एक गाँव में नीलम नाम की एक लड़की रहती थी। उसके पिता बढ़ई थे और माँ सिलाई का काम करती थीं। उनका घर बहुत छोटा था। घर में केवल दो कमरे थे और सुविधाएँ भी बहुत कम थीं। लेकिन उस घर में प्रेम, सम्मान और अपनापन इतना था कि वहाँ आने वाला हर व्यक्ति खुश होकर लौटता था।
नीलम की सबसे अच्छी मित्र प्रिया थी। प्रिया के पिता एक बड़े व्यापारी थे। उनका घर बहुत विशाल और सुंदर था। संगमरमर की फर्श, महंगे पर्दे और आधुनिक सजावट देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे।
एक दिन प्रिया ने नीलम को अपने घर बुलाया। नीलम वहाँ गई तो उसने देखा कि घर बहुत बड़ा था, लेकिन घर के सदस्य एक-दूसरे से बहुत कम बात करते थे। सब अपने-अपने कमरों में व्यस्त रहते थे। भोजन भी अलग-अलग समय पर करते थे। घर में शांति तो थी, पर खुशी नहीं थी।
कुछ दिनों बाद प्रिया नीलम के घर आई। शाम का समय था। नीलम के पिता काम से लौटे थे। पूरा परिवार एक साथ बैठकर चाय पी रहा था। सब अपने दिनभर के अनुभव बाँट रहे थे। कभी हँसी की आवाज़ आती, तो कभी किसी की मदद की बात होती। घर छोटा था, लेकिन माहौल बहुत सुखद था।
प्रिया को वहाँ बहुत अच्छा लगा। उसने पहली बार महसूस किया कि परिवार के साथ बैठकर बातें करने में कितना आनंद आता है।
घर लौटकर उसने अपनी माँ से पूछा, “माँ, हमारा घर इतना बड़ा है, फिर भी नीलम के घर जैसी खुशी यहाँ क्यों नहीं है?”
माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “बेटी, हमने घर को सुंदर बनाने पर बहुत ध्यान दिया, लेकिन रिश्तों को समय देना भूल गए। घर की सुंदरता उसकी दीवारों से नहीं, उसमें रहने वाले लोगों के प्रेम से बढ़ती है।”
उस दिन के बाद प्रिया ने अपने परिवार को एक साथ बैठने और समय बिताने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे सबने अपने व्यस्त कार्यक्रम से थोड़ा समय परिवार के लिए निकालना शुरू किया। अब वे साथ भोजन करते, बातें करते और त्योहार मिलकर मनाते।
कुछ महीनों बाद उनके घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। अब वहाँ भी हँसी और अपनापन दिखाई देने लगा।
एक दिन प्रिया ने नीलम से कहा, “अब मैं समझ गई हूँ कि घर बड़ा होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। असली खुशी तो परिवार के प्यार में होती है।”
नीलम मुस्कुराकर बोली, “हाँ, क्योंकि घर ईंटों और पत्थरों से नहीं, दिलों से बनता है।”
उस दिन दोनों मित्रों ने यह सीख हमेशा याद रखने का संकल्प लिया।
शिक्षा:
सच्चा घर वह है जहाँ प्रेम, विश्वास, सम्मान और अपनापन हो। बड़ी इमारतें केवल मकान होती हैं, लेकिन जुड़े हुए दिल उन्हें घर बनाते हैं। इसलिए कहा जाता है— “घर ईंटों से नहीं, दिलों से बनता है।”.
शशि नरूला
अमृतसर