कैलाश बाबू धीरे से अपनी पत्नी के पास आए और उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “पार्वती, तुमने अपनी पूरी ज़िंदगी मेरे और मेघा के कपड़े उस ठंडे पानी में अपने हाथों से धोए हैं। अब सर्दियों में जब तुम ठंडे पानी में हाथ डालती हो, तो मैं देखता हूँ कि तुम्हारी उँगलियाँ कैसे सूज जाती हैं। तुम्हारे हाथों का दर्द मुझसे अब और नहीं देखा जाता। रही बात जैकेट की, तो मेरा वो पुराना स्लेटी स्वेटर अभी बहुत सालों तक चलेगा। उसमें बहुत गर्माहट है। और जूतों का क्या है, मैं पुरानी चप्पल पहन कर ही पार्क तक हो आऊँगा। मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी यह है कि अब तुम्हें कपड़े धोने में तकलीफ नहीं होगी।”
“माँ, अगले सोमवार को तुम्हारी और पापा की शादी की तीसवीं सालगिरह है। मुझे अच्छे से पता है कि तुम दोनों को हमेशा की तरह यह तारीख याद भी नहीं होगी। तुम लोगों ने अपनी पूरी ज़िंदगी मेरी ज़रूरतों को पूरा करने में निकाल दी और अपने लिए कभी कुछ नहीं सोचा। मैं तुम्हारे खाते में पच्चीस हज़ार रुपये भेज रही हूँ। इस बार कोई कंजूसी नहीं चलेगी। माँ, तुम अपने लिए एक बहुत प्यारी सी सिल्क की साड़ी लेना। वो पुरानी सूती साड़ियाँ पहनना अब बंद करो। और हाँ, किसी अच्छी सी दुकान पर जाकर अपने लिए एक आरामदायक सैंडल भी लेना। और सुनो, पापा को बोलना कि वो अपने लिए एक बढ़िया सी ब्रांडेड गर्म जैकेट लें। उनका वो पुराना स्लेटी रंग का स्वेटर जगह-जगह से घिस चुका है। साथ ही उनके लिए अच्छे वाले जूते भी लेने हैं, ताकि सुबह टहलने जाते वक्त उनके घुटनों में दर्द न हो।”
इंदौर की एक सर्द सुबह में, अपने पुराने लेकिन बेहद साफ-सुथरे घर के आँगन में बैठी पार्वती देवी के चेहरे पर अपनी बेटी मेघा का यह लंबा-चौड़ा व्हाट्सएप मैसेज पढ़कर एक गहरी और संतोष भरी मुस्कान खिल उठी थी। चश्मे के पीछे से उनकी आँखों के किनारे हल्की सी नमी से चमकने लगे थे।
पार्वती देवी के पति कैलाश बाबू सालों तक शहर की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में मुंशी का काम करते थे। सुबह से लेकर देर रात तक ट्रकों के धुएँ, धूल और शोर-शराबे के बीच बैठकर उन्होंने पाई-पाई जोड़ी थी। मुंशी की उस छोटी सी तनख्वाह में घर चलाना और ऊपर से मेघा की पढ़ाई का खर्च उठाना कोई आसान काम नहीं था। पार्वती देवी ने उन दिनों में न जाने कितनी रातें सिर्फ पानी पीकर गुजारी थीं, ताकि मेघा की किताबों और स्कूल की फीस में कोई कमी न आए। कैलाश बाबू भी बिना किसी शिकायत के हर मौसम में अपनी पुरानी साइकिल से मीलों का सफर तय करते थे। रास्ते में साइकिल पंचर हो जाती, तो उसे पैदल घसीटते हुए लाते, लेकिन कभी ऑटो का किराया खर्च नहीं करते थे।
अक्सर जब सेठ की डाँट-फटकार सुनकर कैलाश बाबू थके-हारे घर लौटते, तो उनका उतरा हुआ चेहरा देखकर पार्वती देवी का दिल बैठ जाता था। वो चुपचाप उन्हें पानी देतीं और उनके पैरों में तेल की मालिश करने लगतीं। ऐसे मुश्किल वक्त में नन्ही मेघा ही उन दोनों का सबसे बड़ा हौसला हुआ करती थी। वो अपनी माँ के गले लगकर कहती, “माँ, तुम देखना, एक दिन मैं बहुत बड़ी अफ़सर बनूँगी और तुम दोनों की सारी परेशानियाँ खत्म कर दूँगी। फिर पापा को उस खड़ूस सेठ की बातें नहीं सुननी पड़ेंगी।”
वक्त ने करवट ली और बेटी के कहे हुए वो मासूम शब्द सच साबित हुए। मेघा ने अपनी मेहनत और लगन से अपनी पढ़ाई पूरी की। आज वह पुणे की एक बहुत बड़ी आईटी कंपनी में सीनियर मैनेजर के पद पर काम कर रही थी। नौकरी लगते ही मेघा ने सबसे पहला काम यह किया कि पिता को उस ट्रांसपोर्ट कंपनी की नौकरी से हमेशा के लिए आज़ाद कर दिया। अपनी पहली सैलरी से उसने माता-पिता के लिए एक नया सोफा और टीवी भिजवाया था। मेघा की तरक्की ने इस छोटे से घर की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी थी।
अब छोटे-मोटे खर्चों के लिए पार्वती देवी और कैलाश बाबू को सौ बार सोचने की ज़रूरत नहीं रह गई थी। मेघा हर महीने उनके खाते में इतने पैसे भेज देती थी कि दोनों का गुज़ारा बहुत शान से हो सके। लेकिन उम्र भर की वो कंजूसी और पाई-पाई जोड़ने की आदत इतनी आसानी से कहाँ जाती है? दोनों अब भी अपने ऊपर पैसे खर्च करने से कतराते थे।
लेकिन आज बात अलग थी। मेघा ने कसम जो दे रखी थी। पार्वती देवी ने न जाने कितने सालों से कोई नई और महँगी साड़ी नहीं खरीदी थी। उनके वार्डरोब में वही पुरानी सूती और सिंथेटिक साड़ियाँ थीं, जिन्हें वो बड़े जतन से धो-धोकर पहनती थीं। उन्हें तो ठीक से यह भी अंदाज़ा नहीं था कि आजकल शहर में अच्छी साड़ियों की कौन सी दुकान नई खुली है। इसलिए, उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली विमला को साथ चलने के लिए तैयार कर लिया। विमला को बाज़ार की अच्छी-खासी परख थी।
“अरे पार्वती! आज तो राजवाड़ा बाज़ार चलेंगे। मैंने सुना है वहाँ एक नया शोरूम खुला है, जहाँ एक से बढ़कर एक सिल्क और बनारसी साड़ियाँ आई हैं। आज तो मैं तुझे सबसे बेहतरीन साड़ी दिलवाकर ही मानूँगी,” विमला ने उत्साह से कहा।
उधर, कैलाश बाबू ने भी अपने पुराने दोस्त शर्मा जी को फोन मिला लिया था। “शर्मा जी, आज शाम को ज़रा बाज़ार की तरफ चलेंगे क्या? वो मेघा ने पैसे भेजे हैं, कह रही थी कि मैं अपने लिए एक नई जैकेट और स्पोर्ट्स शूज़ ले लूँ। मुझे तो इन ब्रांडेड चीज़ों की समझ है नहीं, आप साथ चलेंगे तो ठीक रहेगा।”
दोपहर के वक्त पार्वती देवी अपनी सहेली के साथ राजवाड़ा के भीड़-भाड़ वाले बाज़ार में थीं। शोरूम में रंग-बिरंगी, ज़री के काम वाली, और चमकदार साड़ियाँ देखकर उनकी आँखें चौंधिया रही थीं। एक गहरे लाल रंग की बनारसी साड़ी उन्हें बहुत पसंद आई। दुकानदार ने जब उसकी कीमत साढ़े चार हज़ार रुपये बताई, तो पार्वती देवी का हाथ अपने पर्स पर ठिठक गया। लेकिन फिर उन्हें मेघा की बात याद आई। उन्होंने मन पक्का किया और साड़ी पैक करने को कह दिया।
तभी, शोरूम की कांच की खिड़की से उनकी नज़र सामने वाली गली में स्थित एक इलेक्ट्रॉनिक और अप्लायंसेस की दुकान पर पड़ी। उस दुकान के बाहर सर्दियों में पानी गर्म करने वाले अच्छे गीज़र और वाशिंग मशीन रखे हुए थे। अचानक पार्वती देवी को याद आया कि सर्दियाँ शुरू हो चुकी हैं। कैलाश बाबू को सुबह-सुबह नहाने के लिए ठंडे पानी से बड़ी तकलीफ होती है। गैस पर पानी गर्म करने में समय लगता है और कई बार वो जल्दबाज़ी में ठंडे पानी से ही नहा लेते हैं, जिससे उनके जोड़ों का दर्द और बढ़ जाता है। साथ ही, कैलाश बाबू को रोज़ सुबह टहलने के बाद पैरों में भारी दर्द रहता था।
पार्वती देवी ने तुरंत साड़ी पैक कर रहे दुकानदार को रोका। “भैया, ज़रा रुकना। मुझे थोड़ा समय चाहिए।”
विमला हैरान रह गई, “क्या हुआ पार्वती? साड़ी तो बहुत सुंदर है, फिर क्यों मना कर रही है?”
पार्वती देवी मुस्कुराईं, “विमला, साड़ी तो मैं कोई सस्ती सी भी पहन लूँगी, लेकिन मुझे पहले सामने वाली दुकान पर जाना है।”
शाम का वक्त हो चुका था। कैलाश बाबू बाज़ार से लौट आए थे। घर का दरवाज़ा खुला तो पार्वती देवी ने देखा कि कैलाश बाबू के हाथ में कपड़ों या जूतों का कोई थैला नहीं है, बल्कि उनके पीछे-पीछे एक रिक्शेवाला एक बड़ा सा गत्ते का डिब्बा लेकर आ रहा है।
“अरे! ये क्या है?” पार्वती देवी ने चौंकते हुए पूछा। रिक्शेवाले ने वह भारी डिब्बा आँगन में रख दिया और पैसे लेकर चला गया।
कैलाश बाबू के चेहरे पर एक अजीब सी शांति और खुशी थी। उन्होंने डिब्बे का कवर हटाया। वह एक बिल्कुल नई, फुली ऑटोमैटिक वाशिंग मशीन थी।
“यह… यह वाशिंग मशीन कहाँ से आई? और आपकी जैकेट और जूते कहाँ हैं?” पार्वती देवी की आँखों में हैरानी और सवाल एक साथ तैर रहे थे।
कैलाश बाबू धीरे से अपनी पत्नी के पास आए और उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “पार्वती, तुमने अपनी पूरी ज़िंदगी मेरे और मेघा के कपड़े उस ठंडे पानी में अपने हाथों से धोए हैं। अब सर्दियों में जब तुम ठंडे पानी में हाथ डालती हो, तो मैं देखता हूँ कि तुम्हारी उँगलियाँ कैसे सूज जाती हैं। तुम्हारे हाथों का दर्द मुझसे अब और नहीं देखा जाता। रही बात जैकेट की, तो मेरा वो पुराना स्लेटी स्वेटर अभी बहुत सालों तक चलेगा। उसमें बहुत गर्माहट है। और जूतों का क्या है, मैं पुरानी चप्पल पहन कर ही पार्क तक हो आऊँगा। मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी यह है कि अब तुम्हें कपड़े धोने में तकलीफ नहीं होगी।”
पार्वती देवी की आँखों से आँसू छलक पड़े। वो कुछ बोल नहीं पाईं, बस कैलाश बाबू को देखती रह गईं। फिर वो चुपचाप उठीं और अपने कमरे में गईं। जब वो बाहर आईं, तो उनके हाथ में साड़ी का कोई थैला नहीं था। उनके हाथों में दो बॉक्स थे। एक में एक अच्छी कंपनी का इलेक्ट्रिक फुट-मसाजर (पैरों की मालिश करने वाली मशीन) था और दूसरे में एक बेहतरीन ऑर्थोपेडिक जूतों का डिब्बा।
कैलाश बाबू अवाक रह गए। “पार्वती! तुम्हारी सिल्क की साड़ी और सैंडल कहाँ है? तुमने ये सब क्यों लिया?”
पार्वती देवी अपने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराईं और बोलीं, “सिल्क की साड़ी पहनकर मैं किसे दिखाऊँगी? मेरी असली सुंदरता तो आपकी खुशी में है। आप दिन भर ट्रांसपोर्ट कंपनी में धक्के खाते थे, मीलों पैदल और साइकिल चलाते थे। आज भी आपके घुटनों और एड़ियों में जो दर्द रहता है, वो मेरी किसी भी महँगी साड़ी से ज़्यादा तकलीफदेह है। जब मेघा ने पैसे भेजे, तो मुझे लगा कि इन पैसों पर पहला हक़ आपके आराम का है। ये फुट-मसाजर आपके पैरों का दर्द खींचेगा और ये नए जूते आपको सुबह टहलते वक्त आराम देंगे।”
उस दिन घर के आँगन में रखी वाशिंग मशीन और फुट-मसाजर केवल धातु और प्लास्टिक के बने निर्जीव उपकरण नहीं थे; वे तीस सालों के त्याग, समर्पण और एक-दूसरे के प्रति अटूट प्रेम के जीते-जागते गवाह थे। मेघा ने पैसे तो दोनों को उनके व्यक्तिगत शौक पूरे करने के लिए भेजे थे, लेकिन दोनों ने ही अपनी खुशी को एक-दूसरे के आराम में ढूँढ लिया था।
सच्चा प्यार यही तो है—जब आप अपनी ज़रूरतों को भूलकर सामने वाले की तकलीफ को अपना बना लेते हैं। उस रात जब मेघा का फोन आया और उसने पूछा कि दोनों ने क्या-क्या खरीदा, तो दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखकर बस इतना ही कहा, “बेटा, हमने दुनिया की सबसे कीमती चीज़ खरीदी है—एक-दूसरे का सुकून।”
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
कमेंट में ज़रूर बताएँ: क्या आपके माता-पिता ने भी कभी आपके लिए या एक-दूसरे के लिए ऐसे खामोश त्याग किए हैं? आपकी नज़र में सच्चे प्यार की परिभाषा क्या है?