राख से उठी उड़ान

 “बाबूजी, मैं कोई भगवान या महान आत्मा नहीं हूँ। मैं बस समीर की पत्नी और अपने बच्चों की माँ हूँ। मैंने आपकी मदद इसलिए नहीं की कि मैं आपके किए गए उस अन्याय को भूल गई हूँ। वो ज़ख्म कभी नहीं भर सकते। मैंने आपकी मदद इसलिए की है क्योंकि मैं आप जैसी नहीं बन … Read more

तारीखों के तराज़ू में रिश्ते

स्नेहा अब फूट-फूट कर रो रही थी। उसे अपनी उस ओछी मानसिकता पर बेहद शर्मिंदगी महसूस हो रही थी जिसने एक पिता के प्यार को पैसों की तराज़ू में तौल दिया था। वह उठी और रमाकांत जी के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। “बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिये। पैसे की तंगी और घर के … Read more

साँझ का सवेरा

 मयंक और सुमित जब अपनी पत्नियों के साथ घर पहुंचे, तो वे अपने पिता की हालत देखकर सहम गए। उन्हें लगा था कि माँ के जाने के बाद पिता पूरी तरह बिखर जाएंगे, चीखेंगे, छाती पीटेंगे या शायद खुद भी इस आघात को सहन न कर पाएंगे। लेकिन विश्वंभर जी तो बिल्कुल शांत खड़े थे। … Read more

साए से उजाले की ओर

विद्याधर जी अपने बेटे के दृढ़ संकल्प और उसके आंसुओं को देखकर निःशब्द हो गए। उन्हें समझ आ गया कि जिस बेटे को वे कमजोर और नरम दिल समझ रहे थे, वह अपने बच्चों की ढाल बनने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। उन्होंने आगे बढ़कर मयंक के कंधे पर हाथ रखा … Read more

ममता का मोल

आलोक ने राहत की एक गहरी सांस ली और नीता के सिर पर धीमे से हाथ रख दिया। उसने कहा, “नीता, तुमने समझदारी दिखाई, यही मेरे लिए सबसे बड़ा संबल है। मां को सिर्फ दवाइयों की नहीं, इस वक्त हम सबके प्यार और अपनेपन की सबसे ज्यादा जरूरत है। चलो, अब जाकर मां को दलिया … Read more

स्नेह की छांव

  “प्रखर, जब तू इस घर में आया था, तो तू सिर्फ मेरा बेटा था। लेकिन जब तूने दृष्टि का हाथ थामा, तो तूने एक वादा किया था कि तू इसके सुख-दुख का साथी बनेगा। यह अपने मां-बाप का भरा-पूरा घर छोड़कर, अपने सारे सपने और अपनी पहचान समेटकर तेरे भरोसे इस चौखट के अंदर आई … Read more

ममता की छांव

जब बैग खोला गया तो सब स्तब्ध रह गए। उसमें सुप्रिया के मायके से मिला सारा स्त्रीधन, सोने के कंगन, हार और उसके नाम की एक पुरानी जमीन के दस्तावेज थे जो उसके पिता ने उसे उपहार में दिए थे। सुप्रिया ने हाथ जोड़कर कहा कि विवेक जी, नकुल, मयंक… माँ जी ने कभी मुझे … Read more

अंतिम तृप्ति

मालती और नीतू भी अपनी सुध-बुध खो बैठीं। दोनों एक-दूसरे को पकड़कर रोने लगीं। जो कड़वाहट कुछ मिनट पहले आग उगल रही थी, वह माँ के उस निस्वार्थ प्रेम के समंदर में बहकर तिनके की तरह गायब हो चुकी थी। नीतू ने आगे बढ़कर शारदा भाभी के हाथ थाम लिए, “दीदी, मुझे माफ कर दीजिए। … Read more

दहलीज का स्वाभिमान

 “यह घर जितना आपके बेटे का है, कानूनन और नैतिक रूप से उतना ही मेरा भी है,” अनिका ने बहुत ठंडे लेकिन अडिग स्वर में कहा। “और रही बात मेरी माँ की, तो अपनी जुबान से मेरी माँ का नाम लेने की हिम्मत दोबारा मत कीजिएगा। मेरी माँ ने मुझे झुकना नहीं, सच के लिए … Read more

कंगन की खनक

 विश्वनाथ जी घुटनों के बल सरला के पार्थिव शरीर के पास बैठ गए। उन्होंने थरथराते हाथों से सिंदूर की डिब्बी उठाई और सरला की चौड़ी मांग में गहरा लाल सिंदूर भर दिया। इसके बाद, उन्होंने मखमल की डिब्बी से वह सोने का कंगन निकाला और सरला की ठंडी, बेजान कलाई में धीरे से पहना दिया। … Read more

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