स्मृतियों की गूंज और एक प्याली चाय
कैलाश बाबू ने लैंडलाइन का रिसीवर जैसे ही क्रैडल पर रखा, उनके चेहरे पर एक पुरानी, जानी-पहचानी मुस्कान तैर गई। उनके मुंह से आदतन और बड़े ही उत्साह के साथ निकला, “अरे सावित्री, सुन रही हो? लखनऊ से अपने रमेश बाबू का फोन था, उनकी छोटी बेटी की शादी तय हो…” शब्द उनके होंठों पर … Read more