जीवन की दूसरी धूप
जानकी जी ने भावुक होकर कहा, “बहू, अगर उस दिन तूने मुझे अपनी उस झूठी झिझक से बाहर न निकाला होता, तो मैं कभी जान ही नहीं पाती कि उमाकांत जी के जाने के बाद भी मेरे भीतर कोई जानकी बाकी है। तूने मुझे सिर्फ एक यात्रा पर नहीं भेजा, बल्कि मुझे खुद से दोबारा … Read more