बटुआ खोल कर बैठ जाता है। कल को इसका खुद का परिवार होगा, बच्चे होंगे, ऐसे खर्च करेगा तो कैसे चलेगा?”
दीनानाथ जी की बातों में वही पुरानी चिंता और पैसे बचाने की फिक्र झलक रही थी, लेकिन उनकी आँखों में अपने बेटे के लिए जो असीम प्रेम और गर्व था, वो छुपाए नहीं छुप रहा था।
मीरा ने हंसते हुए अपने पिता के कंधे पर सिर रख दिया और प्यार से बोली, “बाबूजी, आप चिंता करना छोड़ दीजिए। मैंने आपके इस लाड़ले को बहुत अच्छे से समझा दिया है। और आप भी अब ये पैसे बचाने की फिक्र छोड़िए। पूरी ज़िंदगी आपने हमारे लिए एक-एक पैसा जोड़ा है। अब समय आ गया है कि आप अपने इस बेटे की कमाई का आनंद लें। अब से आप बस हुक्म चलाया कीजिए।”
रोहन ने भी अपने पिता के पैर छूते हुए मुस्कुराकर कहा, “हाँ बाबूजी, दीदी बिल्कुल सही कह रही हैं। और अगर आप ऐसे ही कंजूसी करेंगे, तो अगली बार मैं आपको विदेश यात्रा पर ले जाऊंगा, और वो भी सबसे महंगी फ्लाइट से।”
कमरे में तीनों की हंसी गूंज उठी। उस हंसी में बरसों का दर्द, संघर्ष और त्याग जैसे कहीं पीछे छूट गया था और उसकी जगह ले ली थी एक नए, सुनहरे और सुकून भरे कल ने। दीनानाथ जी ने अपने दोनों बच्चों को गले लगा लिया, और इस बार उनकी आँखों से छलकने वाले आँसू किसी बेबसी के नहीं, बल्कि परम संतोष और खुशी के थे।
आपकी राय:
दोस्तों, क्या आपके माता-पिता ने भी आपको एक बेहतर ज़िंदगी देने के लिए अपनी इच्छाओं को मारा है? उनके जीवन का ऐसा कौन सा त्याग है जो आज भी आपको भावुक कर देता है? हमें अपने विचार और अनुभव कमेंट सेक्शन में ज़रूर बताएं, हमें आपकी कहानियाँ पढ़कर खुशी होगी।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।
लेखिका : गरिमा चौधरी