बुआ जी ने अपना माथा पीट लिया। “अरे मोरे राम! ई मार्डन जमाने के चक्कर में तुम लोग कितने कामचोर हो गए हो। हमारे गांव में जो मेहरारू सुबह उठके चूल्हा नहीं जलाती और नाश्ता-खाना एक साथ खिलाती है, उसे आलसी और कोढ़ी कहा जाता है। तुम लोग शहर वाले भी ना, आलस का नाम ‘ब्रंच’ रख दिए हो। जा अपनी बहू को उठा, और बोल मेरे लिए गरमा-गरम पराठे और चाय बनाए, ई तुम्हारा अंग्रेजी ब्रंच मेरे पल्ले नहीं पड़ने वाला।”
भोपाल के अरेरा कॉलोनी में रहने वाले सुमित का जीवन यूं तो बहुत ही शांति से चल रहा था, लेकिन उनके अंदर का ‘ज्ञान देने वाला पति’ अक्सर जाग जाया करता था। सुमित की पत्नी अंजलि एक बेहद समझदार और घर को सहेज कर रखने वाली महिला थी। सावन का महीना चल रहा था और अंजलि ने पूरे महीने के सोमवार के व्रत रखे हुए थे। सुबह से ही घर में पूजा-पाठ का माहौल था, लेकिन सुमित को अंजलि का यूं दिन भर भूखा रहना रास नहीं आ रहा था। ऑफिस जाने से पहले टाई की नॉट ठीक करते हुए सुमित से रहा नहीं गया और उसने अपने अंदर के आधुनिक पति को बाहर निकालते हुए कह ही दिया, “अंजलि, मेरी मानो तो ये व्रत-उपवास अब बंद कर दो। आज के जमाने में इन सब की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हारी सेहत वैसे ही थोड़ी नरम रहती है, डॉक्टर ने भी कहा है टाइम पर खाना खाया करो। ये भगवान भी नहीं चाहते होंगे कि तुम भूखी रहकर उनकी पूजा करो। कुछ जूस या सूप ही ले लिया करो।”
अंजलि जो उस समय भगवान की आरती की थाली सजा रही थी, अचानक रुक गई। उसने सुमित की तरफ ऐसे देखा जैसे सुमित ने कोई बहुत बड़ा राष्ट्रीय अपराध कर दिया हो। अंजलि ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें तरेरते हुए कहा, “अच्छा जी! तो अब आप मुझे मेरे धर्म और मेरी आस्था से भी दूर करना चाहते हैं? क्या आपको लगता है कि मैं ये व्रत सिर्फ शौक के लिए रखती हूं? अरे, हम औरतें ही तो हैं जो अपने पति की लंबी उम्र, उनके अच्छे स्वास्थ्य और तरक्की के लिए अपनी भूख-प्यास त्याग देती हैं। अगर मैं व्रत रखती हूं, तो उसका सीधा असर आपकी ही जिंदगी पर पड़ता है, वरना आप जो ये दिन-रात ऑफिस की टेंशन लेते हैं, उसे झेलने की ताकत आपको कहां से मिलती है? ये मेरे उपवास का ही प्रताप है।”
सुमित मन ही मन सोचने लगा, “लो कर लो बात! मैं तो इसकी सेहत की फिक्र कर रहा था और इसने तो पूरा का पूरा एहसान ही मेरे सिर पर मढ़ दिया। अब मैं इसे कैसे समझाऊं कि मेरे प्रमोशन में मेरी मेहनत का हाथ है, लेकिन नहीं… बहस करना तो बेवकूफी है।” सुमित को अपना पहला ‘मीठा पछतावा’ हो रहा था कि आखिर उसने अंजलि को व्रत तोड़ने की सलाह ही क्यों दी। चुपचाप अपना टिफिन लेता और ऑफिस निकल जाता तो इस प्रवचन से बच जाता।
खैर, दिन बीत गया। अगले दिन सावन की हल्की-हल्की फुहारें भोपाल के मौसम को और भी खुशनुमा बना रही थीं। बड़े तालाब की तरफ से ठंडी हवाएं आ रही थीं। सुमित छुट्टी पर था और बालकनी में बैठकर चाय पी रहा था। उसने देखा कि अंजलि सुबह से काफी चुपचाप है। वो बस मौन रहकर अपना काम कर रही थी। सुमित को लगा कि शायद कल वाली बात का बुरा मान गई है। उसने पास जाकर बड़े प्यार से अंजलि के कंधे पर हाथ रखा और पूछा, “क्या बात है अंजलि? सुबह से कुछ उखड़ी-उखड़ी सी लग रही हो। मौसम इतना सुहाना है और तुम इतनी खामोश?”
अंजलि ने टीवी सीरियल की किसी हिरोइन की तरह गहरी सांस ली और शायराना अंदाज में कहा, “लब खामोश हैं क्योंकि दिल के जज्बात अल्फ़ाज़ों के मोहताज नहीं होते… काश तुम मेरी इन खामोशियों को बिना कहे ही पढ़ लेते, तो ये दूरियां हमारे दरमियां ना होतीं।”
सुमित का सिर चकरा गया। उसने माथा पीटते हुए कहा, “अरे मेरी मिर्ज़ा ग़ालिब की अम्मा! ये इंस्टाग्राम वाली शायरी छोड़ो और मुझे अपनी सीधी-सादी भाषा में बताओ कि आखिर बात क्या है? मुझे ये पहेलियां समझ नहीं आतीं।”
अंजलि ने एक पल सुमित को देखा और फिर अपने ठेठ मालवी और भोपाली मिक्स अंदाज में बोली, “तो कान खोल के सुन लो! मोरो मन भजिये और कड़क अदरक वाली चाय खाबे को हो रियो है। मौसम पानी को है, और तुम बस बालकनी में बैठ के हवा खा रिये हो। चुपचाप जाओ और मेरे लिए बढ़िया से आलू-प्याज के भजिये बना के लाओ, और हां, मिर्ची तेज रखना!”
सुमित अवाक रह गया। वो मन ही मन सोचने लगा कि इससे तो वो शायराना अंदाज ही ठीक था, कम से कम उसमें मेहनत तो नहीं थी! अब सुमित को अपना दूसरा ‘पछतावा’ हो रहा था। “मैंने ही क्यों कहा कि ठेठ बोली में बात करो? अब जब तीर कमान से निकल चुका है, तो सीने पर तो खाना ही पड़ेगा।” बेचारे सुमित ने चुपचाप अपना एप्रन पहना और किचन में जाकर प्याज और बेसन के साथ कुश्ती लड़ने लगा।
थोड़ी देर बाद जब गरमा-गरम पकौड़े और चाय टेबल पर आए, तो अंजलि का चेहरा खिल उठा। पकौड़े सच में बहुत स्वादिष्ट बने थे। अंजलि का दिल खुश हो गया। उसने सोचा, पतिदेव ने इतनी मेहनत की है, तो इनके लिए कुछ अच्छा सा लिखा जाए। अंजलि को लिखने का शौक था। उसने अपने मोबाइल में व्हाट्सएप खोला और सुमित को एक बहुत ही खूबसूरत सा मैसेज टाइप करके भेजा- “जिंदगी के सफर में जब कोई बिना कहे आपके दिल की बात समझ ले, और आपके लिए अपनी खुशियां किचन के धुएं में उड़ा दे, तो समझ लेना चाहिए कि ईश्वर ने आपको दुनिया का सबसे अनमोल तोहफा दिया है। शुक्रिया मेरी जिंदगी में होने के लिए।”
सुमित ने जैसे ही वो मैसेज पढ़ा, उसका सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उसने सोचा, “वाह! क्या लाइनें हैं।” सुमित को सोशल मीडिया का बड़ा शौक था। उसने बिना एक सेकंड की देरी किए, वो पूरा मैसेज कॉपी किया और अपने फेसबुक, व्हाट्सएप स्टेटस और सारे फैमिली ग्रुप्स में चिपका दिया। उसे लगा कि लोग उसकी रोमांटिक सोच की तारीफ करेंगे।
कुछ ही मिनटों बाद जब अंजलि ने फैमिली ग्रुप चेक किया, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। सुमित के उस मैसेज पर बुआ जी, मौसा जी, और सुमित के दोस्तों के ढेरों कमेंट्स आ चुके थे- “वाह सुमित भाई, क्या गहरी सोच है”, “सुमित बेटा, तुम तो एकदम कवि हो गए।”
अंजलि गुस्से से तमतमाते हुए सुमित के पास पहुंची। “ये क्या है सुमित? दुनिया इतनी फास्ट है, पर आप 5G से भी ज्यादा फास्ट निकले! अभी दो मिनट पहले मैंने आपको ये मैसेज आपके लिए लिखकर भेजा था, और आपने बिना मुझे क्रेडिट दिए इसे पूरी दुनिया में अपने नाम से बांट दिया? किसी और की मेहनत पर अपना नाम चमकाने में आपको शर्म नहीं आती?”
सुमित की हालत खराब हो गई। उसे अपना तीसरा और सबसे तगड़ा ‘पछतावा’ महसूस हो रहा था। “हे भगवान! मैंने इतनी जल्दबाजी क्यों की? मुझे तो बस लाइक्स और कमेंट्स की पड़ी थी।” सुमित ने तुरंत अपना फोन उठाया और लज्जित महसूस करते हुए हर ग्रुप में, हर स्टेटस के नीचे एक लाइन जोड़ी- “सौजन्य: मेरी धर्मपत्नी अंजलि द्वारा रचित।” तब जाकर अंजलि के चेहरे पर थोड़ी शांति आई और सुमित ने कान पकड़कर कसम खाई कि भविष्य में कभी किसी और का कंटेंट बिना क्रेडिट दिए नहीं चुराएगा।
अगले दिन रविवार था। सुमित को लगा कि पिछले दो दिनों से वो लगातार गलतियां कर रहा है, तो आज कुछ ऐसा किया जाए जिससे अंजलि पूरी तरह इम्प्रेस हो जाए। उसने सुबह उठते ही अंजलि से कहा, “अंजलि, आज तुम कोई काम नहीं करोगी। आज संडे है, तुम आराम करो। आज मैं ब्रेकफास्ट और लंच अलग-अलग बनाने की झंझट खत्म कर दूंगा। आज हम सीधा ‘ब्रंच’ करेंगे। मैं तुम्हारे लिए एक स्पेशल ब्रंच तैयार कर रहा हूं।”
अंजलि मुस्कुराकर रजाई में घुस गई। सुमित किचन में जाकर पास्ता और कुछ सैंडविच बनाने की तैयारी कर ही रहा था कि अचानक डोरबेल बजी। सुमित ने दरवाजा खोला तो सामने गांव से आई उसकी बुआ जी खड़ी थीं। बुआ जी पुराने खयालात की, लेकिन बहुत ही मुंहफट और प्यारी महिला थीं।
सुमित को किचन में बर्तन खड़काते देख बुआ जी ने अपना झोला सोफे पर रखा और सीधे किचन में आ गईं। “का रे सुमितवा, ई सुबह-सुबह तू मेहरारू की तरह किचन में का कर रियो है? और अंजलि कहां है?”
सुमित ने थोड़ा गर्व से सीना तानते हुए कहा, “बुआ जी, मैं अंजलि को आज आराम दे रहा हूं। मैं आज ब्रंच बना रहा हूं।”
बुआ जी ने आंखें सिकोड़ते हुए पूछा, “ई ब्रंच का बला होत है रे? कउनो नई बीमारी है का?”
सुमित ने हंसते हुए समझाया, “अरे नहीं बुआ जी, ब्रंच मतलब ब्रेकफास्ट और लंच का कॉम्बो। मतलब नाश्ता और खाना एक साथ। ये मार्डन जमाने का स्मार्ट वर्क है। इससे समय भी बचता है और मेहनत भी।”
बुआ जी ने अपना माथा पीट लिया। “अरे मोरे राम! ई मार्डन जमाने के चक्कर में तुम लोग कितने कामचोर हो गए हो। हमारे गांव में जो मेहरारू सुबह उठके चूल्हा नहीं जलाती और नाश्ता-खाना एक साथ खिलाती है, उसे आलसी और कोढ़ी कहा जाता है। तुम लोग शहर वाले भी ना, आलस का नाम ‘ब्रंच’ रख दिए हो। जा अपनी बहू को उठा, और बोल मेरे लिए गरमा-गरम पराठे और चाय बनाए, ई तुम्हारा अंग्रेजी ब्रंच मेरे पल्ले नहीं पड़ने वाला।”
सुमित का चेहरा उतर गया। उसे फिर से पछतावा हो रहा था। “यार, मैं भी कितना बेवकूफ हूं। बुआ जी को सीधे-सीधे कह देता कि पोहा बना रहा हूं, तो बात वहीं खत्म हो जाती। ये ‘ब्रंच’ का विदेशी ज्ञान देने की क्या जरूरत थी?” सुमित को चुपचाप जाकर अंजलि को उठाना पड़ा।
खैर, बुआ जी के आने से घर का माहौल काफी खुशनुमा हो गया था। रात को डिनर के समय सुमित ने डाइनिंग टेबल पर बड़ी खुशी से घोषणा की, “बुआ जी, अच्छा हुआ आप आज आ गईं। कल मेरी मां का जन्मदिन है। हम सब मिलकर कल एक शानदार पार्टी करेंगे।”
सुमित की बात सुनते ही अंजलि जो पानी का जग रख रही थी, अचानक ठिठक गई। उसने सुमित को एक अजीब सी नजर से देखा। सुमित ने पूछा, “क्या हुआ अंजलि? तुम कुछ कहना चाहती हो?”
अंजलि ने हल्की सी लेकिन दर्द भरी मुस्कान के साथ, अपने शायराना अंदाज में कहा-
“लबों पे शिकायतें तो बहुत हैं, पर खामोश रहना ही मुनासिब समझा,
जिन्हें अपनी मां की पैदाइश याद है, वो हमारी जिंदगी के खास दिन कैसे भूल गए?”
सुमित का दिमाग सुन्न हो गया। उसने झट से अपना फोन निकाला और कैलेंडर चेक किया। हे भगवान! कल मां के जन्मदिन के साथ-साथ सुमित और अंजलि की शादी की सालगिरह भी थी! सुमित के पैरों तले जमीन खिसक गई। एक तरफ मां का जन्मदिन, दूसरी तरफ पत्नी की एनिवर्सरी, और उसने सिर्फ मां का नाम लिया!
सुमित को अपनी इस भुलक्कड़पन पर इतना भयानक पछतावा हुआ कि वो सच में रोने जैसी शक्ल बना बैठा। वो मन ही मन कह रहा था, “मैं हमेशा बिना सोचे-समझे क्यों बोल पड़ता हूं? अब तो मेरा भगवान ही मालिक है।”
लेकिन तभी अंजलि जोर से हंस पड़ी। उसने सुमित का हाथ पकड़ते हुए कहा, “अरे बुद्धू, डरो मत। मुझे पता था तुम भूल जाओगे। इसलिए मैंने पार्टी का सारा इंतजाम पहले ही कर लिया है। मां का जन्मदिन और हमारी सालगिरह, दोनों का केक मैंने कल ही ऑर्डर कर दिया था।”
सुमित की जान में जान आई। उसने राहत की सांस ली और प्यार से अंजलि की तरफ देखा। उसकी आंखों में एक अजीब सी नमी थी, लेकिन ये दुख के नहीं, बल्कि उन मीठे पछतावों के आंसू थे। सुमित को एहसास हुआ कि उसकी ये छोटी-छोटी गलतियां, उसके ये मासूम से पछतावे ही तो उनके रिश्ते की असली खूबसूरती हैं। अगर जिंदगी में ये खट्टी-मीठी नोकझोंक ना हो, तो प्यार भी नीरस हो जाएगा। अपनी कमियों को मानना और फिर उन्हें प्यार से सुधारना ही तो एक खुशहाल परिवार की निशानी है। घर में बुआ जी, मां की याद, और अंजलि का साथ, सब मिलकर उस रात को एक खूबसूरत याद में बदल चुके थे।
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मूल लेखिका : संध्या त्रिपाठी