प्रकाश के पापा, मुझे लगता है कि वसीयत लिखकर वकील के पास रखने में ही ठीक रहेगा वरना प्रभात की बहू हमारे मरते ही तुरंत घर- जमीन के दो टुकड़े करवा देगी और औने-पौने दाम में बिकवा कर चलती बनेगी।
हाँ, कह तो तुम ठीक रही हो पर क्या दोनों बेटियाँ अपना हिस्सा लेंगी? वे # रिश्तों की कीमत अच्छी तरह जानती है इसलिए मुझे नहीं लगता कि मायके में अपना हिस्सा लेंगी।
अजी, बच्चे तो चारों ही भगवान् की दया से बड़े भले और नेक हैं…. प्रकाश की बहू भी दिल की साफ है पर ये जो मथुरा वाली है ना….. इसे तो बस अपना आदमी, अपने बच्चे और आपा दिखता है…. बाकी जाएँ भाड़ में।
यही तो चिंता है मुझे , कि घर की सारी जिम्मेदारी तो प्रकाश और सुनीता निभाते हैं पर जब रुपये- पैसे के हिस्से की बात आती है तो प्रभात के बोलने से पहले शैली फैसले करती है……. चलो इस बार मौका निकालकर दोनों बेटों से बात करुँगा। चलो उठो, सुनीता चाय बनाकर इंतज़ार कर रही होगी, आज तो बातों में लगकर देर हो गई। पार्क में से ज्यादातर लोग जा चुके हैं।
कोई बात नहीं, हमें कौन सा कहीं काम पर जाना है। अब तो एक साथ घूमने-फिरने का मौका मिला है।
इतना कहकर दिनकरजी की पत्नी श्यामा जी बैंच से उठी और पति के साथ घर की तरफ चल दी।
सात साल पहले दिनकरजी दिल्ली जल बोर्ड से क्लर्क के पद से रिटायर हुए थे। दो बेटे और दो बेटियाँ थी। सबसे बड़ा बेटा प्रकाश शुरू से ही पढ़ने- लिखने में बहुत कमजोर था, बस जोड़ तोड़ करके एक प्राइवेट कंपनी में छोटी सी नौकरी हासिल कर पाया। दोनों बेटियाँ बैंक में कार्यरत थी और छोटा बेटा प्रभात इंजीनियर था और बहुत अच्छी कंपनी में काम करता था। छोटी बहू शैली गवर्नमेंट काॅलेज में लेक्चरर लगी थी।
बड़े बेटे की आमदनी भले ही कम थी पर इंसानियत कूट कूट कर भरी थी। माता-पिता और भाई-बहनों के प्रति जिम्मेदारी हो या नाते-रिश्तेदारी…. दोनों पति-पत्नी पूरे दिल से हर कार्य को करते थे। तीज-त्योहार पर महीना पहले ही सुनीता ननदों और बुआ सास के रीति-रिवाज निभाने की बात करने लगती थी।
उधर शैली कभी अपनी ही ननदों का जिक्र नहीं करती थी तो बुआ सास तो दूर की बात थी। उसे तो इस बात की भी परेशानी थी कि ससुर की पेंशन से जेठ का घर चलता है, उनका पूरा वेतन तो बैंक में जमा हो रहा है। एक दो बार श्यामा जी ने टोकते हुए कहा —
चल हम दोनों को तू अपने साथ ले चल….. पर हमारे पीछे रिश्ते दार और मेहमान भी है….., तब बताना कि बैंक में कितना पैसा जुड़ता है तेरा….. लेकिन वो कभी सास-ससुर को अपने साथ लेकर गई ही नहीं…..
धीरे-धीरे समय गुजरा और गर्मियों की छुट्टियां पड़ गई….. यही वो समय था जब दिनकरजी जोर देकर अपने बच्चों को पूरे परिवार के साथ कम से कम हफ्ता दस दिन एक साथ गुजारने के लिए बुलाते थे। उनका मानना था कि आजकल समय किसी के पास नहीं होता लेकिन अगर आने वाली पीढ़ी को परिवार और रिश्तों की कीमत नहीं बताएँगे तो चाचा-ताऊ-बुआ, मामा-मौसी के रिश्ते समाप्त हो जाएँगे।
इस बार दोनों दामाद तो चार-पाँच दिनों के बाद वापस लौट गए पर बेटियों को एक ओर हफ्ते के लिए रोक लिया।
एक दिन श्यामा जी ने दोनों बेटियों से वसीयत के बारे में बात करते हुए बताया कि वे चारों बच्चों में समान रूप से बँटवारा करना चाहते हैं…..
कैसी बात करती हो, मम्मी? वसीयत करने की जरूरत क्या है….. क्या आपको लगता है कि हम चारों भाई-बहन रूपये-जमीन के लिए आपस में लड़ेंगे?
नहीं बेटा…. मुझे अपने बच्चों पर तो विश्वास है, सुनीता की तरफ से बेफिक्र हूँ कि वह कभी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ेगी पर शैली…… प्रभात कभी उसके खिलाफ नहीं बोलेगा।
…. तो हम कौन सा उसके सहारे बैठे हैं, आपने हमें पैरों पर खड़ा कर रखा है….
बात केवल तुम दोनों की नहीं है…. तुम्हे प्रकाश और सुनीता की आमदनी का तो पता है ही, साथ ही….. इस बात का भी अहसास होगा कि हमारे बाद सारी जिम्मेदारी ये दोनों ही निभाएँगे….. आगे इसके भी तीन बच्चे हैं।
आप क्यों चिंता करती हो मम्मी….. हम दोनों और प्रभात है ना प्रकाश भैया के साथ….
जो बहू हमारे सामने कभी तुम दोनों का मान नहीं करती, जेठ-जेठानी को कुछ नहीं समझती….. तुम्हें क्या लगता कि वो भाई- बहनों के रिश्ते को निभाएगी……. हमारे जाने के दो महीने में अपना हिस्सा बेचकर इस घर की तरफ देखेगी भी नहीं।
अब मम्मी… उनकी चीज है हम कैसे रोक सकते हैं…..
छोटी सी नौकरी में तुम्हारे पापा ने बहुत मुश्किल से एक- एक पैसा जोड़ कर ये मकान – चार दुकान बनाई और गाँव की जमीन बचाकर रखी …. इसलिए अब वसीयत में चारों बच्चों का हिस्सा लिखवाएँगे…. हाँ, ओर एक पाँचवाँ हिस्सा उसे मिलेगा जो हम दोनों को अपने साथ रखेगा।
अरे मम्मी….. सच बताइये, ये इतना दिमाग आपने नहीं लगाया ना….
हाँ….. ये सब इसलिए सोचना पड़ा क्योंकि हमारी छोटी बहू की नजरों में केवल धन- दौलत की कीमत है। और सुनो…. आज शाम तुम्हारे पापा और मै सबके सामने अपनी इस इच्छा के बारे में बताएँगे तो तुम दोनों चुप रहोगी, कोई जरूरत नहीं है अपना हिस्सा छोड़ने की, बाकी बाद में समय और परिस्थिति देखकर निर्णय करना। अगर बहने भाई- भाभी के रिश्ते को बनाए रखने के लिए मायके में अपना हिस्सा छोड़ती हैं तो भाई-भाभी को भी उन्हें मान- सम्मान का अधिकार देना चाहिए।
उसी दिन शाम को दिनकर जी ने अपने चारों बच्चों, दोनों बहुओं और वीडियो काॅल पर दोनों दामादों को अपनी इच्छा के बारे में बता दिया, साथ ही सख्ती से यह भी कह दिया कि अगर किसी कोई आपत्ति हो तो इसी समय पूछ ले क्योंकि इसके बाद इस बारे में कोई बात ना की जाए।
बाकी सब चुप रहे लेकिन शैली ने खिसयानी आवाज में कहा —-
आपका फैसला है पापाजी, मुझे तो नहीं लगता कि किसी को परेशानी होगी।
चलो फिर उठो और भोजन लगाओ….. मैं भी वकील साहब को कल आने के लिए फोन कर देता हूँ।
करुणा मलिक