पैसा ही सब कुछ नहीं – बिमला रावत जड़धारी

रिया ने अपने बाबा को फोन किया। “बाबा, रोहन का फोन आया था। वह कह रहा था कि बाबा और मम्मी वसीयत बनाने वाले हैं।” “हाँ, बेटा। रोहन ठीक ही बोल रहा था। मैं और मम्मी सोच रहे हैं कि अब वसीयत बना दें, पर रोहन मना कर रहा था कि अभी कोई जरूरत नहीं … Read more

पति पत्नी का एक साथ परिवार में , समर्पण ही तो है। – मंजू ओमर 

मां यह लोग घर खर्च के पैसे अच्छा बेटा । सुनिए जी आपकी तनख्वाह मिल गई क्या हां ,पत्नी बोली  तो क्यों ना हम इस महीने पीछे वाले कमरे में एक ऐसी लगवा ले। इस महीने नहीं हो पाएगा आगे देखेंगे आनंद जी बोले। क्यों नहीं हो पाएगा सैलरी तो पूरी मिली है ना। हां … Read more

सच्ची श्रद्धांजलि – कमलेश आहूजा

लगभग एक वर्ष बीत गया था रमेश को इस संसार को अलविदा कहे हुए।रमा पति की यादों में खोई हुई थी।पति के साथ बिताए हुए हर एक लम्हें को इस एक वर्ष में उसने हजारों-हजार बार जिया था।पति को याद करते हुए कभी उसकी आँखें नम हो जातीं तो कभी होंठो पर खोई हुई मुस्कान … Read more

*रिश्तों की कीमत* – तोषिका

लड़की तो बहुत सुंदर और सुशील है, हमें हमारे बेटे ऋषि के लिए सीमा पसंद है। मुस्कुराते हुए ऋषि की मां सुलेखा ने बोला। ऋषि और सीमा की शादी हो गई थी। पर ज्यादा बड़े घर से ना होने के चलते वो दहेज के लिए इतने गहने और सोना चांदी ये सब नहीं लाई थी। … Read more

घर ईंटों से नहीं दिलों से बनता है -प्रतिमा श्रीवास्तव

कमरें में धीमी रौशनी जल रही थी। सन्नाटा चारों ओर पसरा हुआ था, सांसो की आवाजाही भी कानों में साफ – साफ सुनाई दे रही। बिस्तर पर लेटी करुणा जी छत को अपलक निहार रहीं थीं, जैसे कुछ प्रश्नों के जबाब को तलाश रहीं हों। अतीत की यादों ने उन्हें झकझोर दिया था और आंखों … Read more

रिश्तों की कीमत – खुशी

आदित्य एक अनाथ लड़का था।जो अनाथाश्रम में रहता था।वही के जो मैनेजर थे वो ही वहां रह रहे बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते थे।कभी कोई रहीस आदमी आ जाता तो  ढंग से खाना पीना मिल जाता नहीं तो वही रुखा सुखा। एक अपमान भरा जीवन जिया था उसने कभी कोई प्यार करने वाला नहीं … Read more

रिश्तों की कीमत – माता-पिता और बेटी – सुदर्शन सचदेवा

“बेटियाँ घर की रौनक होती हैं” — यह बात शर्मा जी अक्सर कहा करते थे। उनकी इकलौती बेटी अन्वी उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी। घर में उसकी हँसी गूंजती तो लगता जैसे हर कोना मुस्कुरा उठा हो। अन्वी बचपन से ही बहुत चंचल थी। सुबह उठते ही सबसे पहले माँ के गले लगती … Read more

मां का अकेलापन – गीता वाधवानी

 “मम्मी, मैं चलती हूं कैब आ गई है।”   मम्मी( राधा देवी) ने कहा-” नैनसी, सुन तो बेटा, फिर कब आएगी, अबकी बार तो बहुत दिनों बाद आई है। इसी शहर में अपना ट्रांसफर क्यों नहीं करवा लेती। अब मैं और अकेली नहीं रह सकती। मेरा बिल्कुल मन नहीं लगता तेरे बिन। देख लेना किसी दिन … Read more

रिश्तो की कीमत – एम पी सिंह ‘मोहि”

नीलम शादी करके ससुराल पहुची, वो बहुत खुश थी। परिवार में पति और ससुर के अलावा कोई नहीं था। पति आनंद की अच्छा पड़ा लिखा, सरकारी नौकरी मैं था. सब ठीक चल रहा था, ओर जल्दी ही वो पति औऱ ससुर की चहेती बन गई। नीलम से ससुर एक सेवानिवृत सरकारी अधिकारी थे. अच्छी सोसाइटी … Read more

रिश्तों की कीमत – करुणा मलिक

प्रकाश के पापा, मुझे लगता है कि वसीयत लिखकर वकील के पास रखने में ही ठीक रहेगा वरना प्रभात की बहू हमारे मरते ही तुरंत घर- जमीन के दो टुकड़े करवा देगी और औने-पौने दाम में बिकवा कर चलती बनेगी।  हाँ, कह तो तुम ठीक रही हो पर क्या दोनों बेटियाँ अपना हिस्सा लेंगी? वे  … Read more

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