मिट्टी के घरौंदे
“कागज की नाव जब तक पानी के ऊपर तैरती है चित्रा, तब तक ही सबको सुंदर लगती है। जिस दिन वह पानी सोख कर भारी हो जाती है, बच्चे भी उसे किनारे छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं। औरत की ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है, जब तक वह सबका बोझ उठाती है, वह ‘गृहलक्ष्मी’ … Read more