जीवन की दूसरी धूप

 जानकी जी ने भावुक होकर कहा, “बहू, अगर उस दिन तूने मुझे अपनी उस झूठी झिझक से बाहर न निकाला होता, तो मैं कभी जान ही नहीं पाती कि उमाकांत जी के जाने के बाद भी मेरे भीतर कोई जानकी बाकी है। तूने मुझे सिर्फ एक यात्रा पर नहीं भेजा, बल्कि मुझे खुद से दोबारा … Read more

संस्कारों की नई भोर

 राजेश्वरी देवी ने आगे बढ़कर शारदा जी का दूसरा हाथ अपने हाथों में ले लिया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे, “समधन जी, अपनी बहन को माफ कर दीजिए। आपकी बेटी सिर्फ आपकी नहीं, मेरे घर की लक्ष्मी है। आप जल्दी से ठीक हो जाइए, आपके बिना मेरे बेटे की बारात कैसे उठेगी? आपको … Read more

 हैसियत का तराजू

 सुनयना के दिमाग में एक पल के लिए आग लग गई। उसके भीतर का संदेह और कटुता एक झटके में जाग उठी। वह मन ही मन सोचने लगी, “ओहो! तो यह तमाशा है! इतनी बड़ी दुकान से अपनी बेटी के लिए खरीदारी हो रही है? बहुत पैसा दबा कर रखा है इस औरत ने। हमारे … Read more

धूप-छांव का नया आंगन

 अवनि ने भरभराई आवाज में कहा, “मां, मैंने अभी-अभी दरवाजे पर खड़े होकर आपकी सारी बातें सुन लीं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं किन शब्दों में आपका धन्यवाद करूं। आज के दौर में जहां सासें अक्सर अपनी बहुओं की गलतियां ढूंढती हैं, वहां आपने मुझे इतना ऊंचा स्थान दिया। आपने मुझे सिर्फ एक … Read more

ज़मीन का आसमान

पल्लवी के इन शब्दों ने ईशानी के सीने पर बरसों से जमे अहंकार के पत्थर को पूरी तरह पिघला दिया। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। यह पहली बार था जब ईशानी किसी के सामने झुकी थी, पर इस झुकाव में कोई ज़िल्लत नहीं थी, बल्कि एक नई और सच्ची समझ की शुरुआत … Read more

आँगन की साँझ

 देवकी जी ने घबराकर कहा, “दामाद जी, यह आप क्या कह रहे हैं? दामाद के घर जाकर रहना… बेटी के ससुराल में डेरा डालना… हमारे समाज में यह सब अच्छा नहीं माना जाता। लोग क्या कहेंगे कि बेटा विदेश में बैठा है और माँ-बाप दामाद के टुकड़ों पर पल रहे हैं? हम अपनी इस पुश्तैनी … Read more

रिश्तों की धूप-छांव और मोम सा दिल

 “सहना नहीं है, जीतना है,” वंदना ने आत्मविश्वास से कहा। “अच्छे व्यवहार और धैर्य से बड़ी से बड़ी नफरत को भी पिघलाया जा सकता है। अपनी ननद कोमल से मुकाबला मत करो, बल्कि उसे अपनी छोटी बहन समझकर उसके साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाओ। उसकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखो। जब वो देखेगी कि उसकी कड़वाहट … Read more

पिता का अभेद्य कवच

नंदिनी फूट-फूट कर रो पड़ी, “बापूजी… मुझे बचा लीजिए! मुझसे बहुत बड़ा गुनाह हो गया। मैं रिसर्च के लिए नहीं आई थी, मैं झूठ बोलकर एक बहुत गंदी जगह फँस गई हूँ। बापूजी, मुझे डर लग रहा है!” त्रिलोकी नाथ जी के पैरों तले ज़मीन नहीं हिली, बल्कि एक पिता का सोया हुआ शेर जाग … Read more

लहू की पुकार

अमरेंद्र की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने कांपते हाथों से अपने बड़े भाई का हाथ पकड़ लिया। आवाज इतनी कमजोर थी कि बमुश्किल निकल पा रही थी, “भैया… आप? आपने मुझे माफ कर दिया भैया? मैंने आपके साथ कितना गलत किया… उस मामूली जमीन के लिए मैंने अपने उस भाई से मुंह … Read more

आँगन की छांव

सौम्या ने अपने आँसू पोंछे और उसके चेहरे पर एक दृढ़ निश्चय चमक उठा। “तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो पल्लवी। मैं चित्रा भाभी की तरह अवसाद के अंधेरे में नहीं डूबना चाहती, न ही अपने बच्चों से उनके दादा-दादी का प्यार छीनना चाहती हूँ। आज तक मैंने अपनी आँखों पर जो स्वार्थ और झूठी … Read more

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