कब तक चुप रहोगे – परमादत्त झा

बस माफ करें बाबूजी , बहुत हो गया -यह रमण था जो अपनी बहन कविता के लिए बोल रहा था। वह मेरे लिए मर चुकी है ,उसका नाम मत लो , पंडित की बेटी होकर मुसलमान की लुगाई बन गई।मेरा नाम डुबो दिया -पंडित दीनदयाल का गुस्सा मानो फट गया और रूलाई बाहर आ गई। … Read more

कब तक चुप रहोगे – विनीता सिंह

गाँव के आखिरी छोर पर एक छोटा-सा घर था। घर की दीवारें मिट्टी की थीं, लेकिन उनमें रहने वालों के सपने बहुत बड़े थे। उस घर में रघु अपनी पत्नी सीता और बारह साल के बेटे मोहन के साथ रहता था। रघु गाँव के जमींदार के खेत में मजदूरी करता था। दिनभर तपती धूप में … Read more

कब तक चुप रहोगे – डॉ आभा माहेश्वरी

शहर के पुराने मोहल्ले में एक छोटा-सा घर था। घर की खिड़की पर बैठकर हर शाम सत्तर वर्षीय शारदा देवी सड़क को निहारती रहती थीं। उनके चेहरे पर उम्र की झुर्रियाँ थीं, लेकिन आँखों में अब भी किसी का इंतज़ार ठहरा हुआ था। उनका इकलौता बेटा निखिल शहर से दूर नौकरी करता था। महीने में … Read more

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