एक माँ की दूरदर्शिता

दीनानाथ जी के जीवन का एक बहुत बड़ा अध्याय आज समाप्त हो गया था। आज उनकी सरकारी नौकरी का आखिरी दिन था और उनके सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) का एक छोटा सा समारोह घर पर ही रखा गया था। घर में रिश्तेदारों और परिचितों की चहल-पहल थी, लेकिन अब रात के दस बज चुके थे और लगभग सभी मेहमान जा चुके थे। घर में एक अजीब सी शांति छा गई थी। डाइनिंग टेबल के पास कुर्सी पर बैठे दीनानाथ जी की आँखों के सामने बार-बार अपनी बेटी नीता का चेहरा घूम रहा था, जो कुछ ही देर पहले अपने पति विकास और सात साल के बेटे रियांश के साथ अपने घर के लिए निकली थी।

नीता जब विदा ले रही थी, तब दीनानाथ जी की पारखी नज़रों ने बहुत कुछ ऐसा देख लिया था जो एक पिता के कलेजे को छलनी करने के लिए काफी था। नीता ने जो साड़ी पहनी थी, वह वही साड़ी थी जो पिछले साल दीवाली पर उन्होंने ही उसे दिलवाई थी। साड़ी की चमक अब फीकी पड़ने लगी थी। रियांश, जो उनका नाती था, उसके जूते आगे से घिस चुके थे और विकास हमेशा की तरह एक महंगे ब्रांडेड शर्ट और नई स्मार्टवॉच के साथ किसी झूठे रौब में दिख रहा था। नीता ने पूरे कार्यक्रम में एक बार भी किसी चीज़ की शिकायत नहीं की। उसने हंसकर सब काम किया, मेहमानों को खाना परोसा, लेकिन उसकी वह हंसी उसकी आँखों तक नहीं पहुँच रही थी। बेटियां भले ही अपने होंठ सिल लें, लेकिन उनके चेहरे की उदासी समझदार माता-पिता से कभी छिप नहीं पाती।

रात के खाने के बाद, जब दीनानाथ जी का बेटा सुशांत और उनकी पत्नी कावेरी देवी हॉल में आए, तो दीनानाथ जी ने उन्हें अपने पास बैठने का इशारा किया। माहौल में एक गंभीर खामोशी थी। दीनानाथ जी ने एक लंबी सांस ली और अपनी पत्नी कावेरी और बेटे सुशांत की तरफ देखते हुए कहा, “आज मेरे बैंक खाते में मेरी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई का पैसा आ गया है। पीएफ और ग्रेच्युटी मिलाकर अच्छी खासी रकम है। हमारे बुढ़ापे के लिए मेरी पेंशन ही काफी है और सुशांत भी अब अपनी नौकरी में अच्छी जगह पर है। लेकिन… मुझे नीता की बहुत चिंता है।”

सुशांत जो अपने पिता के मन की बात शायद पहले ही भांप चुका था, उसने धीरे से कहा, “क्या हुआ पिताजी? आप नीता दीदी के बारे में क्यों सोच रहे हैं?”

दीनानाथ जी की आवाज़ में एक पिता की पीड़ा साफ़ झलक रही थी, “नीता कभी अपने मुंह से कुछ नहीं मांगती और न ही कभी अपने ससुराल की बुराई करती है। लेकिन मैं अंधा नहीं हूँ। मैं जानता हूँ कि विकास उसे वह ख़ुशी और सम्मान नहीं देता जिसकी वह हक़दार है। मैंने आज भी देखा, नीता और रियांश दोनों ने वही कपड़े पहने थे जो हम लोगों ने उन्हें त्योहारों पर दिए थे। विकास अपने शौक पूरे करने में कोई कसर नहीं छोड़ता, लेकिन अपनी पत्नी और बच्चे की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए उसकी जेब खाली हो जाती है। मैं अपने रिटायरमेंट के इन पैसों में से अपनी बेटी के लिए कुछ ऐसा करना चाहता हूँ जिससे उसका और रियांश का भविष्य सुरक्षित हो सके।”

कावेरी देवी शांत बैठी सब सुन रही थीं। सुशांत ने भी हामी भरते हुए कहा, “पिताजी, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। कई बार मेरा भी मन किया है कि मैं दीदी और माँ से इस बारे में बात करूँ। पिछली बार जब रियांश के स्कूल की फीस भरने का समय आया था, तो मैंने दीदी को छिपकर पैसे देने की कोशिश की थी, लेकिन दीदी ने यह कहकर मना कर दिया कि विकास को बुरा लगेगा। विकास जी कभी जिम्मेदारी नहीं लेते। आप बताइए पिताजी, आप क्या सोच रहे हैं? हम दीदी की मदद कैसे कर सकते हैं?”

दीनानाथ जी ने अपना चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और एक ठोस निर्णय लेते हुए बोले, “मैं सोच रहा हूँ कि नीता के नाम से बैंक में पंद्रह लाख रुपये की एक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करवा दूँ। या फिर एक ऐसा खाता खुलवा दूँ जिसमें से हर महीने एक निश्चित ब्याज नीता को मिलता रहे। इससे कम से कम रियांश की पढ़ाई का खर्च आसानी से निकलता रहेगा और नीता को किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।”

सुशांत को यह विचार बहुत अच्छा लगा। उसने तुरंत कहा, “यह बहुत बढ़िया रहेगा पिताजी। दीदी के पास अपना एक आर्थिक सहारा होगा तो उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।” सुशांत ने अपनी माँ की तरफ देखा जो अभी तक खामोश थीं, “क्यों माँ, आपका क्या विचार है? क्या पिताजी का यह फैसला ठीक रहेगा?”

कावेरी देवी, जिन्होंने दुनिया को बहुत करीब से देखा था और जो रिश्तों की बारीक उलझनों को किसी भी पुरुष से ज्यादा बेहतर समझती थीं, उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ठीक किया और एक गहरी सांस लेते हुए बोलीं, “तुम बाप-बेटे की भावनाएं अपनी जगह बिल्कुल सही हैं। नीता हमारी बेटी है और उसकी तकलीफ मुझसे ज्यादा कौन समझेगा? लेकिन… नकद पैसा या फिक्स्ड डिपॉजिट नीता के नाम पर करना सबसे बड़ी बेवकूफी होगी।”

दीनानाथ जी और सुशांत दोनों चकित रह गए। दीनानाथ जी ने हैरानी से पूछा, “बेवकूफी? इसमें बेवकूफी कैसी कावेरी? पैसा नीता के नाम रहेगा तो उसी के काम आएगा ना!”

कावेरी देवी ने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में समझाना शुरू किया, “आप अपनी बेटी को तो जानते हैं, लेकिन अपने दामाद की फितरत को नहीं पहचानते। मान लीजिए आपने पंद्रह लाख रुपये नीता के खाते में डाल दिए। आपको क्या लगता है कि विकास को इसकी भनक नहीं लगेगी? जैसे ही उसे पता चलेगा कि नीता के पास इतनी बड़ी रकम है, उसकी नीयत डोल जाएगी। वह अचानक से कोई नया व्यापार शुरू करने का नाटक करेगा या घर में कोई झूठी मजबूरी खड़ी कर देगा। वह नीता पर भावनात्मक दबाव बनाएगा। कहेगा कि ‘क्या तुम मुझ पर भरोसा नहीं करती?’, ‘क्या तुम्हारे मायके वाले मुझे भिखारी समझते हैं?’ नीता हमारी संस्कारी बेटी है, वह कभी अपना घर नहीं टूटने देगी और पति के दबाव में आकर वह सारे पैसे विकास के हाथ में रख देगी। और विकास… वह उस पैसे को कुछ ही महीनों में उड़ा देगा। उसके बाद नीता की स्थिति पहले से भी बदतर हो जाएगी क्योंकि तब वह पैसे माँगने का ताना भी सुनेगी।”

सुशांत को अपनी माँ की बातों में एक कड़वी सच्चाई नज़र आ रही थी। उसने पूछा, “तो फिर हम क्या करें माँ? क्या दीदी को ऐसे ही घुट-घुट कर जीने दें?”

कावेरी देवी की आँखों में एक अनुभवी माँ की दूरदर्शिता चमक उठी। उन्होंने कहा, “हम पैसा जमा करने के बजाय शहर के उस नए इलाके में एक टू-बीएचके (2BHK) का फ्लैट खरीदेंगे। उस फ्लैट को हम तुरंत किराए पर चढ़ा देंगे। उस फ्लैट से हर महीने जो पंद्रह-बीस हजार रुपये किराया आएगा, वह सीधे रियांश के स्कूल के खाते में और नीता के एक ऐसे गुप्त खाते में जाएगा जिसका एटीएम हमारे पास या नीता के पास छिपा हुआ रहेगा। लेकिन सबसे बड़ी बात… वह फ्लैट नीता के नाम पर नहीं लिया जाएगा। वह फ्लैट या तो आपके (दीनानाथ जी) नाम पर होगा, या फिर सुशांत के नाम पर।”

यह सुनकर दीनानाथ जी का माथा ठनक गया। उन्हें यह बात कुछ अजीब लगी। “ऐसा क्यों कावेरी? जब हम वह संपत्ति नीता के लिए ही ले रहे हैं, तो उसके नाम से लेने में क्या हर्ज़ है? क्या तुम्हें अपनी ही बेटी पर भरोसा नहीं है? अगर कल को हम नहीं रहे या सुशांत के मन में बेईमानी आ गई, तो हमारी बच्ची का क्या होगा?”

सुशांत को भी अपनी माँ की यह बात कुछ अटपटी लगी थी। उसने कहा, “हाँ माँ, पिताजी सही कह रहे हैं। मैं अपनी दीदी का हक कभी नहीं मारूंगा, लेकिन संपत्ति दीदी के नाम होगी तो उन्हें ज्यादा सुरक्षित महसूस होगा।”

कावेरी देवी हल्की सी मुस्कुराईं, एक ऐसी मुस्कान जिसमें ज़िंदगी का बहुत बड़ा फलसफा छिपा था। उन्होंने अपने पति का हाथ अपने हाथों में लिया और अत्यंत कोमलता से बोलीं, “मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है, और अपने बेटे सुशांत पर भी। लेकिन मुझे नीता के हालात और उसके पति पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। आप लोग व्यावहारिक होकर सोचिए। अगर फ्लैट नीता के नाम पर हुआ, तो कानूनी रूप से विकास उसका पति है। वह जब चाहे, नीता को डरा-धमका कर या इमोशनल ब्लैकमेल करके उस फ्लैट को बिकवा सकता है। नीता चाहकर भी उसे रोक नहीं पाएगी क्योंकि उसे अपना सुहाग और अपना घर बचाना होगा। विकास उस फ्लैट को बेचकर पैसे उड़ा देगा और हमारी बेटी फिर सड़क पर आ जाएगी।”

कावेरी देवी ने आगे कहा, “लेकिन अगर वह फ्लैट आपके या सुशांत के नाम पर रहता है, तो विकास चाहकर भी उसे बेच नहीं सकता। वह उस संपत्ति को छू भी नहीं सकता क्योंकि कानूनी रूप से उस पर उसका या नीता का कोई अधिकार नहीं होगा। रही बात नीता की सुरक्षा की, तो जब तक फ्लैट हमारे नाम है, हम उसका पूरा किराया बिना किसी रोक-टोक के नीता को देते रहेंगे। विकास को अगर पता भी चल गया कि किराया आ रहा है, तो वह ज्यादा से ज्यादा किराए के पैसे खर्च करवा पाएगा, लेकिन हमारी मूल संपत्ति (फ्लैट) हमेशा सुरक्षित रहेगी। और सुशांत पर मुझे अपनी जान से ज्यादा भरोसा है कि हमारे बाद भी वह अपनी दीदी के लिए उस फ्लैट से आने वाले पैसे को कभी नहीं रोकेगा। ब्याज की दरें तो घटती-बढ़ती रहती हैं, लेकिन प्रॉपर्टी की कीमत समय के साथ बढ़ेगी ही। कल को जब रियांश बड़ा होगा और उसकी उच्च शिक्षा या नीता के जीवन में कोई बड़ा संकट आएगा, तब वह फ्लैट एक ढाल बनकर खड़ा होगा।”

कमरे में कुछ पलों के लिए एकदम सन्नाटा छा गया। दीनानाथ जी की आँखों से एक आंसू छलक कर उनके गाल पर आ गिरा। उन्होंने कावेरी देवी की तरफ ऐसी नज़रों से देखा जैसे उन्हें कोई देवी मिल गई हो। एक पिता केवल अपनी बेटी का आज संवारना चाहता था, लेकिन एक माँ ने अपनी बेटी का कल, परसों और पूरा जीवन सुरक्षित कर दिया था। सुशांत ने भी अपनी माँ के आगे सिर झुका लिया।

“तुमने आज मेरी आँखें खोल दीं कावेरी,” दीनानाथ जी का गला भर आया था। “एक औरत ही दूसरी औरत की पीड़ा और उसके सामाजिक बंधनों को इतनी गहराई से समझ सकती है। हम बिल्कुल वैसा ही करेंगे जैसा तुमने कहा है। हम कल ही प्रॉपर्टी डीलर से बात करेंगे और सुशांत के नाम पर एक फ्लैट बुक करेंगे।”

कुछ ही हफ़्तों में एक सुंदर सा फ्लैट खरीद लिया गया। उसे एक अच्छे परिवार को किराए पर भी दे दिया गया। कावेरी देवी ने एक दिन नीता को मायके बुलाया। जब नीता आई, तो कावेरी ने उसे अपने कमरे में ले जाकर रियांश की स्कूल फीस की सारी रसीदें और एक नया बैंक पासबुक उसके हाथों में रख दिया, जिसमें किराए का पैसा आना शुरू हो गया था।

कावेरी ने नीता के सिर पर हाथ फेरते हुए सिर्फ इतना कहा, “मेरी बच्ची, तुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। हम जानते हैं कि तू किस दौर से गुज़र रही है। यह तेरा हक़ है, और इसे कोई तुझसे नहीं छीन सकता। तेरा भाई और तेरे पिता हमेशा तेरे पीछे खड़े हैं, एक अदृश्य दीवार बनकर।”

नीता, जो सालों से अपने अंदर आंसुओं का समंदर दबाए बैठी थी, आज अपनी माँ के गले लगकर फूट-फूट कर रो पड़ी। वह समझ गई थी कि उसके माता-पिता ने न केवल उसकी आर्थिक मदद की है, बल्कि उसके आत्मसम्मान और उसके भविष्य को उसके पति के लालच से हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया है। विकास को कुछ समय बाद पता तो चला कि नीता के मायके वालों ने कोई प्रॉपर्टी ली है और उसका कुछ पैसा नीता को मिल रहा है, लेकिन जब उसे यह मालूम हुआ कि प्रॉपर्टी सुशांत के नाम पर है, तो वह चाहकर भी कोई चाल नहीं चल पाया।

एक माँ की दूरदर्शिता ने बिना कोई शोर मचाए, बिना बेटी का घर तोड़े, अपनी बच्ची की दुनिया संवार दी थी।

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