प्रायश्चित की भोर

थाली को मेज पर एक झटके से रखते हुए जब रीता ने कहा, “खाना रख दिया है, ठंडा होने से पहले निगल लेना,” तो कमरे की ठंडी और उदास हवा में एक असहज सन्नाटा पसर गया। खाट के कोने पर सिमटे बैठे पैंसठ वर्षीय विश्वंभर जी ने कंपकपाते हाथों से अपनी सफेद चादर को ठीक … Read more

ममता का दूसरा जन्म

साढ़े तीन साल का नन्हा कबीर अपने छोटे-छोटे हाथों में लकड़ी की टूटी हुई रेलगाड़ी लिए बैठक के कोने में चुपचाप बैठा था। उसके मासूम चेहरे पर गहरी असमंजस की लकीरें खिंची हुई थीं। दरवाजे की चौखट पर उसके पिता आलोक खड़े थे और उनके साथ एक शांत, सौम्य चेहरे वाली स्त्री खड़ी थी, जिसकी … Read more

स्वाभिमान की चौखट

आँखों में तैरते आंसुओं को पल्लू के छोर से सख्ती से पोंछते हुए वंदना एकाएक अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई। उसके चेहरे पर बरसों से जमी खामोशी की जगह एक ऐसी दृढ़ता थी, जिसे देख सामने खड़े दोनों लोग सहम गए। उसने अपनी आवाज़ को स्थिर और गंभीर रखते हुए सुमित की ओर देखा … Read more

अपने हिस्से की छांव

 “अरे! यह क्या हाल बना रखा है बहू का? इसे क्या हुआ अंकित?” कौशल्या देवी ने अपनी लाठी एक तरफ रखी और आगे बढ़कर अंकिता का दूसरा हाथ थाम लिया। अंकिता का तपता जिस्म छूते ही वे सिहर उठीं। अंकित ने जब अस्पताल की सारी बात बताई, तो कौशल्या देवी ने बेटे को डांटते हुए … Read more

स्वाभिमान की दहलीज

अनुराग को अपनी संकीर्ण सोच पर भीतर ही भीतर गहरा पछतावा हुआ। उसने अपनी गलती महसूस करते हुए हाथ जोड़कर कहा कि गरिमा, मुझे अपनी नासमझी का अहसास हो चुका है। मैं सिर्फ सबके सामने ही नहीं, बल्कि अपने दिल से तुमसे यह वादा करता हूं कि तुम्हारे माता-पिता मेरे लिए पूजनीय रहेंगे। उनका सम्मान … Read more

हिसाब का तराजू

विश्वनाथ जी बोले, “नहीं आलोक, आज हिसाब होना जरूरी है क्योंकि जब परिवार में पैसों की दीवार खड़ी होने लगे, तो सच्चाई सामने आनी चाहिए। पल्लवी बेटी, परिवार कोई व्यापारिक साझेदारी नहीं होती जहां हर शाम तराजू लेकर बैठा जाए कि किसने कितना दिया और किसने कितना लिया। आज अगर तुम बच्चों को स्कूल छोड़ने … Read more

जब आँसुओं ने बोलना सीखा

 ससुराल वालों ने जब महेंद्र जी के तेवर देखे, तो उनके होश उड़ गए। जो ससुर कल तक हाथ जोड़कर समझौते की भीख मांगता था, आज वह कानून और आत्मसम्मान की ढाल बनकर खड़ा था। जब ससुराल वालों ने समाज और बदनामी का डर दिखाने की कोशिश की, तो महेंद्र जी ने दो टूक जवाब … Read more

कब तक चुप रहोगे – परमादत्त झा

बस माफ करें बाबूजी , बहुत हो गया -यह रमण था जो अपनी बहन कविता के लिए बोल रहा था। वह मेरे लिए मर चुकी है ,उसका नाम मत लो , पंडित की बेटी होकर मुसलमान की लुगाई बन गई।मेरा नाम डुबो दिया -पंडित दीनदयाल का गुस्सा मानो फट गया और रूलाई बाहर आ गई। … Read more

ये कैसी सामाजिकता – अर्चना सिंह

तूलिका ने चाय का बर्तन गैस पर चढ़ाते हुए पति मुकुल से कहा…”मुकुल …! फोन क्यों नहीं उठाते, बच्चे उठ जाएंगे फोन उठाइये ना । तूलिका मुकुल की दो बेटियां थी । छः  वर्षीय श्रेया और दस वर्षीय रिया ।मुकुल ने करवट बदलते हुए अलसाये स्वर में कहा…”फोन उठा लो ना तुम तूलिका ! देख … Read more

कब तक चुप रहोगे – विनीता सिंह

गाँव के आखिरी छोर पर एक छोटा-सा घर था। घर की दीवारें मिट्टी की थीं, लेकिन उनमें रहने वालों के सपने बहुत बड़े थे। उस घर में रघु अपनी पत्नी सीता और बारह साल के बेटे मोहन के साथ रहता था। रघु गाँव के जमींदार के खेत में मजदूरी करता था। दिनभर तपती धूप में … Read more

error: Content is protected !!