कब तक चुप रहोगे – डॉ आभा माहेश्वरी

शहर के पुराने मोहल्ले में एक छोटा-सा घर था। घर की खिड़की पर बैठकर हर शाम सत्तर वर्षीय शारदा देवी सड़क को निहारती रहती थीं। उनके चेहरे पर उम्र की झुर्रियाँ थीं, लेकिन आँखों में अब भी किसी का इंतज़ार ठहरा हुआ था। उनका इकलौता बेटा निखिल शहर से दूर नौकरी करता था। महीने में … Read more

एक भाई का निस्वार्थ प्रेम

उनकी कराहने की आवाज़ सुनकर बगल के कमरे से चंद्रकांत भैया उठकर आ गए। उन्होंने सूर्यकांत का तड़पता हुआ चेहरा देखा तो उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। बिना एक शब्द कहे भैया सीधे रसोई में गए। उन्होंने सरसों के तेल में लहसुन डालकर उसे हल्का गर्म किया। फिर वो वापस आए, सूर्यकांत … Read more

अनमोल तोहफा

कैलाश बाबू धीरे से अपनी पत्नी के पास आए और उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “पार्वती, तुमने अपनी पूरी ज़िंदगी मेरे और मेघा के कपड़े उस ठंडे पानी में अपने हाथों से धोए हैं। अब सर्दियों में जब तुम ठंडे पानी में हाथ डालती हो, तो मैं देखता हूँ कि तुम्हारी उँगलियाँ … Read more

रौशनी की दहलीज

सिद्धार्थ ने अपनी माँ निर्मला देवी की तरफ देखा, जिनकी आंखों में आंसू थे। निर्मला देवी को भी अपनी गलती का अहसास हो रहा था। वो दौड़कर गायत्री के पास गईं और उसे गले लगा लिया। “मुझे माफ़ कर दे बेटी। मैं दुनिया के डर से एक माँ का फर्ज़ भूल गई थी।” मीरा मुस्कराई … Read more

रिश्तों की जमा-पूंजी

“भाई साहब, अगले ही दिन मैंने छुट्टी ली और अपनी पत्नी सरिता के मायके पहुंच गया। वो मुझे देखकर बहुत हैरान और नाराज थी। उसने मुझसे बात तक नहीं की। जब वो खाना खाने बैठी, तो मैं चुपचाप उसके पास जाकर बैठ गया। मैंने उसकी प्लेट से एक रोटी उठाई और कहा, ‘क्या जिंदगी भर … Read more

एक अनकहा रिश्ता: जब दोस्त बनी भाभी

 भैया ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “क्योंकि मुझे तुम्हारी पसंद पर और तुम्हारी भाभी की समझदारी पर पूरा भरोसा था। लेकिन मैं इंतजार कर रहा था कि सिद्धार्थ अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, ताकि मैं ताऊजी और पिताजी के सामने उसका पक्ष मजबूती से रख सकूं। तुम्हारी भाभी ने … Read more

बंद खिड़की की धूप

तीन दिन बाद जब सावित्री देवी को अस्पताल से छुट्टी मिली, तो अनुराग ने खुद अपनी गोद में उठाकर मां को कार की आगे वाली सीट पर बैठाया। उसने अपनी सास को फोन किया, जिन्होंने फिर से किसी पार्टी में चलने की बात छेड़ी थी। अनुराग ने बहुत ही विनम्र लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, … Read more

फर्ज की दहलीज

 कल्याणी देवी ने मुंह बिचकाया, “रहने दो, ये डॉक्टरों के बनाए ढकोसले हैं ताकि अपनी जेबें भर सकें। जितना काम करोगी, शरीर उतना ही लचीला रहेगा। तुम्हारे बाबूजी ने कोई राजमहल तो दिया नहीं कि तुम यहां आकर महारानी बन जाओगी। अगर इतना ही नाजुक मिजाज है, तो अपने मायके चली जाओ। वहीं जाकर मां … Read more

इश्क़, गलतियां और मीठे पछतावे

 बुआ जी ने अपना माथा पीट लिया। “अरे मोरे राम! ई मार्डन जमाने के चक्कर में तुम लोग कितने कामचोर हो गए हो। हमारे गांव में जो मेहरारू सुबह उठके चूल्हा नहीं जलाती और नाश्ता-खाना एक साथ खिलाती है, उसे आलसी और कोढ़ी कहा जाता है। तुम लोग शहर वाले भी ना, आलस का नाम … Read more

अहंकार की दीवार  

विक्रम की बात सुनकर स्मृति वहीं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसने मीरा के हाथ पकड़ लिए और बोली, “मुझे माफ कर दीजिए भाभी! मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। उस दिन मेरी तबीयत आपके जूस से नहीं, बल्कि मेरे छुपकर बाहर का खाना खाने से खराब हुई … Read more

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