बहु यह तूने कैसी चाय बनाई है ना मीठी है ना कोई स्वाद है। फीकी फीकी अदरक भी नहीं डालती । कल्याणी जी ने बहु रजनी को टोका ,क्या हुआ मां जी ठीक तो बनी है चाय डाइनिंग टेबल पर बैठे हुए बेटा सुरेंद्र बोला। हां तू तो बीवी का ही पक्ष लेगा । नहीं मै पक्ष नहीं ले रहा हूं रोज की तरह ही तो चाय बनी है।
बस रहने दीजिए जी आप, रजनी ने पति से कहा। आजकल मांजी को जाने क्या हो गया है हर बात में नुक्स निकलती रहती है। अब इतनी मीठी चाय है तो उनकी जुबान ही कडवी हो गई है जो मां जी को मेरी हर चीज में मीन मेख निकलने लगी है।
तो तुमने कल रात को सब्जी कैसे बनाई थी ना नमक ना मिर्च तुझे तो पता है ना मुझे यह फीकी सब्जी अच्छी नहीं लगती । कल्याणी जी बोली अब तेरा खाना बनाने में मन नही लगता है कुछ भी ढंग का नहीं बनाती है ।
मैं तो ढंग का ही बनाती हूं मां जी अब तो आपकी जुबान ही कड़वी हो गई है । देख सुरेंद्र मैं तो तंग आ गई हूं तेरी बीवी के रोज-रोज के बहस से रोज-रोज के झगड़े से। अब न रह सकती मैं इसके पास मुझे तो छोटे के यहाँ तू छोड़ आ ।
सुरेंद्र मां की बात सुनकर परेशान हो गया। रजनी को डांट लगाने लगा क्यों रजनी तुम ढंग का बनाकर मां को क्यों नहीं दे देती जैसा उनको पसंद है।ढगं का ही तो बनाती हूं आजकल माँ जी को पता नहीं क्या हो गया है मेरे से बात बातें उलझती रहती है । और मेरी हर खाने की चीज में नुक्स निकालती रहती है क्या करूं मैं ।
इस रिश्ते की अहमियत को समझो रजनी मां की उम्र हो रही है। अब उनको इस उम्र मे कहां छोड़ आऊं। छोटे के यहां तो बिल्कुल भी नहीं रह सकती क्योंकि छोटे की पत्नी उनका बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखती है । और छोटा भी लापरवाह है। अम्मा जी वहां परेशान हो गई हो गई थी तभी तो उनको यहां लेकर आना पड़ा।
उनकी अब कहीं उधर जाने की उम्र भी नहीं रही है । तुम् ही कुछ समझोता कर लो रजनी । देखो जी मैं बहुत समझती हूँ और माँ जी का हमेशा ध्यान रखा है। बूढ़ी है मैं उनका मान सम्मान देतीं हूं ,और वह भी मुझसे खुश रहती थी। लेकिन आजकल पता नहीं क्या हो गया है मां जी को। हो जाता है कभी कभी बुढापा है।हर समय आप मुझको ही टोकते हैं मां की गलती आपको दिखाई नहीं देती है । मैं समझता हूं रजनी तुम बहुत मां का ध्यान रखती हो पर ,,,,,,,,।
आजकल रोज ही घर में मां और बहू की कहा सुनी हो जाए करती थी। सुरेंद्र आज अनमने मन से ऑफिस को निकला।वहां ऑफिस जाकर भी काम में मन नहीं लग रहा था। मां और रजनी की बातें याद आ रही थी।
तभी ऑफिस में सुरेंद्र का दोस्त अजय सुरेंद्र के पास आया और उसने दो-तीन आवाज लगाई सुरेंद्र लेकिन सुरेंद्र सुन ही नहीं रहा था। वह जाने कहां खोया हुआ था अरे सुरेंद्र कहां खोया है तू ऑफिस में रहकर भी ऑफिस में नहीं है क्या समस्या है। कुछ नहीं यार कुछ तो है अरे घर की समस्या थी ।
वही सास बहू का झगड़ा अजय बोल पडा क्या तुम्हें कैसे पता, अरे मालूम है सुरेंद्र घर में बच्चे तो बाहर है और तुम पति-पत्नी में अच्छी पटती है फिर और क्या मसला हो सकता है सास बहू का ही झगड़ा हो सकता है। हाँ यार क्या बताऊँ अब मेरी मां बहुत समय से मेरे साथ रह रही है ।
और मेरी पत्नी उनके अच्छे से ध्यान भी रखती है लेकिन इधर कुछ दिनों से सास बहू में झगड़े होने लगे है। अब माँ मेरी जिद पकड़ कर बैठ गई है कि मेरे छोटे भाई के घर छोड़ आओ मै नहीं रहूगीं तेरी पत्नी के साथ।मेरे छोटे भाई की पत्नी मेरी मां का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखती है ।
अब यार सुरेंद्र परेशान क्यों हो रहा है मा जिद कर रही है तो कुछ दिन को मां को छोटे भाई की यहां छोड आ।उनकी खुद ही समझ में आ जाएगा उनका ज्यादा कौन ख्याल रखना है हां यार शायद तो ठीक कह रहा है।
सुरेंद्र आफिस से निकला तो सोचता हुआ घर आ रहा था कि कल छुट्टी लेकर मां को कुछ दिनों के लिए छोटे के यहाँ छोड़ आता हूं । कम से कम रोज-रोज के झगड़ों से तो छुटकारा मिलेगा । जब सुरेन्द्र ने घर के अंदर प्रवेश किया तो कमरे से बात करने की आवाज आ रही थी ।
सुरेन्द्र कमरे का तक गया दरवाजा खोला तो देखा रजनी और मां जीं हंस हंसकर बातें कर रही थी । और रजनी मां जी के पैरों में तेल मालिश कर रही थी। सुरेन्द्र देख रहा था यह क्या हो रहा है। और मां तो छोटे के घर जाने की जीद पकड़े बैठी थी। रजनी हंसते हुए खड़ी हुई आप बैठिए मैं आपके लिए और मां के लिए चाय बना कर लाती हूं।
बहु चीनी थोड़ा ज्यादा डालना नहीं मान जी आपकी शुगर बढी हुई ना आपको चीनी नहीं अब तो फिकी चाय बनाऊंगी मैं आपके लिए अरे मां आप ठीक तो है।हां मुझे क्या हुआ है ठीक हूं और छोटे क्या नहीं चलना क्या अरे नहीं कहीं नहीं जाना मुझे।
सुन बेटा आज मैं जब नहा कर आई तो ठीक से चल नहीं पा रही थी घुटनों में बहुत दर्द हो रहा था फिर अपने हाथ से तेल लगा रही थी तभी बहू आ गई और मुझे पकड़ कर कुर्सी में बैठाया और मेरे हाथ से तेल लेकर अपने हाथ से मुझे तेल लगाने लगी बहुत अच्छी है रजनी में कहीं नहीं जाऊंगी
अच्छा माँ यही तो रिश्तों की गरिमा है बेटा रजनी ने अपना अभिमान छोड़कर मेरा ध्यान रखा रिश्तों को पहचानने की अच्छी समझ है बहू में। मैं कहीं नहीं जाऊंगी । यही रहूंगी थोड़ा बहुत कभी-कभी मन उल्टा सीधा बोल जाता है है और कोई बात नहीं।
सुरेंद्र मुस्कुराता हुआ रजनी के पास गया धन्यवाद रजनी किस बात का। तूने मां जी को समझा समझती तो मैं पहले से ही हूं बस कभी-कभी थोड़ी बहुत कहा सुनी हो जाती है । मां जी बड़ी बूढ़ी है वह कुछ भी कह सकती हैं मुझे बुरा नहीं लगता है। उनके आशीर्वाद से ही तो हम लोग फल फूल रहे हैं जी एक दूसरे को समझे प्लीज रिश्तो की गरिमा है
रिश्ते तो बहुत कीमती होते हैं उन्हें संभाल कर रखना चाहिए ऐसी छोटी-छोटी बातों से टूटने नहीं चाहिए। समझ लीजिए। अपनी और माँ जी की चाय और तुम्हारी चाय कहां है।
रजनी चलो सब कोई साथी चाय पियेंगे क्यों। रजनी आज तुमने फिर फीकी चाय दी मुझे अब तो मैं आपको फीकी ही चाय पिलाऊंगी मां जी । आप मुझे कितना भला बुरा कहें और फिर से एक हंसी की आवाज से पूरे कमरे में खुशी फैल गई।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
4 जून