समर्पण – मीनाक्षी गुप्ता

“बरसात की हल्की फुहारें पड़ रही थीं। गाँव की मिट्टी से उठती सोंधी खुशबू वातावरण में घुल गई थी। दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली गौरी अपने घर के आँगन में बैठी किताबों के पन्ने पलट रही थी। उसकी आँखों में बड़े सपने थे, लेकिन उन सपनों तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं था।”

गौरी के पिता रामस्वरूप एक साधारण किसान थे। थोड़ी-सी जमीन थी, जिससे परिवार का गुज़ारा चलता था। कभी फसल अच्छी हो जाती तो घर में खुशी आ जाती, और कभी मौसम की मार सारी उम्मीदों पर पानी फेर देती। माँ घर के कामों के साथ-साथ सिलाई करके परिवार का हाथ बँटाती थीं। आर्थिक तंगी के बावजूद माता-पिता ने कभी अपनी बेटी को सपने देखने से नहीं रोका।

गौरी पढ़ाई में बहुत तेज़ थी। उसके शिक्षक भी उसकी लगन और मेहनत की सराहना करते थे। एक दिन विद्यालय से सूचना मिली कि जिले के मेधावी विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति परीक्षा आयोजित की जा रही है। जो विद्यार्थी इसमें सफल होंगे, उनकी आगे की पढ़ाई का खर्च छात्रवृत्ति के माध्यम से उठाया जाएगा।

गौरी का नाम भी परीक्षा के लिए चुना गया।

यह सुनकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लेकिन जैसे-जैसे परीक्षा का दिन नज़दीक आने लगा, उसके मन में चिंता भी बढ़ने लगी। परीक्षा शहर में होनी थी। वहाँ जाने, रहने और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए पैसों की जरूरत थी। घर की हालत ऐसी नहीं थी कि आसानी से यह खर्च उठाया जा सके।

एक रात भोजन करते समय गौरी ने हिचकते हुए कहा,

“बाबा, मैं यह परीक्षा देना चाहती हूँ।”

रामस्वरूप ने उसकी ओर देखा। उनकी बेटी की आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने चमक रहे थे। वे कुछ क्षण चुप रहे। उन्हें घर की स्थिति भी मालूम थी और बेटी की प्रतिभा भी।

उस रात शायद उन्हें नींद नहीं आई।

अगली सुबह उन्होंने एक कठिन निर्णय लिया। उनकी खेत में खड़ी फसल कटने के लिए लगभग तैयार थी। यदि कुछ दिन और इंतज़ार करते, तो अच्छी कीमत मिल सकती थी। लेकिन उन्होंने फसल को पहले ही कम दाम पर बेच दिया, ताकि तुरंत पैसे मिल सकें और गौरी परीक्षा देने जा सके।

जब गौरी को यह बात पता चली, तो उसकी आँखें भर आईं।

“बाबा, आपने ऐसा क्यों किया? आपको नुकसान हो गया।”

रामस्वरूप ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

“बेटी, फसल तो हर साल उगाई जा सकती है, लेकिन सपनों को बार-बार मौका नहीं मिलता।”

उस दिन गौरी ने मन ही मन एक संकल्प लिया कि वह अपने पिता के इस त्याग को व्यर्थ नहीं जाने देगी।

परीक्षा का दिन आ गया। पहली बार वह अपने गाँव से बाहर शहर गई थी। ऊँची इमारतें, भीड़भाड़ वाली सड़कें और सैकड़ों छात्र देखकर वह थोड़ी घबरा गई। लेकिन अगले ही पल उसे अपने पिता का चेहरा याद आया। उसने अपनी सारी घबराहट को पीछे छोड़ दिया और पूरी मेहनत से परीक्षा दी।

कुछ सप्ताह बाद परिणाम घोषित हुआ।

पूरा गाँव खुशी से झूम उठा। गौरी ने न केवल परीक्षा उत्तीर्ण की थी, बल्कि पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसे छात्रवृत्ति मिल गई थी।

उस दिन रामस्वरूप के चेहरे पर जो गर्व था, वह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता था। गाँव के लोग बधाई देने आ रहे थे। सभी कह रहे थे कि गौरी एक दिन बहुत बड़ा नाम करेगी।

समय बीतता गया।

गौरी ने अपनी पढ़ाई पूरी निष्ठा और मेहनत से जारी रखी। छात्रवृत्ति के सहारे उसने उच्च शिक्षा प्राप्त की। संघर्ष उसके जीवन का हिस्सा था, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। वर्षों की कठिन मेहनत के बाद वह डॉक्टर बन गई।

जिस दिन उसकी नियुक्ति हुई, सबसे अधिक खुशी उसके माता-पिता को हुई। उनकी आँखों में संतोष था कि उनकी बेटी ने उनके विश्वास को सार्थक कर दिखाया।

कई वर्षों बाद गौरी अपने गाँव लौटी।

अब उसके माता-पिता बूढ़े हो चुके थे। रामस्वरूप की चाल पहले जैसी तेज़ नहीं रही थी। खेत भी अब पहले की तरह नहीं संभलते थे। गाँव में आज भी एक अच्छे अस्पताल की कमी थी। छोटी-छोटी बीमारियों के लिए लोगों को शहर जाना पड़ता था।

गौरी ने निश्चय किया कि वह अपने गाँव के लिए कुछ करेगी।

उसने अपने गाँव में एक अस्पताल बनवाने का निर्णय लिया। यह केवल एक अस्पताल नहीं था, बल्कि उस समर्पण का प्रतिफल था जिसने उसके जीवन की दिशा बदल दी थी।

अस्पताल के उद्घाटन के दिन पूरा गाँव उपस्थित था। लोग गौरी की सफलता की प्रशंसा कर रहे थे। मंच पर जब उसे बोलने के लिए बुलाया गया, तो उसने कुछ क्षण अपने माता-पिता की ओर देखा।

फिर उसने कहा,

“आज लोग मेरी सफलता की बात कर रहे हैं, लेकिन इस सफलता की असली नींव वर्षों पहले रखी गई थी। उस दिन, जब एक किसान पिता ने अपनी बेटी के सपनों को अपनी जरूरतों से बड़ा मान लिया था।”

सभा में सन्नाटा छा गया।

गौरी मंच से उतरी और अपने पिता के पास जाकर उनके चरणों में झुक गई।

“अगर समर्पण का कोई चेहरा है, तो वह मेरे पिता का चेहरा है।”

रामस्वरूप की आँखें नम हो गईं।

उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,

“नहीं बेटी, समर्पण तो तुम्हारा है। मैंने तो केवल तुम्हारे लिए एक छोटा-सा त्याग किया था, लेकिन तुमने अपने जीवन के वर्षों को मेहनत और संघर्ष के नाम समर्पित कर दिया।”

गौरी मुस्कुरा दी।

“समर्पण कभी एकतरफा नहीं होता, बाबा। आपके विश्वास ने मुझे शक्ति दी और मेरी मेहनत ने उस विश्वास को सम्मान दिया।”

उस क्षण वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें नम थीं। सभी समझ चुके थे कि समर्पण केवल त्याग का नाम नहीं है। समर्पण वह भावना है जिसमें व्यक्ति किसी अपने के सपनों, खुशियों और भविष्य को अपना मानकर उसके लिए हर कठिनाई सहने को तैयार हो जाता है।

समर्पण ही वह शक्ति है जो साधारण लोगों को असाधारण बना देती है। यह रिश्तों को गहराई देता है, संघर्षों को अर्थ देता है और सपनों को मंज़िल तक पहुँचाने का साहस देता है।

“समर्पण केवल किसी के लिए कुछ छोड़ देने का नाम नहीं है, बल्कि उसके सपनों को अपना सपना बना लेने का नाम है।”

“जहाँ प्रेम होता है, वहाँ त्याग जन्म लेता है; और जहाँ त्याग होता है, वहाँ समर्पण अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देता है।” 🌼

— मौलिक रचना ✍️

© विविक्ता (2026)

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मीनाक्षी गुप्ता

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