नेहा किचन में काम कर रही अपनी नंद प्रिया के पास आई उसे लगा,घर में कोई नहीं है तो यही सही समय है प्रिया से बात करने का क्योंकि फिर उसके जेठ जेठानी आने वाले थे।नेहा की सास के पास ज्यादा तो कुछ था नहीं बस थोड़े बहुत जेवर थे,सो वो भी उन्होंने नेहा को दे दिए थे।उसने बहुत मना भी किया,
कि माँ इस पर तो दीदी का अधिकार है पर वो नहीं मानी तो नेहा ने उनकी अमानत समझकर जेवर अपने पास रख लिए।प्रिया के छोटे भाई भाभी रोहन और नेहा ने माँ की बहुत सेवा की और उसे अंत तक अपने पास रखा।जबकि उसकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी।
वहीं बड़े भैया भाभी अपनी सारी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़कर अलग हो गए थे।उनके पास ईश्वर की दया से कोई कमी नहीं थी।अच्छा खासा बिजनेस था।बस दिल ही नहीं था उनके पास।प्रिया माँ की बरसी पर मायके आई थी इसलिए नेहा ने सोचा अब समय आ गया है
माँ की अमानत को सही हाथों में सौंपने का।क्योंकि सास की मौत के समय उसके पास इन सब बातों का समय ही नहीं था..दूसरा जेवर भी लॉकर में पड़े थे।प्रिया भी ज्यादा नहीं रूकी थी क्योंकि उसके बच्चों की परीक्षाएं चल रही थीं।
बीच में प्रिया एक आध बार आई भी तो नेहा को याद नहीं रहा।इसलिए उसने सोचा था,कि सास की बरसी पर वो प्रिया को जेवर दे देगी।उसने याद से जेवर लॉकर से निकलवाकर रख लिए थे।
“दीदी,ये माँ के कुछ जेवर हैं,रख लो।इस पर आपका हक बनता है।” नेहा प्रिया के हाथ में एक छोटी सी पोटली थमाते हुए बोली।
“नहीं नेहा,मैं ये सब नहीं ले सकती।इसकी हकदार सिर्फ तुम हो।मैंने तो बस माँ की कोख से जन्म लिया था।तुमने तो न सिर्फ माँ की सेवा की,बल्कि बहू होने की सारी जिम्मेदारियाँ भी निभाईं।स्वयं तंगी में रहकर भी मेरे ससुराल वालों को लेने देने में कोई कोताही नहीं की।माँ के न रहने पर मुझे कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी।”
प्रिया भावुक होते हुए बोली।अभी प्रिया की बात खत्म भी नहीं हुई थी,कि अचानक से बड़े भैया भाभी आ गए।पता नहीं बाहर का दरवाजा कैसे खुला रह गया,दोनों सीधे किचन में ही आ गए।प्रिया को ऐसा लगा,जैसे उन्होंने उसकी बातें सुन ली थीं।तभी दोनों ने हाय,हैलो कुछ नहीं बोला।
भाभी का तो मुँह फूला हुआ था। प्रिया ही आगे बढ़कर बोली-“नमस्ते भैया..नमस्ते भाभी।कैसे हो आप लोग?”भैया ने उत्तर में बोला,हम सब ठीक हैं,पर भाभी तंज कसते हुए बोली-“नेहा,नंद को ही माँ के सब जेवर दे दोगी,या फिर बड़ी भाभी के लिए भी कुछ रखोगी?”रोहन भी बाजार से आ गया उसने भाभी की बात सुन ली थी..पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी…
बल्कि भैया भाभी के पैर छुए और उनका हाल चाल पूछा।एक तो भाभी ने जो माँ के साथ किया,उसको लेकर प्रिया पहले ही दुखी थी।उसपर उनकी ये बात सुनकर तो उसे बहुत गुस्सा आया वो तमतमाते हुए बोली -“भाभी नाम से कोई बड़ा नहीं हो जाता।बड़ा होने के लिए बड़ों जैसे काम भी करने पड़ते हैं। आपने कभी बड़ी बहू होने का फर्ज नहीं निभाया।
सारी जिम्मेदारियों का बोझ देवरानी के ऊपर डालकर अलग हो गईं।सास इतने समय से बीमार थी,कभी खोज खबर नहीं ली और अब आप चाहती हैं,कि माँ के जेवर में से आपको भी हिस्सा मिले।और भैया आपने भी हमेशा भाभी का ही साथ दिया कभी माँ के बारे में नहीं सोचा।”
“दीदी,भाभी ठीक कह रही हैं।भाभी ही तो इस घर की बड़ी बहू हैं,उनका भी हर चीज़ पर उतना ही हक है।”नेहा बात को संभालते हुए बोली।
“देखो,भाभी इसे कहते हैं बड़प्पन! नेहा आपके होते हुए भी ससुराल की सारी जिम्मेदारियाँ स्वयं बिना किसी चाहत के,खुशी खुशी निभाती रही और आज अपना हिस्सा भी अपको देने के लिए राजी है।” “तुम सब अभी ये बेकार की बातें छोड़ो बाद में सोचेंगे क्या करना है..पहले कल का कार्यक्रम ठीक ठाक हो जाए ये ज्यादा जरूरी है।”प्रिया के बड़े भैया बोले।
नेहा को जिस चीज का डर था वही हुआ..उसकी जेठानी अपने पति की बांह पकड़कर बोली-“चलो जी जहां बड़ों की इज्जत न हो वहां रुककर क्या करना है?रख लेने दो इन लालचियों को सारे जेवर मुझे नहीं चाहिए।”बात बिगड़ने लगी तो रोहन भाभी के पैर पकड़ते हुए बोला -“भाभी,दीदी की तरफ से मैं आपसे माफी मांगता हूं..आप जैसा कहेंगी वैसा होगा..बस आप नाराज मत हो और जैसे तैसे कल का दिन शांतिपूर्वक निकलवा दो।
“प्रिया की भाभी ने किसी की एक ना सुनी और पैर पटकती हुई अपने घर चली गई।बड़े भैया बेबस लाचार से खड़े थे और छोटे भाई की आंखों में आंसू थे ये सब देखकर प्रिया भी रोने लगी और रोते रोते बोली -“भैया,काश!आप मुझे समझ पाते!तो आज ये स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।
मैंने कितनी बार अपको फोन पर समझाया था,कि कभी कभी माँ को अपने पास रहने के लिए बुला लिया करो..आखिर आप भी उनके बेटे हो आपका भी फर्ज बनता है पर आपने मेरी बात को कभी गंभीरता से नहीं लिया और बस अपने परिवार में व्यस्त रहे..ये सब देखकर भाभी के हौसले बढ़ते गए
इसलिए उन्होंने कभी माँ को अपने साथ नहीं रखा..अब आप ही बताओ जो बेचारी दिन रात बिना किसी लालच के सास की सेवा करती रही उसे माँ के जेवर मिलने चाहिए या फिर उसे जिसने कभी सास की परवाह नहीं की।भैया नेहा तो बल्कि वो जेवर मुझे दे रही थी उस बेचारी ने तो कभी अपना हक नहीं मांगा।”
“तू सच कह रही है मेरी बहना..मेरी ही गलती थी …मैंने ही तेरी भाभी की बातों में आकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया..सब कुछ होते हुए भी मैं माँ के लिए कुछ नहीं कर पाया और सारा बोझ अपने छोटे भाई पर डाल दिया.. काश !समय रहते मैं तेरी बातों को समझ जाता।”कहकर बड़े भैया भी रोने रोने लगे।प्रिया और रोहन ने बड़े भैया को गले से लगा लिया।
नेहा बोली -“चलो सब मिलकर भाभी को मनाकर घर लेकर आते हैं..कल सब रिश्तेदार आएंगे और भाभी नहीं होंगी तो उनके बारे में सब पूछेंगे..फिर बेकार की बाते करेंगे।” “तुम लोगों को जाना है तो जाओ पर मैं नहीं जाऊंगा..जिंदगीभर उसकी मनमानी झेलता रहा बस अब नहीं सहूंगा।लोगों को जो कहना है कहें।”बड़े भैया गुस्से से बोले।
प्रिया रोहन और नेहा संग जाकर भाभी को मना लाई।दूसरे दिन बरसी का कार्यक्रम विधि विधान से सम्पन्न हो गया।रोहन बरसी में जो जो खर्चा हुआ था उस सबका पैसा दे ही रहा था,कि प्रिया के बड़े भैया ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोले -“छोटे..अब तक तूने सारी जिम्मेदारियां निभाईं हैं
ये मुझे निभाने दे..जितना खर्च हुआ है वो सब मैं दूंगा.. वरना मैं अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।” प्रिया ने भी भैया की बात में अपनी सहमती जताई।भैया ने बरसी का सारा खर्चा चुकाया और प्रिया नेहा और रोहन को गले लगाते हुए बोले -“अब से तुम सब मेरी जिम्मेवारी हो।”
इधर प्रिया की बड़ी भाभी ने भी अपने किए की देवर और देवरानी से माफी मांगी।फिर से अपने परिवार को एक साथ देख प्रिया की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।वो मन ही मन मां को याद करते हुए बोली-“काश !भैया माँ के रहते ही अपनी जिम्मेदारियां समझ पाते तो वो दुखी होकर इस संसार से नहीं जाती
।आज घर तो फिर से जुड़ गया,लेकिन मां वापस नहीं आ सकतीं।उनके हिस्से का अकेलापन,उनकी अनदेखी और उनकी अधूरी इच्छाएं हमेशा हमारे दिलों में चुभती रहेंगी।समय बीत जाता है,रिश्ते संभल भी जाते हैं,लेकिन अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ने का जो पछतावा मन में रह जाता है,वही जीवन का सबसे बड़ा दर्द बन जाता है।”
दोस्तों माता-पिता जीवनभर हमारे लिए जीते हैं। इसलिए उनके रहते हुए उन्हें समय, सम्मान और अपनापन देना ही हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है, क्योंकि उनके जाने के बाद बचता है तो केवल यादों का सहारा और मन में पलता हुआ एक गहरा दर्द।
कमलेश आहूजा